नेपाल में कुदरत ने ऐसा कहर बरपाया है कि सिर्फ एक बाढ़ की खबर बताना इस पूरी त्रासदी के साथ इंसाफ नहीं होगा…क्योंकि यहां अचानक आई बाढ़ ने सिर्फ लोगों की जान नहीं ली…इसने गांव बहा दिए…सड़कें बहा दीं…पुलों को अपनी चपेट में ले लिया…जलविद्युत परियोजनाओं को नुकसान पहुंचाया…नेपाल और चीन के बीच जमीन का संपर्क काट दिया…और सबसे बड़ी चिंता ये है कि इस आपदा में बड़ी संख्या में लोग अभी भी लापता बताए जा रहे हैं।
इन लापता लोगों में भारतीय नागरिक भी शामिल हैं और इनमें कई ऐसे लोग हैं जो कैलाश मानसरोवर यात्रा पर गए थे।यानी नेपाल की इस त्रासदी का असर सिर्फ नेपाल तक सीमित नहीं है…भारत भी इसकी चिंता में शामिल है…चीन का तिब्बत इलाका भी प्रभावित है…और हिमालय का एक ऐसा पुराना कॉरिडोर भी इस आपदा की चपेट में आया है, जो सदियों से भारत, नेपाल, चीन और तिब्बत के बीच आवाजाही और व्यापार का अहम रास्ता रहा है।
तो आखिर नेपाल में ये तबाही आई कैसे?क्या एक भूकंप ने इस जलप्रलय की जमीन तैयार की?
क्या बर्फ और चट्टानों के खिसकने से अचानक पानी और मलबे का ऐसा सैलाब आया, जिसे संभलने का लोगों को मौका तक नहीं मिला?क्यों इस बाढ़ का खतरा अभी भी पूरी तरह टला नहीं है?कितने भारतीय लापता हैं?और जिस रसुवागढ़ी कॉरिडोर को 260 साल से ज्यादा पुराना व्यापारिक रास्ता बताया जा रहा है, वहां ऐसा क्या हुआ कि आज सड़क, पुल और सीमा संपर्क तक तबाह हो गया?
आज की इस पूरी रिपोर्ट में नेपाल की इस जलप्रलय की एक-एक कड़ी को समझेंगे…
नेपाल के रसुवा जिले में तिब्बत सीमा के पास आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड में कम से कम 162 लोगों की मौत की बात सामने आई है।लेकिन मौतों का आंकड़ा ही पूरी कहानी नहीं है।
लापता लोगों की संख्या को लेकर अलग-अलग अपडेट सामने आए हैं। शुरुआती जानकारी में करीब 400 लोगों के लापता होने की बात कही गई, जबकि बाद के अपडेट में यह संख्या लगभग 750 और कुछ रिपोर्टिंग में 844 तक बताई गई है।यानी स्थिति इतनी गंभीर है कि राहत और बचाव अभियान के साथ-साथ लापता लोगों की सही संख्या का पता लगाना भी एक बड़ी चुनौती बन गया है।और इन लापता लोगों में करीब 133 भारतीय और 37 NRI बताए गए हैं।कई भारतीय कैलाश मानसरोवर यात्रा पर गए हुए थे।
सोचिए…जो लोग आस्था और तीर्थयात्रा के लिए हिमालय पहुंचे थे, वे अचानक एक ऐसी प्राकृतिक आपदा के बीच फंस गए, जहां कुछ ही मिनटों में पानी, मलबा, पत्थर और बर्फ सब कुछ अपने साथ बहाने लगे।यही वजह है कि भारत में भी इस घटना को लेकर चिंता काफी बढ़ गई है।इस पूरी त्रासदी के बीच भारत सरकार भी सक्रिय हुई है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह से बातचीत कर संवेदना व्यक्त की।भारत ने हर संभव मानवीय सहायता उपलब्ध कराने की बात कही है।भारतीय वायुसेना के विमानों के जरिए राहत सामग्री भेजे जाने की जानकारी सामने आई है और NDRF की टीमों को भी राहत-बचाव अभियान के लिए लगाया गया है।यानी नेपाल की इस आपदा में भारत सिर्फ संवेदना व्यक्त करने तक सीमित नहीं है, बल्कि राहत अभियान में सहयोग की तैयारी भी कर रहा है।नेपाल की ओर से भी भारत की मदद के लिए आभार जताया गया है।सबसे बड़ी चिंता उन भारतीयों को लेकर है जिनका अभी तक पता नहीं चल पाया है।
अब इस पूरी कहानी का सबसे अहम सवाल…आखिर अचानक इतना पानी आया कहां से?
नेपाल के विदेश मंत्री के मुताबिक स्थानीय समयानुसार सुबह करीब 8 बजकर 37 मिनट पर तिब्बत इलाके में भूकंप आया और उसके लगभग तीन मिनट बाद अचानक बाढ़ की खबर सामने आई।यानी भूकंप और बाढ़ के बीच समय का अंतर बेहद कम था। शुरुआती आकलन में यह आशंका जताई गई कि भूकंप के झटकों से हिमनद या बर्फ का हिस्सा प्रभावित हुआ होगा।इसके बाद नदी में बर्फ और चट्टानों के खिसकने से भारी मात्रा में मलबा नीचे की ओर आया।और यही मलबा पानी के साथ मिलकर एक बेहद खतरनाक मलबे वाली बाढ़, यानी डेब्रिस फ्लड में बदल गया।
यानी यह सिर्फ सामान्य बारिश का पानी नहीं था…

इसमें पानी के साथ बर्फ, चट्टानें, मिट्टी और भारी मलबा भी बह रहा था।
और जब ऐसा सैलाब संकरी हिमालयी घाटियों में नीचे की ओर आता है, तो उसके सामने आने वाली सड़क, पुल, वाहन या इमारत के लिए बच पाना बेहद मुश्किल हो जाता है।
तबाही का एक बड़ा केंद्र बना लेंडे नदी का इलाका।लेंडे नदी में बर्फ और चट्टानों के खिसकने से मलबे वाली बाढ़ आने की बात सामने आई है।
अब यहां एक और बेहद अहम जानकारी सामने आती है।
नेपाल के बाढ़ पूर्वानुमान प्रभाग के मुताबिक नदी के अवरुद्ध होने वाली जगह पर बनी झील का पानी अभी पूरी तरह नहीं निकला है।
इसलिए भोटेकोशी और त्रिशूली नदी के आसपास अभी भी खतरा बना हुआ है।
लोगों से नदियों से दूर रहने और सुरक्षित स्थानों पर रहने की अपील की गई है।
रसुवा, नुवाकोट, धादिंग, चितवन और गोरखा में नदी किनारे रहने वाले लोगों को भी सतर्क रहने को कहा गया है।
मतलब राहत-बचाव अभियान जारी है, लेकिन खतरा खत्म नहीं हुआ है।
क्योंकि पहाड़ों में पानी का रास्ता अगर कहीं रुक जाए और वहां अस्थायी झील बन जाए, तो उसके अचानक टूटने की स्थिति में दोबारा तेज बहाव पैदा हो सकता है।
नेपाल सरकार ने आपात बैठक के बाद राहत और बचाव के लिए सेना, सशस्त्र पुलिस बल और नेपाल पुलिस को प्रभावित इलाकों में भेजा।नेपाली सेना ने 12 हेलीकॉप्टर राहत एवं बचाव अभियान में लगाए।सुरक्षा बलों ने अलग-अलग जगहों पर फंसे 100 से ज्यादा लोगों को सुरक्षित निकालने की जानकारी दी है।लेकिन मुश्किल यह है कि सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों में पहुंचना ही आसान नहीं है।
इस त्रासदी की एक और बड़ी चिंता अंतरराष्ट्रीय स्तर की है।नेपाल के गृह मंत्रालय के अनुसार बड़ी संख्या में लापता लोग चीन की तरफ के बताए गए हैं।नेपाल में लापता भारतीयों में करीब 133 भारतीय और 37 एनआरआई बताए गए हैं।
इस बाढ़ के बाद सामने आए वीडियो इस तबाही की भयावहता को और स्पष्ट करते हैं।वीडियो में तेज बहाव के साथ पानी और मलबे की विशाल लहरें दिखाई देती हैं।कहीं पानी दो मंजिला इमारत के ऊपर से गुजरता नजर आया…कहीं कारें तेज बहाव में बहती दिखाई दीं…कहीं पुल पानी के दबाव में टूटते हुए नजर आए…और एक वीडियो में चार मंजिला इमारत तक बाढ़ के पानी में बहती दिखाई देने की बात सामने आई है।
अब यहां एक और बड़ी बात सामने आती है।
इस इलाके ने पिछले साल भी बाढ़ का कहर देखा था।जुलाई 2025 में भोटेकोशी में आई बाढ़ ने भारी नुकसान किया था और रसुवा में कम से कम 10 लोगों की मौत की जानकारी दी गई थी।
कई आयातित इलेक्ट्रिक वाहन और कार्गो वाहन भी बाढ़ में बह गए थे।
यानी जिस इलाके में इस बार इतनी बड़ी तबाही हुई, वह पहले भी बाढ़ के खतरे का सामना कर चुका था।
नेपाल की इस तबाही ने 2013 की उत्तराखंड केदारनाथ त्रासदी की याद भी ताजा कर दी है।
दोनों घटनाओं की परिस्थितियां बिल्कुल एक जैसी नहीं हैं, लेकिन अचानक पानी और मलबे के विशाल प्रवाह से पैदा हुई तबाही ने लोगों को उस दर्दनाक आपदा की याद दिला दी।पहाड़ों में जब पानी को अचानक तेज बहाव मिलता है, तो वह अपने रास्ते में आने वाली चीजों को सिर्फ डुबोता नहीं…कई बार उन्हें उठाकर अपने साथ बहा ले जाता है।इसीलिए हिमालयी क्षेत्रों में शुरुआती चेतावनी, नदी की निगरानी और समय पर लोगों को सुरक्षित जगह पहुंचाना बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।
हिमालय को अक्सर हम बर्फ से ढके खूबसूरत पहाड़ों के रूप में देखते हैं…लेकिन यही हिमालय अपने भीतर भूकंप, ग्लेशियर, तेज बहाव वाली नदियों और अचानक आने वाली प्राकृतिक आपदाओं का भी खतरा समेटे हुए है।नेपाल की यह त्रासदी एक बार फिर याद दिलाती है कि पहाड़ों में प्राकृतिक आपदा कभी चेतावनी देकर नहीं आती।कुछ मिनट…कभी-कभी कुछ सेकेंड…और पूरा भूगोल बदल सकता है।फिलहाल सबसे बड़ी उम्मीद यही है कि बचाव दल ज्यादा से ज्यादा लोगों को सुरक्षित निकाल सकें…लापता लोगों की तलाश जल्द पूरी हो…भारतीय नागरिकों और कैलाश मानसरोवर यात्रियों की सुरक्षित जानकारी उनके परिवारों तक पहुंचे…और नेपाल के जिन इलाकों ने इस जलप्रलय में अपना सब कुछ खो दिया है, वहां जिंदगी फिर से पटरी पर लौट सके।नेपाल की इस तबाही पर हमारी नजर लगातार बनी रहेगी।










