पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में भारी कटौती, रुपये पर बढ़ रहे तेल के दबाव से राहत

ऊर्जा संकट के बीच केंद्र सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर लगने वाली एक्साइज ड्यूटी में बड़ी राहत दी है। अब पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी 13 रुपये से घटाकर सिर्फ 3 रुपये कर दी गई है, जबकि डीजल पर यह पूरी तरह खत्म कर दी गई है।सरकार का यह कदम ऐसे समय में आया है जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं और इसका असर देश की तेल कंपनियों और आम जनता दोनों पर पड़ रहा है।

वित्त मंत्रालय ने 26 मार्च को अधिसूचना जारी की। इसके अनुसार:

यह फैसला तुरंत प्रभाव से लागू कर दिया गया है।

पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें लगभग 50% तक बढ़ गई थीं। कुछ समय पहले यह 119 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी, लेकिन फिलहाल यह लगभग 100 डॉलर प्रति बैरल पर स्थिर है।

इस बढ़ोतरी का असर भारत की तेल कंपनियों पर पड़ा, जैसे HPCL, BPCL और IOC, जो लगातार नुकसान झेल रही थीं।

रेटिंग एजेंसी ICRA के मुताबिक, अगर कच्चा तेल 100–105 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर बना रहता है, तो तेल कंपनियों को:

इसका असर आम जनता पर

सरकार ने फिलहाल पेट्रोल-डीजल की कीमतें स्थिर रखी हैं। दिल्ली में वर्तमान कीमतें:

इस एक्साइज ड्यूटी में कटौती से दो असर हो सकते हैं:

  1. तेल कंपनियों को नुकसान से राहत मिलेगी
  2. भविष्य में कीमतों बढ़ने से रोका जा सकता है

लेकिन इसका सीधा फायदा आम जनता को तभी मिलेगा जब तेल कंपनियां कीमतों में बदलाव नहीं करेंगी।

अंतरराष्ट्रीय स्थिति का प्रभाव

भारत अपनी जरूरत का लगभग 88% कच्चा तेल और 50% प्राकृतिक गैस आयात करता है, जिसमें से अधिकांश होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते आता है।

पश्चिम एशिया में संघर्ष बढ़ने के कारण ईरान ने इस मार्ग को अवरुद्ध कर दिया, जिससे तेल टैंकरों की आवाजाही लगभग ठप हो गई और वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित हुई।

तेल कंपनियों की स्थिति

सरकारी कंपनियां फिलहाल कीमतें स्थिर रखे हुए हैं। लेकिन निजी कंपनियां दबाव में हैं। उदाहरण:

देश के करीब 90% फ्यूल मार्केट पर सरकारी कंपनियों का नियंत्रण है, इसलिए उनका फैसला अहम है।

एक्साइज ड्यूटी क्या है?

एक्साइज ड्यूटी या उत्पाद शुल्क वह टैक्स है जो केंद्र सरकार पेट्रोल और डीजल पर लगाती है। इसका मुख्य उद्देश्य:

यानि यह टैक्स सीधे तौर पर देश की अर्थव्यवस्था से जुड़ा है।सरकार का यह फैसला तेल कंपनियों को राहत देने और आम जनता पर कीमतों का बोझ न बढ़ने का संतुलन बनाने की कोशिश है।आने वाले दिनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार और तेल कंपनियों की रणनीति तय करेगी कि इस कदम का वास्तविक असर आपकी जेब पर कितना पड़ेगा।

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