PM नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त 2026 को लाल किले की प्राचीर से अपने संबोधन में बदलती वैश्विक परिस्थितियों और भारत की आत्मनिर्भरता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि दुनिया में अब संसाधनों का इस्तेमाल केवल विकास के लिए नहीं, बल्कि रणनीतिक ताकत के तौर पर भी किया जा रहा है। ऐसे माहौल में भारत के लिए जरूरी है कि वह अहम संसाधनों के मामले में अपनी निर्भरता कम करे। पीएम मोदी ने कहा कि आज कई देश अपने हितों को सुरक्षित रखने के लिए संसाधनों को रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। यहां तक कि भू-भाग और ऊर्जा के क्षेत्र में भी प्रतिस्पर्धा बढ़ गई है। इसका सीधा असर वैश्विक सप्लाई चेन और ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ रहा है। ऐसे में भारत को अपनी जरूरतों के लिए दूसरे देशों पर अत्यधिक निर्भर रहने के बजाय घरेलू क्षमता मजबूत करनी होगी। प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि पिछले वर्षों में बनाई गई नीतियों ने भारत को कई मुश्किल परिस्थितियों से निपटने में मदद की। कोरोना महामारी से लेकर पश्चिम एशिया में पैदा हुए संकट तक, भारत ने अपनी जरूरतों को पूरा करने और आर्थिक गतिविधियों को जारी रखने की कोशिश की। उन्होंने साफ किया कि अब रुकने का समय नहीं है और देश को आत्मनिर्भरता की दिशा में अपनी गति और तेज करनी होगी। रेयर अर्थ और क्रिटिकल मिनरल्स इसी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इन खनिजों का इस्तेमाल इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रिक वाहनों, रक्षा उपकरणों और आधुनिक ऊर्जा तकनीक में होता है। वैश्विक स्तर पर इन संसाधनों की सप्लाई कुछ चुनिंदा देशों के हाथों में होने के कारण भारत के लिए इनके वैकल्पिक स्रोत तलाशना और अपनी क्षमता विकसित करना महत्वपूर्ण हो गया है। ऊर्जा के मोर्चे पर भी भारत को भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर अपनी रणनीति तैयार करनी होगी। कच्चे तेल पर ज्यादा निर्भरता वैश्विक संकट के दौरान देश के लिए चुनौती बन सकती है। इसलिए सौर ऊर्जा, परमाणु ऊर्जा और दूसरे वैकल्पिक स्रोतों को बढ़ावा देने के साथ-साथ समुद्री क्षेत्र में मौजूद संभावित संसाधनों की खोज पर भी ध्यान दिया जा रहा है। पीएम मोदी के संदेश का व्यापक अर्थ यही है कि आने वाले वर्षों में भारत की आत्मनिर्भरता केवल घरेलू सामान बनाने तक सीमित नहीं रहेगी। जरूरी खनिजों, ऊर्जा, तकनीक और रणनीतिक संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करना भी इसका अहम हिस्सा होगा। सरकार का जोर ऐसी व्यवस्था तैयार करने पर है, जिससे वैश्विक परिस्थितियां बदलने पर भी भारत की विकास यात्रा प्रभावित न हो।
कच्चे तेल पर नहीं रह सकते डिपेंड
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऊर्जा सुरक्षा को भारत के भविष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण बताते हुए आने वाले वर्षों में बड़े बदलाव की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि अगले 5 से 7 साल देश के लिए निर्णायक होंगे और इस अवधि में उन लक्ष्यों को पूरा करने की दिशा में तेजी से काम करना होगा, जिन्हें लंबे समय से आगे बढ़ाने की जरूरत महसूस की जा रही है। पीएम मोदी ने कहा कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए केवल कच्चे तेल पर निर्भर नहीं रह सकता। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों और भू-राजनीतिक परिस्थितियों में बदलाव का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। इसलिए ऊर्जा के अलग-अलग स्रोतों को मजबूत करना और एक संतुलित ऊर्जा व्यवस्था तैयार करना जरूरी है। परमाणु ऊर्जा को लेकर भी प्रधानमंत्री ने बड़ा लक्ष्य सामने रखा। उन्होंने कहा कि 2047 तक भारत को परमाणु ऊर्जा के जरिए 100 गीगावाट बिजली उत्पादन की क्षमता हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ना होगा। यह लक्ष्य देश की बढ़ती बिजली जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने में अहम भूमिका निभा सकता है। सौर ऊर्जा के क्षेत्र में भारत की प्रगति को भी प्रधानमंत्री ने रेखांकित किया। उनके मुताबिक करीब 12 साल पहले देश की सौर ऊर्जा क्षमता महज 2 गीगावाट के आसपास थी, जो अब बढ़कर लगभग 160 गीगावाट तक पहुंच गई है। यह बदलाव बताता है कि भारत ने नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में अपनी क्षमता तेजी से बढ़ाई है। अब चुनौती इस उपलब्धि को और बड़े स्तर तक ले जाने की है। सौर ऊर्जा के साथ परमाणु ऊर्जा और अन्य वैकल्पिक स्रोतों को बढ़ावा देकर भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भरता कम कर सकता है। सरकार का फोकस ऐसी ऊर्जा व्यवस्था बनाने पर है, जो आने वाली पीढ़ियों की जरूरतों को पूरा करने के साथ देश की आर्थिक और रणनीतिक मजबूती को भी बढ़ाए।

समुद्र मंथल प्रोजेक्ट से एनर्जी सिक्योरिटी बढ़ेगी
भारत अब अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए समुद्री क्षेत्र में मौजूद संभावनाओं की भी तलाश करेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से अपने संबोधन में कहा कि लंबे समय तक समुद्र के भीतर मौजूद संसाधनों की खोज से दूरी बनाए रखने के बाद अब भारत इस दिशा में आगे बढ़ने की तैयारी कर रहा है। इसका उद्देश्य देश की ऊर्जा सुरक्षा को और मजबूत करना है। समुद्र की गहराइयों में ऊर्जा के साथ कई महत्वपूर्ण और दुर्लभ संसाधन मौजूद होने की संभावना है। इन संसाधनों की पहचान और खोज से भारत को अपनी जरूरतों के लिए नए विकल्प मिल सकते हैं। सरकार की योजना समुद्री क्षेत्र की क्षमता का इस्तेमाल देश के आर्थिक और रणनीतिक हितों के लिए करने की है। प्रधानमंत्री ने इस बदलाव को ‘नो गो सी’ से ‘गो सी’ की ओर बढ़ने के रूप में बताया। यानी जिन समुद्री क्षेत्रों में पहले संसाधनों की खोज को लेकर सीमाएं थीं, अब वहां संभावनाओं का वैज्ञानिक तरीके से आकलन और एक्सप्लोरेशन किया जा सकेगा। इससे समुद्र के भीतर मौजूद प्राकृतिक संसाधनों को समझने और उनका जिम्मेदारी से उपयोग करने का रास्ता खुल सकता है। इसी उद्देश्य से ‘समुद्र मंथन’ परियोजना को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस पहल के तहत समुद्र के भीतर ऊर्जा स्रोतों और अन्य दुर्लभ संसाधनों की तलाश पर ध्यान दिया जाएगा। सरकार ने इस परियोजना के लिए करीब 85 हजार करोड़ रुपये के निवेश की बात कही है। इतने बड़े निवेश से समुद्री अन्वेषण के लिए जरूरी तकनीक, बुनियादी ढांचे और विशेषज्ञता विकसित करने में मदद मिल सकती है। भारत के लिए इस पहल का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि देश की ऊर्जा जरूरत लगातार बढ़ रही है। अगर समुद्री क्षेत्र से नए ऊर्जा स्रोत या महत्वपूर्ण खनिज उपलब्ध होते हैं, तो इससे आयात पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है। साथ ही, रणनीतिक संसाधनों की घरेलू उपलब्धता देश को वैश्विक आपूर्ति संकट के समय अधिक मजबूती दे सकती है। ‘समुद्र मंथन’ जैसी पहल केवल ऊर्जा खोज तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता की रणनीति का हिस्सा भी बन सकती है। आने वाले वर्षों में समुद्री संसाधनों की वैज्ञानिक खोज, तकनीकी क्षमता और पर्यावरणीय संतुलन के बीच तालमेल बनाना महत्वपूर्ण होगा। यदि यह योजना अपेक्षित तरीके से आगे बढ़ती है, तो समुद्र भारत की ऊर्जा और संसाधन सुरक्षा का एक अहम आधार बन सकता है।
चिप को लेकर क्या किया?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के मौके पर देश को संबोधित करते हुए सेमीकंडक्टर और चिप निर्माण को भारत की भविष्य की जरूरतों से जोड़कर देखा। उन्होंने कहा कि आज के दौर में चिप के बिना आधुनिक तकनीक की कल्पना करना मुश्किल है। मोबाइल फोन, कार, कंप्यूटर से लेकर रक्षा और औद्योगिक उपकरणों तक, लगभग हर क्षेत्र में सेमीकंडक्टर की भूमिका बढ़ती जा रही है। पीएम मोदी ने कहा कि दुनिया में सेमीकंडक्टर तकनीक भारत की आजादी के समय ही मौजूद थी, लेकिन उस समय देश इस क्षेत्र में आगे नहीं बढ़ सका। भारत में इस तकनीक को लेकर चर्चा तो होती रही, लेकिन उत्पादन की दिशा में अपेक्षित कदम नहीं उठाए गए। अब सरकार इस कमी को दूर करने के लिए घरेलू चिप निर्माण की क्षमता विकसित करने पर जोर दे रही है। भारत में सेमीकंडक्टर निर्माण की दिशा में अब जमीन पर काम दिखाई देने लगा है। देश में प्लांट तैयार किए जा रहे हैं और उत्पादन की शुरुआत भी हो चुकी है। इसका मकसद भारत को चिप की वैश्विक सप्लाई चेन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाना है, ताकि भविष्य में देश को जरूरी तकनीक और इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट के लिए दूसरे देशों पर ज्यादा निर्भर न रहना पड़े। आने वाले वर्षों को लेकर भी सरकार ने बड़ा लक्ष्य रखा है। प्रधानमंत्री ने बताया कि अगले 7 से 8 साल में देश में कई और सेमीकंडक्टर प्लांट शुरू किए जाने की योजना है। अगर यह विस्तार तय गति से होता है, तो इससे इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग, ऑटोमोबाइल, टेलीकॉम और हाई-टेक उद्योगों को घरेलू स्तर पर जरूरी चिप्स और कंपोनेंट उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है। भारत के लिए सेमीकंडक्टर क्षेत्र का महत्व सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक भी है। वैश्विक स्तर पर चिप की सप्लाई प्रभावित होने पर कई उद्योगों का उत्पादन रुक सकता है। ऐसे में घरेलू निर्माण क्षमता मजबूत होने से भारत अपनी तकनीकी और औद्योगिक जरूरतों को बेहतर तरीके से पूरा कर सकेगा। इसके साथ ही सेमीकंडक्टर सेक्टर में निवेश, रोजगार और नई तकनीकी विशेषज्ञता के अवसर भी बढ़ने की उम्मीद है।
रेयर अर्थ पर भारत ने किया
PM नरेंद्र मोदी के संबोधन में भारत की रणनीतिक आत्मनिर्भरता पर खास जोर दिखाई दिया। उन्होंने बताया कि आने वाले समय में देश के लिए क्रिटिकल मिनरल्स, ऊर्जा, सेमीकंडक्टर और समुद्री संसाधन बेहद महत्वपूर्ण होने वाले हैं। इन क्षेत्रों में दूसरे देशों पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता कम करने के लिए भारत घरेलू क्षमता बढ़ाने के साथ अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों पर भी काम कर रहा है। क्रिटिकल मिनरल्स आधुनिक अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन चुके हैं। इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, मोबाइल फोन, रक्षा उपकरण और कई तरह की हाईटेक मशीनों के निर्माण में इनकी जरूरत पड़ती है। इन संसाधनों की वैश्विक सप्लाई कुछ देशों तक सीमित होने के कारण भारत के लिए वैकल्पिक स्रोत तैयार करना जरूरी है। इसी दिशा में भारत अलग-अलग देशों के साथ सहयोग बढ़ा रहा है और क्रिटिकल मिनरल्स की सप्लाई को सुरक्षित करने की कोशिश कर रहा है। भारत ने इस क्षेत्र में ऑस्ट्रेलिया समेत कई देशों के साथ बातचीत और समझौते आगे बढ़ाए हैं। सरकार की कोशिश है कि जरूरी खनिजों के लिए किसी एक देश पर निर्भरता न रहे। इसके साथ ही देश के भीतर इन संसाधनों की खोज, प्रोसेसिंग और इस्तेमाल की क्षमता विकसित करने पर भी ध्यान दिया जा रहा है। इससे भविष्य में उद्योगों को जरूरी कच्चा माल उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है। ऊर्जा के क्षेत्र में भी भारत अपनी क्षमता लगातार बढ़ा रहा है। सौर ऊर्जा की क्षमता में पिछले वर्षों में तेज वृद्धि हुई है। प्रधानमंत्री के मुताबिक, करीब एक दशक पहले भारत की सौर ऊर्जा क्षमता लगभग 2 गीगावाट थी, जो अब करीब 160 गीगावाट तक पहुंच चुकी है। सरकार इस क्षमता को और विस्तार देने पर जोर दे रही है, ताकि बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ आयात पर निर्भरता भी कम की जा सके। समुद्री संसाधनों की खोज को भी भारत की दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा बनाया जा रहा है। ‘समुद्र मंथन’ पहल के तहत समुद्र के भीतर ऊर्जा और दूसरे महत्वपूर्ण संसाधनों की संभावनाएं तलाशने पर जोर दिया जाएगा। अगर समुद्री क्षेत्र में उपलब्ध संसाधनों की सफलतापूर्वक पहचान और उपयोग होता है, तो यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक मजबूती के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में भी भारत अपनी स्थिति मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। आज मोबाइल फोन, ऑटोमोबाइल, दूरसंचार, रक्षा तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे क्षेत्रों में चिप की अहम भूमिका है। ऐसे में घरेलू स्तर पर सेमीकंडक्टर निर्माण बढ़ाना केवल औद्योगिक विकास का मुद्दा नहीं, बल्कि तकनीकी और रणनीतिक जरूरत भी बन गया है। सरकार का लक्ष्य आने वाले वर्षों में देश में सेमीकंडक्टर निर्माण की क्षमता को बड़े स्तर पर बढ़ाना है। नए प्लांट और निवेश बढ़ने से इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग को गति मिल सकती है। साथ ही इससे भारत में नई तकनीकी विशेषज्ञता, रोजगार और हाईटेक उद्योगों के लिए अवसर पैदा होने की उम्मीद है। भारत की आत्मनिर्भरता की रणनीति अब सिर्फ घरेलू सामान के उत्पादन तक सीमित नहीं है। जरूरी खनिजों की सुरक्षित आपूर्ति, स्वच्छ ऊर्जा, समुद्री संसाधनों की खोज और चिप निर्माण जैसे क्षेत्रों को राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक मजबूती से जोड़ा जा रहा है। आने वाले वर्षों में इन क्षेत्रों में भारत की प्रगति यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है कि वैश्विक संकटों के बीच देश अपनी जरूरतों को कितनी मजबूती से पूरा कर पाता है।










