देश की 27 राज्यसभा सीटों पर होने वाले चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। सभी प्रमुख दल अपने-अपने उम्मीदवारों और रणनीतियों को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। राज्यसभा चुनाव केवल सीटों की संख्या का मामला नहीं होता, बल्कि यह राज्यों में राजनीतिक ताकत और दलों के प्रभाव का भी महत्वपूर्ण संकेत माना जाता है। यही वजह है कि इस बार का चुनाव सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को उम्मीद है कि चुनाव के बाद उच्च सदन में उसकी स्थिति पहले से और मजबूत होगी। हाल के वर्षों में कई राज्यों में मिली चुनावी सफलताओं का असर राज्यसभा के आंकड़ों पर भी दिखाई दे सकता है। यदि अनुमान के अनुसार परिणाम आते हैं, तो एनडीए को विधायी कार्यों को आगे बढ़ाने में और अधिक मजबूती मिल सकती है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के सामने अपनी मौजूदा ताकत को बनाए रखने की चुनौती है। कुछ राज्यों में विधायकों की संख्या और राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए विपक्ष को क्रॉस-वोटिंग की आशंका भी सता रही है। ऐसे में सभी दल अपने विधायकों के साथ लगातार संपर्क बनाए हुए हैं और संगठनात्मक स्तर पर सतर्कता बरत रहे हैं। गुजरात, मध्य प्रदेश और अन्य महत्वपूर्ण राज्यों पर राजनीतिक विश्लेषकों की विशेष नजर बनी हुई है। कई राज्यों में विधानसभा की संख्या बल के आधार पर चुनाव का परिणाम लगभग तय माना जा रहा है, जबकि कुछ सीटों पर मुकाबला रोचक हो सकता है। इन चुनावों के नतीजे भविष्य की राजनीतिक रणनीतियों और गठबंधनों को भी प्रभावित कर सकते हैं। राज्यसभा चुनाव के परिणाम केवल उच्च सदन की संरचना को ही नहीं बदलेंगे, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। आगामी संसद सत्रों और बड़े विधेयकों को देखते हुए सभी दल इस चुनाव को गंभीरता से ले रहे हैं। यही कारण है कि राजनीतिक गलियारों में राज्यसभा चुनाव 2026 को लेकर लगातार चर्चाएं और अटकलें तेज होती जा रही हैं।
राज्यसभा का मौजूदा समीकरण और NDA का मिशन
राज्यसभा चुनाव 2026 को लेकर सत्ताधारी और विपक्षी दलों के बीच राजनीतिक गतिविधियां लगातार तेज हो रही हैं। मौजूदा समय में भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन की उच्च सदन में मजबूत मौजूदगी है और आगामी चुनावों के बाद उसके और अधिक मजबूत होने की संभावना जताई जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कई राज्यों में अनुकूल समीकरणों का लाभ एनडीए को मिल सकता है। राज्यसभा की जिन सीटों पर चुनाव होने जा रहे हैं, उनमें बड़ी संख्या ऐसी है जहां विधानसभा में मौजूद संख्याबल के आधार पर एनडीए समर्थित उम्मीदवारों की स्थिति मजबूत मानी जा रही है। यदि अनुमान के अनुरूप परिणाम आते हैं, तो गठबंधन का कुल आंकड़ा और बढ़ सकता है। इससे उच्च सदन में सरकार की राजनीतिक पकड़ पहले की तुलना में ज्यादा प्रभावशाली हो जाएगी। विशेषज्ञों का मानना है कि राज्यसभा में संख्या बढ़ने से केंद्र सरकार को विधायी कार्यों में अतिरिक्त मजबूती मिलेगी। कई महत्वपूर्ण विधेयकों और नीतिगत फैसलों को पारित कराने में उच्च सदन की भूमिका बेहद अहम होती है। ऐसे में बेहतर संख्या बल सरकार के लिए राजनीतिक और संसदीय दोनों स्तरों पर फायदेमंद साबित हो सकता है। वहीं विपक्षी दलों के लिए यह चुनाव अपनी उपस्थिति और प्रभाव बनाए रखने की चुनौती लेकर आया है। कांग्रेस सहित कई दल उन राज्यों पर विशेष ध्यान दे रहे हैं जहां मुकाबला अपेक्षाकृत कड़ा माना जा रहा है। विपक्ष की कोशिश होगी कि वह अपनी सीटों की संख्या में गिरावट को रोके और उच्च सदन में प्रभावी भूमिका बनाए रखे। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि राज्यसभा चुनाव के नतीजे केवल सीटों के आंकड़े तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि आने वाले वर्षों की राष्ट्रीय राजनीति को भी प्रभावित कर सकते हैं। चुनाव परिणाम यह तय करेंगे कि संसद में विभिन्न मुद्दों पर सरकार और विपक्ष की ताकत का संतुलन किस दिशा में आगे बढ़ेगा। यही कारण है कि इन चुनावों पर पूरे राजनीतिक जगत की नजरें टिकी हुई हैं।

किन दिग्गजों का कार्यकाल हो रहा है खत्म?
मल्लिकार्जुन खरगे (कांग्रेस अध्यक्ष)
एच.डी. देवेगौड़ा (पूर्व प्रधानमंत्री)
दिग्विजय सिंह (मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री)
जॉर्ज कुरियन और रवनीत सिंह बिट्टू (केंद्रीय मंत्री)
मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सांसें अटकीं
कर्नाटक और राजस्थान का क्या है हाल
राज्यसभा चुनाव 2026 में कर्नाटक और राजस्थान ऐसे राज्य बनकर उभरे हैं, जहां के नतीजों पर राजनीतिक दलों की खास नजर बनी हुई है। दोनों राज्यों में विधानसभा के मौजूदा गणित के आधार पर प्रमुख दल अपनी-अपनी रणनीति तैयार कर रहे हैं। चुनावी प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही संभावित उम्मीदवारों के नामों को लेकर भी चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। कर्नाटक में सत्तारूढ़ कांग्रेस की स्थिति मजबूत मानी जा रही है। विधानसभा में पर्याप्त संख्या बल होने के कारण पार्टी को राज्यसभा की कई सीटों पर बढ़त मिलने की उम्मीद है। कांग्रेस नेतृत्व इन चुनावों को अपनी राजनीतिक ताकत के प्रदर्शन के रूप में देख रहा है और इसी वजह से अनुभवी नेताओं को उच्च सदन में भेजने की रणनीति पर काम किया जा रहा है। दूसरी ओर राजस्थान में मुकाबला अपेक्षाकृत अधिक रोचक माना जा रहा है। राज्य में विधानसभा की मौजूदा स्थिति को देखते हुए भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों अपनी-अपनी संभावनाओं का आकलन कर रही हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यहां सीटों का बंटवारा दलों के संख्याबल के अनुरूप हो सकता है, लेकिन उम्मीदवारों के चयन और राजनीतिक समीकरणों का भी अहम प्रभाव पड़ेगा। राजस्थान में संभावित उम्मीदवारों को लेकर चर्चाएं लगातार तेज हो रही हैं। विभिन्न दल ऐसे नेताओं को मौका देने पर विचार कर रहे हैं, जो राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी की आवाज को मजबूत कर सकें। राज्यसभा चुनाव अक्सर अनुभवी और वरिष्ठ नेताओं को संसद के उच्च सदन तक पहुंचाने का माध्यम बनते हैं, इसलिए उम्मीदवार चयन को काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। विश्लेषकों के अनुसार कर्नाटक और राजस्थान के परिणाम केवल इन राज्यों तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति पर भी असर डाल सकते हैं। राज्यसभा में सीटों की संख्या बढ़ने या घटने से संसद में दलों की ताकत प्रभावित होती है। यही कारण है कि दोनों राज्यों के चुनावी समीकरणों पर राजनीतिक दलों के साथ-साथ राजनीतिक पर्यवेक्षकों की भी पैनी नजर बनी हुई है।
गुजरात में पहली बार कांग्रेस का ‘सूपड़ा साफ‘
राज्यसभा चुनाव 2026 में कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती गुजरात से सामने आती दिखाई दे रही है। राज्य में पार्टी की विधानसभा में घटती ताकत का असर अब उच्च सदन के प्रतिनिधित्व पर भी पड़ता नजर आ रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा संख्या बल को देखते हुए कांग्रेस के लिए राज्यसभा में अपनी मौजूदगी बनाए रखना बेहद कठिन हो गया है। गुजरात लंबे समय तक कांग्रेस के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण राज्यों में शामिल रहा है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में पार्टी का जनाधार और विधायकों की संख्या लगातार कम हुई है। इसी वजह से राज्यसभा चुनाव में पार्टी की स्थिति कमजोर मानी जा रही है। यदि अनुमान के अनुरूप परिणाम आते हैं, तो राज्यसभा में गुजरात से कांग्रेस का प्रतिनिधित्व समाप्त हो सकता है, जो पार्टी के लिए एक बड़ा राजनीतिक झटका माना जाएगा। दूसरी ओर झारखंड में कांग्रेस की स्थिति पूरी तरह गठबंधन सहयोगियों के समर्थन पर निर्भर करती दिखाई दे रही है। राज्य में पार्टी अपने दम पर मजबूत स्थिति में नहीं है, इसलिए उसे सीटों के बंटवारे और राजनीतिक समर्थन के लिए सहयोगी दलों पर भरोसा करना पड़ रहा है। गठबंधन की एकजुटता यहां चुनावी नतीजों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। झारखंड में सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर सीटों को लेकर होने वाली बातचीत पर भी सभी की नजरें टिकी हुई हैं। कांग्रेस को उम्मीद है कि गठबंधन सहयोगी दल उसके हितों को ध्यान में रखते हुए उचित राजनीतिक भागीदारी सुनिश्चित करेंगे। यही कारण है कि राज्यसभा चुनाव से पहले दलों के बीच लगातार संवाद और समन्वय की प्रक्रिया जारी है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि गुजरात और झारखंड की परिस्थितियां कांग्रेस के सामने मौजूद दो अलग-अलग तस्वीरें पेश करती हैं। एक ओर गुजरात में पार्टी को अपने घटते संगठनात्मक प्रभाव का सामना करना पड़ रहा है, वहीं दूसरी ओर झारखंड में गठबंधन राजनीति उसके लिए अवसर का रास्ता खोल सकती है। राज्यसभा चुनाव के नतीजे यह स्पष्ट करेंगे कि कांग्रेस आने वाले समय में उच्च सदन में अपनी स्थिति को किस हद तक बनाए रखने में सफल रहती है।
3 सीटों पर उपचुनाव का गणित भी समझें
सुनेत्रा पवार की सीट: बारामती विधानसभा उपचुनाव जीतने के बाद सुनेत्रा पवार ने राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया था, जिससे यह सीट खाली हुई.
देबाशीष सामंतराय की सीट: ओडिशा के इस नेता ने बीजू जनता दल (BJD) छोड़कर भाजपा (BJP) का दामन थाम लिया था, जिसके बाद उन्होंने इस्तीफा दिया.
तीसरी सीट भी हालिया राजनीतिक दलबदल और इस्तीफे के कारण खाली हुई है.