West Bengal की सियासत में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के चुनाव चिन्ह और पार्टी पर अधिकार को लेकर चल रहा विवाद अब चुनाव आयोग के स्तर पर पहुंच गया है। ममता बनर्जी और ऋतब्रत बनर्जी के गुट इस मामले में अपने-अपने दावे पेश कर रहे हैं। दिल्ली में चुनाव आयोग की फुल बेंच ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद आगे की प्रक्रिया के लिए समयसीमा तय की है। सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों की ओर से पार्टी पर अपने दावे के समर्थन में अलग-अलग दस्तावेज पेश किए गए। आयोग ने ममता बनर्जी के गुट को कहा है कि अगर वह अपने दावे के पक्ष में कोई अतिरिक्त दस्तावेज या अन्य जानकारी देना चाहता है, तो उसे 16 सितंबर को दोपहर 3 बजे तक जमा किया जा सकता है। चुनाव आयोग ने दस्तावेजों को लेकर पारदर्शिता बनाए रखने के लिए एक और निर्देश दिया है। ममता गुट की ओर से जमा किए जाने वाले अतिरिक्त दस्तावेजों की एक प्रति ऋतब्रत बनर्जी के गुट को भी उपलब्ध करानी होगी। इससे दूसरे पक्ष को भी प्रस्तुत सामग्री पर अपना पक्ष रखने का अवसर मिलेगा। शनिवार को हुई सुनवाई में दोनों पक्षों के प्रतिनिधियों ने आयोग के सामने अपनी बातें रखीं। ममता बनर्जी के गुट की ओर से कालीघाट से जुड़े प्रतिनिधि मौजूद रहे, जबकि ऋतब्रत बनर्जी के गुट ने भी अपनी दावेदारी के समर्थन में दस्तावेज और तर्क पेश किए। चुनाव आयोग ने इस मामले में कोई अंतिम फैसला नहीं सुनाया है। 16 सितंबर तक अतिरिक्त जानकारी जमा किए जाने के बाद प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। जरूरत पड़ने पर 17 सितंबर को भी सुनवाई हो सकती है। ऐसे में आने वाले कुछ दिन टीएमसी के चुनाव चिन्ह से जुड़े विवाद के लिहाज से महत्वपूर्ण रहने वाले हैं। यह विवाद इसलिए भी अहम है क्योंकि किसी राजनीतिक दल का चुनाव चिन्ह उसके उम्मीदवारों और मतदाताओं के बीच पहचान का प्रमुख माध्यम होता है। ऐसे में पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह पर अधिकार को लेकर चुनाव आयोग का फैसला दोनों गुटों के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है।
टीएमसी नेताओं के तीखे बयान, क्या बोली ममता की पार्टी?
चुनाव आयोग के नोटिस को लेकर टीएमसी की ओर से सांसद और वरिष्ठ वकील कल्याण बनर्जी ने पार्टी का पक्ष स्पष्ट किया है। उन्होंने कहा कि आयोग ने अभी तक इस मामले में कोई अंतरिम आदेश जारी नहीं किया है। उनके मुताबिक, आयोग ने दोनों पक्षों को 16 और 17 सितंबर को अपनी बात रखने के लिए बुलाया है। कल्याण बनर्जी ने इस प्रक्रिया को पार्टी के लिए महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि फिलहाल टीएमसी के उम्मीदवार आधिकारिक चुनाव चिन्ह के साथ ही उपचुनाव लड़ रहे हैं। उनका कहना है कि जब तक चुनाव आयोग की ओर से कोई अलग फैसला नहीं आता, तब तक पार्टी के चुनाव चिन्ह को लेकर स्थिति में कोई बदलाव नहीं है। वहीं, टीएमसी नेता कुणाल घोष ने मामले के कानूनी पहलुओं पर विस्तार से टिप्पणी करने से दूरी बनाई। उन्होंने कहा कि इस पूरे मामले को पार्टी की प्रमुख ममता बनर्जी और कल्याण बनर्जी देख रहे हैं। उनका संकेत साफ था कि चुनाव आयोग के स्तर पर चल रही प्रक्रिया को पार्टी की कानूनी टीम संभाल रही है। कुणाल घोष ने ऋतब्रत बनर्जी पर तीखा राजनीतिक हमला जरूर किया। उन्होंने ममता बनर्जी के नेतृत्व में टीएमसी के लंबे राजनीतिक सफर का जिक्र करते हुए ऋतब्रत के रुख पर सवाल उठाए। घोष के बयान से साफ है कि चुनाव चिन्ह को लेकर चल रहा विवाद अब केवल कानूनी प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके राजनीतिक असर भी दिखाई दे रहे हैं। टीएमसी नेताओं की ओर से लगातार यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि पार्टी अपने आधिकारिक चुनाव चिन्ह को लेकर आश्वस्त है। दूसरी तरफ, ऋतब्रत बनर्जी का गुट भी चुनाव आयोग के सामने अपनी दलील और दस्तावेज रख चुका है। ऐसे में अब आयोग की अगली सुनवाई और उसके बाद आने वाला फैसला बेहद अहम माना जा रहा है। 16 और 17 सितंबर की तारीखों पर सबकी नजर है। इन तारीखों पर होने वाली प्रक्रिया के बाद यह स्पष्ट हो सकता है कि चुनाव चिन्ह से जुड़े विवाद में आगे की तस्वीर किस दिशा में जाती है।

ऋतब्रत बनर्जी ने बताया ‘रूटीन प्रोसेस‘
पश्चिम बंगाल में चुनाव चिन्ह को लेकर चल रही राजनीतिक हलचल के बीच नेता प्रतिपक्ष ऋतब्रत बनर्जी ने चुनाव आयोग की ओर से भेजे गए पत्र को सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा बताया है। उन्होंने कहा कि आयोग ने दोनों पक्षों को अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर दिया है और इस पूरी प्रक्रिया में फिलहाल ऐसा कुछ नहीं है, जिसे असामान्य माना जाए। उनकी ओर से आयोग के सामने जरूरी दलीलें और संबंधित दस्तावेज पहले ही जमा किए जा चुके हैं। अब आयोग ने दोनों पक्षों को 16 सितंबर तक अपनी अंतिम बातें रखने के लिए कहा है। यानी इस तारीख तक दोनों पक्ष अपने-अपने पक्ष को स्पष्ट करने के लिए अंतिम तर्क और जरूरी जानकारी आयोग के सामने रख सकते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि 17 सितंबर को जरूरत पड़ने पर मामले में दोबारा सुनवाई हो सकती है। इससे साफ है कि चुनाव चिन्ह से जुड़ा अंतिम फैसला अभी बाकी है और आयोग दोनों पक्षों की दलीलों और दस्तावेजों को देखने के बाद ही आगे की स्थिति तय करेगा। ऋतब्रत बनर्जी ने इस मुद्दे पर तृणमूल कांग्रेस के सांसद और वरिष्ठ वकील कल्याण बनर्जी के दावे पर भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि किसी राजनीतिक दल या नेता के लिए यह तय करना संभव नहीं है कि चुनाव चिन्ह किसे मिलेगा। उनका कहना है कि इस संबंध में अधिकार केवल चुनाव आयोग के पास है और अंतिम निर्णय भी वही लेगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि आयोग की प्रक्रिया को लेकर किसी तरह की जल्दबाजी में निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। दोनों पक्षों को अपनी बात रखने का मौका मिल रहा है और आयोग सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद फैसला करेगा। ऐसे में अब सबकी नजर 16 और 17 सितंबर की प्रक्रिया पर टिकी हुई है। इस पूरे घटनाक्रम के बीच पश्चिम बंगाल की राजनीति में चुनाव चिन्ह का मुद्दा काफी अहम बन गया है। आने वाले दिनों में आयोग की सुनवाई और उसके बाद सामने आने वाला फैसला राजनीतिक समीकरणों पर असर डाल सकता है। फिलहाल दोनों पक्ष अपने-अपने दावों के साथ आयोग के निर्णय का इंतजार कर रहे हैं।
तृणमूल का खेल खत्म
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के चुनाव चिन्ह को लेकर जारी विवाद अब राजनीतिक बयानबाजी के बीच और गरमाता नजर आ रहा है। इस मामले में बीजेपी की ओर से भी लगातार टीएमसी पर निशाना साधा जा रहा है। बंगाल की मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने तंज कसते हुए दावा किया कि तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रही खींचतान उसकी कमजोर होती स्थिति को दिखाती है। उन्होंने कहा कि पार्टी के चुनाव चिन्ह को लेकर चल रही लड़ाई का आम लोगों पर कोई खास असर नहीं है। अग्निमित्रा पॉल ने रेजीनगर और नंदीग्राम में होने वाले उपचुनावों का भी जिक्र किया। उन्होंने दावा किया कि इन चुनावों के संभावित नतीजों को लेकर बंगाल की जनता की राय काफी हद तक स्पष्ट है। उनके इस बयान को टीएमसी के खिलाफ बीजेपी के राजनीतिक हमले के तौर पर देखा जा रहा है। चुनाव चिन्ह को लेकर चल रहा विवाद अब केवल कानूनी और संवैधानिक प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक मंच पर भी इसका असर दिखाई देने लगा है। वहीं, दूसरी तरफ ऋतब्रत बनर्जी ने चुनाव आयोग के पत्र को लेकर अलग रुख अपनाया है। उन्होंने इसे चुनाव आयोग की सामान्य प्रक्रिया बताया और कहा कि उनके गुट की ओर से आयोग के सामने अपनी दलीलें और आवश्यक दस्तावेज पहले ही रखे जा चुके हैं। उनके अनुसार, दोनों पक्षों को अपनी बात रखने का मौका दिया गया है और अब आयोग उपलब्ध दस्तावेजों तथा दलीलों के आधार पर आगे की कार्रवाई करेगा। इस विवाद का सबसे अहम पहलू तृणमूल कांग्रेस के चुनाव चिन्ह से जुड़ा हुआ है। किसी भी राजनीतिक दल के लिए उसका चुनाव चिन्ह केवल एक प्रतीक नहीं होता, बल्कि मतदाताओं के बीच उसकी पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। यही वजह है कि पार्टी के भीतर चुनाव चिन्ह को लेकर चल रही खींचतान को राजनीतिक रूप से भी काफी गंभीर माना जा रहा है। यदि विवाद लंबा खिंचता है तो इसका असर आगामी उपचुनावों की तैयारियों और उम्मीदवारों के बीच भी देखने को मिल सकता है। अब सबकी नजर 16 और 17 सितंबर की प्रक्रिया पर टिकी हुई है। 16 सितंबर तक संबंधित पक्षों को अपनी अतिरिक्त दलीलें या दस्तावेज रखने का अवसर दिया गया है। इसके बाद 17 सितंबर को जरूरत पड़ने पर आगे की सुनवाई की जा सकती है। ऐसे में आने वाले कुछ दिन इस विवाद के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि चुनाव आयोग चुनाव चिन्ह और पार्टी से जुड़े दावे पर क्या फैसला करता है। राजनीतिक दल अपने-अपने तरीके से इस मुद्दे को जनता के बीच उठा रहे हैं, लेकिन अंतिम तस्वीर आयोग की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी। तब तक पश्चिम बंगाल की राजनीति में टीएमसी के चुनाव चिन्ह को लेकर बयानबाजी और सियासी चर्चा जारी रहने की पूरी संभावना है।









