FCRA संशोधन बिल 2026 को लेकर संसद के मॉनसून सत्र में राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। सरकार इस विधेयक को सीधे सदन में आगे बढ़ाने के बजाय संयुक्त संसदीय समिति यानी JPC के पास भेजने के विकल्प पर विचार कर रही है। माना जा रहा है कि इस कदम के जरिए बिल के प्रावधानों पर विस्तृत चर्चा और जांच का रास्ता तैयार किया जा सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात के बाद केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने लोकसभा स्पीकर से भी मुलाकात की। इससे पहले रिजिजू विपक्षी दलों के नेताओं के साथ बातचीत कर चुके हैं। सरकार की कोशिश बताई जा रही है कि FCRA संशोधन विधेयक को लेकर सदन में बने मतभेदों को बातचीत के जरिए कम किया जाए और संसदीय प्रक्रिया आगे बढ़ सके। FCRA यानी Foreign Contribution Regulation Act से जुड़े संशोधन प्रस्तावों को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच अलग-अलग राय है। विपक्ष की ओर से बिल को JPC के पास भेजने के साथ-साथ इसे वापस लेने की मांग भी उठाई जा रही है। विपक्ष का तर्क है कि विधेयक के प्रावधानों पर व्यापक चर्चा और सभी पक्षों की राय जरूरी है। इस बीच सोमवार को हुई बिजनेस एडवाइजरी कमेटी यानी BAC की बैठक भी चर्चा में रही। बैठक में FCRA संशोधन बिल और प्रस्तावित परिसीमन बिल को एजेंडे में शामिल नहीं किया गया। इसके चलते अब यह सवाल उठ रहा है कि मॉनसून सत्र के बचे हुए दिनों में इन दोनों विधेयकों को सदन में कब और किस तरीके से आगे बढ़ाया जाएगा। सरकार की ओर से अभी JPC को लेकर अंतिम फैसला सार्वजनिक नहीं किया गया है। यदि विधेयक को समिति के पास भेजने का निर्णय होता है, तो सांसदों की समिति इसके अलग-अलग प्रावधानों की समीक्षा कर सकती है और संबंधित पक्षों से राय भी ली जा सकती है। इसके बाद समिति अपनी रिपोर्ट सदन के सामने रखेगी। FCRA संशोधन बिल को लेकर आगे की तस्वीर सरकार और विपक्ष के बीच होने वाली बातचीत तथा संसद की आगामी कार्यवाही से स्पष्ट होगी। सरकार की ओर से JPC के विकल्प पर विचार किए जाने की खबर ने विधेयक को लेकर राजनीतिक चर्चा और तेज कर दी है।
सुप्रिया सुले ने भी JPC की मांग की
NCP-SP की कार्यकारी अध्यक्ष और सांसद सुप्रिया सुले ने FCRA संशोधन बिल के मौजूदा स्वरूप को लेकर अपनी असहमति जाहिर की है। उन्होंने केंद्र सरकार से विधेयक पर दोबारा विचार करने की मांग करते हुए कहा कि इतना महत्वपूर्ण कानून बिना व्यापक चर्चा के आगे नहीं बढ़ाया जाना चाहिए। उनके मुताबिक, बिल के प्रावधानों को लेकर सभी संबंधित पक्षों की राय सामने आना जरूरी है। विदेशी फंडिंग को केवल संदेह की नजर से देखना उचित नहीं है। उनका तर्क है कि देश में कई संस्थाएं और संगठन अलग-अलग सामाजिक क्षेत्रों में काम करते हैं और उन्हें मिलने वाली विदेशी सहायता को लेकर एक संतुलित नियामक व्यवस्था जरूरी है। उन्होंने सरकार से कानून बनाते समय इसके व्यापक प्रभावों को ध्यान में रखने की बात कही। सांसद ने केंद्र के सामने दो विकल्प रखे हैं। उनका कहना है कि यदि सरकार मौजूदा विधेयक को लेकर आगे बढ़ना चाहती है तो पहले इसे वापस लेकर नए सिरे से विचार किया जाए या फिर संयुक्त संसदीय समिति यानी JPC को भेजा जाए। समिति के जरिए बिल के हर पहलू की विस्तृत समीक्षा हो सकती है और अलग-अलग पक्षों की राय भी शामिल की जा सकती है। उन्होंने यह भी जोर दिया कि FCRA जैसे कानून का असर केवल राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं है। इसके दायरे में काम करने वाले विभिन्न संगठन और संस्थाएं भी इससे प्रभावित हो सकते हैं। ऐसे में कानून में प्रस्तावित बदलावों को लेकर पारदर्शी चर्चा और स्पष्टता जरूरी है, ताकि भविष्य में किसी तरह की व्यावहारिक समस्या सामने न आए। सुप्रिया सुले की मांग ऐसे समय सामने आई है जब FCRA संशोधन बिल को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच राजनीतिक मतभेद बने हुए हैं। विपक्ष के कई नेता विधेयक के प्रावधानों पर सवाल उठाते हुए इसे संसदीय समिति के पास भेजने की मांग कर रहे हैं। वहीं सरकार की ओर से भी JPC के विकल्प पर विचार किए जाने की चर्चा है। सरकार FCRA बिल को लेकर क्या फैसला लेती है। अगर विधेयक JPC के पास भेजा जाता है, तो इसके प्रावधानों पर विस्तृत विचार-विमर्श का रास्ता खुल सकता है। फिलहाल सुप्रिया सुले समेत विपक्षी नेताओं की मांग ने इस विधेयक को लेकर संसद में बहस को और महत्वपूर्ण बना दिया है।

DMK भी विरोध में, अमित शाह से की बिल वापस लेने की मांग
FCRA संशोधन बिल को लेकर राजनीतिक दलों की आपत्तियां लगातार सामने आ रही हैं। इसी क्रम में DMK ने भी विधेयक के मौजूदा स्वरूप पर सवाल उठाते हुए केंद्र सरकार से इसे वापस लेने की मांग की है। पार्टी का कहना है कि विदेशी योगदान से जुड़े नियमों में बदलाव करने से पहले इसके व्यापक प्रभावों पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। DMK की ओर से सांसद पी. विल्सन के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की। प्रतिनिधिमंडल ने बैठक के दौरान FCRA बिल को लेकर पार्टी की चिंताओं से सरकार को अवगत कराया। पार्टी ने सरकार के सामने विधेयक को वापस लेने और मौजूदा कानून की धारा 15 को हटाने की मांग रखी। DMK का कहना है कि FCRA से जुड़े प्रावधानों में बदलाव का असर उन संस्थाओं पर पड़ सकता है, जो विदेशी योगदान के जरिए सामाजिक और अन्य क्षेत्रों में काम करती हैं। ऐसे में पार्टी ने सरकार से कानून में प्रस्तावित बदलावों को लेकर अधिक व्यापक चर्चा और समीक्षा की जरूरत बताई है। पार्टी ने यह भी कहा है कि यदि सरकार बिल को वापस लेने के लिए तैयार नहीं होती, तो वैकल्पिक तौर पर इसे संयुक्त संसदीय समिति यानी JPC के पास भेजा जाए। DMK के मुताबिक, JPC में विधेयक के प्रावधानों पर विस्तृत चर्चा की जा सकती है और विभिन्न पक्षों की राय को भी शामिल किया जा सकता है। DMK ने FCRA की व्यापक समीक्षा की मांग भी उठाई है। पार्टी का मानना है कि विदेशी योगदान को नियंत्रित करने वाले कानून में किसी भी बड़े बदलाव से पहले मौजूदा व्यवस्था की कमियों और उसके प्रभावों का आकलन जरूरी है। इसी आधार पर पार्टी ने सरकार से पूरे कानून की समीक्षा करने की बात कही है। FCRA बिल को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच पहले से ही मतभेद बने हुए हैं। ऐसे में DMK की ओर से गृह मंत्री के सामने रखी गई मांगों से इस मुद्दे पर राजनीतिक चर्चा और तेज हो सकती है। अब देखना होगा कि केंद्र सरकार इन मांगों पर क्या रुख अपनाती है और विधेयक को लेकर आगे की संसदीय प्रक्रिया किस दिशा में बढ़ती है।
कांग्रेस और बाकी पार्टियां भी FCRA बिल के विरोध में
FCRA संशोधन बिल को लेकर विपक्षी दलों का विरोध लगातार सामने आ रहा है। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और वाम दलों समेत कई विपक्षी पार्टियां विधेयक के मौजूदा प्रावधानों पर सवाल उठा चुकी हैं। विपक्ष की ओर से मांग की जा रही है कि बिल को जल्दबाजी में आगे बढ़ाने के बजाय इस पर व्यापक चर्चा की जाए। FCRA जैसे महत्वपूर्ण कानून में बदलाव का असर कई संस्थाओं और संगठनों पर पड़ सकता है। इसलिए विधेयक के हर प्रावधान पर विस्तार से चर्चा जरूरी है। इसी वजह से कई दल इसे संयुक्त संसदीय समिति यानी JPC के पास भेजने की मांग कर रहे हैं, ताकि विभिन्न पक्षों की राय को प्रक्रिया में शामिल किया जा सके। सरकार के सामने अब इस मुद्दे पर विपक्ष के साथ सहमति बनाने की चुनौती है। संसद में विधेयक को आगे बढ़ाने के लिए सरकार को अलग-अलग दलों की आपत्तियों और सुझावों पर विचार करना पड़ सकता है। राजनीतिक स्तर पर बातचीत के जरिए गतिरोध दूर करने की कोशिशें भी जारी रहने की संभावना है। FCRA बिल को लेकर सरकार के रुख पर भी लगातार नजर बनी हुई है। JPC को भेजे जाने की संभावना की चर्चा के बीच यह स्पष्ट नहीं है कि सरकार अंतिम तौर पर कौन सा रास्ता अपनाएगी। यदि बिल समिति को भेजा जाता है, तो इसके प्रावधानों की विस्तृत समीक्षा के बाद आगे की प्रक्रिया तय हो सकती है। वहीं, अगर सरकार विधेयक को मौजूदा स्वरूप में संसद में आगे बढ़ाने का निर्णय लेती है, तो सदन में इसे लेकर बहस और राजनीतिक टकराव बढ़ने की संभावना रहेगी। विपक्ष पहले ही बिल को लेकर अपनी आपत्तियां स्पष्ट कर चुका है। अब सभी की नजर सरकार के अगले कदम पर है। आने वाले दिनों में यह तय होगा कि FCRA संशोधन बिल पर व्यापक राजनीतिक सहमति बनाने की कोशिश होती है या सरकार इसे मौजूदा स्वरूप में संसदीय प्रक्रिया के तहत आगे ले जाने का फैसला करती है।










