BREAKING

Himachal PradeshIndia

चूड़धार जातर में उमड़ा श्रद्धा और आस्था का सैलाब

Sirmaur जिले के राजगढ़ क्षेत्र में आस्था, परंपरा और संस्कृति का अद्भुत संगम देखने को मिला। क्षेत्र के आराध्य देव शिरगुल महाराज की तीन दिवसीय पावन चूड़धार जातर श्रद्धा और धार्मिक उल्लास के साथ संपन्न हुई। इस ऐतिहासिक यात्रा में नौ तबीन क्षेत्र सहित आसपास के गांवों से पहुंचे सैकड़ों श्रद्धालुओं ने भाग लेकर सदियों पुरानी परंपरा का निर्वहन किया। ने जाने में लगभग 40 कि मी पैदल सफर करके वैदिक मंत्रोच्चार के बीच चूड़धार में देव स्नान कराया गया, जबकि पूरी यात्रा के दौरान श्रद्धालु भक्ति गीतों और जयघोष से वातावरण को भक्तिमय बनाए रहे। प्रस्तुत है यह विशेष रिपोर्ट। आस्था के शिखर पर पहुंची शिरगुल महाराज की चूड़धार जातर ने तय किया लगभग 40 कि मी का सफर, तीन दिवसीय धार्मिक यात्रा में उमड़ा जनसैलाब, वैदिक विधि-विधान से हुआ देव स्नान, सदियों पुरानी परंपरा का हुआ निर्वहन। राजगढ़ उपमंडल के शाया गांव से 27 जून को आरंभ हुई भगवान शिरगुल महाराज की पारंपरिक चूड़धार जातर तीन दिनों के बाद श्रद्धा और उल्लास के साथ संपन्न हो गई। नौ तबीन क्षेत्र सहित आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस यात्रा में शामिल हुए। पूरे मार्ग में “जय शिरगुल महाराज” के जयघोष गूंजते रहे और श्रद्धालु भक्ति में लीन नजर आए। जातर ने लगभग 40 कि मी का पैदल सफर तय किया। धार्मिक परंपरा के अनुसार जातर का पहला पड़ाव बांगा पानी में रहा, जहां देव पूजन और रात्रि विश्राम के बाद श्रद्धालु अगले दिन चूड़धार के लिए रवाना हुए। पाछले मोड़ पर विधिवत पूजा-अर्चना की गई और दोपहर में चूड़धार पहुंचकर वैदिक मंत्रोच्चार के बीच भगवान शिरगुल महाराज का पवित्र स्नान कराया गया। इस दौरान श्रद्धालुओं ने भी पवित्र स्नान कर विशेष पूजा-अर्चना में भाग लिया।
जब जातर भगवान शिरगुल महाराज की जन्मभूमि शाया पहुंची, तब श्रद्धालुओं ने जोरदार स्वागत किया। विभिन्न गांवों में लोगों ने फूलों और मालाओं से जातर का अभिनंदन किया, साथ ही श्रद्धालुओं के लिए चाय, पेयजल और जलपान की व्यवस्था करके सेवा का परिचय दिया। “यह जातर हर तीन साल में आषाढ़ मास के दूसरे रविवार को भगवान शिरगुल महाराज के चूड़धार स्नान के लिए आयोजित की जाती है। यह हमारी प्राचीन धार्मिक परंपरा है। इस बार भी नौ तबीन क्षेत्र सहित सैकड़ों श्रद्धालुओं ने पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ यात्रा में हिस्सा लिया। देव कृपा से जातर शांतिपूर्ण और सफलतापूर्वक संपन्न हुई।” शिरगुल महाराज की यह पवित्र जातर सिर्फ धार्मिक घटना नहीं, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर, सामाजिक एकता और लोक आस्था का एक जीवंत प्रतीक भी है। हर तीन वर्ष में निकलने वाली इस यात्रा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होकर अपनी आस्था का इज़हार करते हैं और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं को आगे बढ़ाते हैं।

चूड़धार जातर आस्था परंपरा और भक्ति का अद्भुत संगम

जातर का पहला विश्राम स्थल बांगा पानी था, जहां भक्तों ने विधिपूर्वक देवता की पूजा की और रात्रि विश्राम किया। अगले दिन सभी भक्त चूड़धार की ओर आगे बढ़े। मार्ग में विभिन्न स्थानों पर पारंपरिक विधियों के अनुसार पूजा-अर्चना की गई और धार्मिक अनुष्ठान किए गए। पाछले मोड़ पर श्रद्धालुओं ने विशेष पूजा की और दोपहर में चूड़धार शिखर पर पहुंचकर वैदिक मंत्रों का उच्चारण करते हुए भगवान शिरगुल महाराज का पवित्र स्नान कराया गया। इस दौरान अनेक श्रद्धालुओं ने भी पवित्र स्नान कर आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त किया और पूजा में भाग लिया। यात्रा के पूरे समय भक्ति गीतों, शिरगुल गाथा और धार्मिक जयघोषों ने माहौल को आध्यात्मिक बना दिया। श्रद्धालु भक्ति में लीन दिखाई दिए और पूरे मार्ग में अनुशासन और परंपराओं का पालन किया गया। इस जातर की एक विशेष परंपरा यह है कि श्रद्धालु यात्रा के दौरान किसी भी प्रकार के छत या आवरण का उपयोग नहीं करते और खुले आसमान के नीचे विश्राम करते हैं। इसे त्याग, अनुशासन और गहरी आस्था का प्रतीक माना जाता है, जो इस परंपरा को और विशेष बनाता है। वापसी यात्रा के दौरान जब जातर शिरगुल महाराज की जन्मस्थली शाया पहुंची, तो गांव वालों ने श्रद्धालुओं का भव्य स्वागत किया। विभिन्न गांवों में लोगों ने फूल-मालाओं से जातर का अभिनंदन किया और चय, पानी तथा जलपान की व्यवस्था कर सेवा भाव का परिचय दिया। इस अवसर पर पूर्व मुखिया रणवीर सिंह ने बताया कि यह जातर हर तीसरे वर्ष आषाढ़ मास के दूसरे रविवार को आयोजित होती है। उन्होंने कहा कि यह सदियों पुरानी परंपरा है, जिसे आज भी श्रद्धा और उत्साह से मनाया जाता है।

Leave A Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Related Posts

Subscribe to Our Newsletter!

This will close in 0 seconds