Delhi में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से कई अहम सवाल पूछे हैं। RTI कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज और अमृता जोहरी की याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने खास तौर पर ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ के आधार पर जारी किए जा रहे नोटिस की प्रक्रिया पर स्पष्टीकरण मांगा। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बड़ी संख्या में जारी किए गए नोटिस देखने पर ऐसा प्रतीत होता है कि वे लगभग यांत्रिक तरीके से जारी किए गए हैं। अदालत ने चुनाव आयोग से यह स्पष्ट करने को कहा कि ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ से उसका सटीक मतलब क्या है और किन मानकों के आधार पर किसी मतदाता के रिकॉर्ड को इस श्रेणी में रखा गया। इस मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि करीब 33 लाख मतदाताओं को ‘नो मैपिंग’ या ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ के आधार पर नोटिस मिले हैं। याचिका में इन नोटिसों के पीछे इस्तेमाल किए गए मानदंड, तकनीकी पैरामीटर और प्रक्रिया को सार्वजनिक करने की मांग की गई है। कुल 33,12,919 मतदाताओं को इन दोनों श्रेणियों में चिन्हित किया गया है। इनमें 13,79,785 मतदाता ऐसे हैं जिनका पिछली SIR मतदाता सूची से ‘मैपिंग’ नहीं हो पाई, जबकि 19,33,134 मतदाताओं के रिकॉर्ड में ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ दर्ज की गई है। याचिकाकर्ताओं ने नोटिस में दिए जाने वाले कारणों को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि कुछ मामलों में नाम, माता-पिता के नाम या उम्र से जुड़े अंतर का उल्लेख किया गया, लेकिन संबंधित पुराने रिकॉर्ड की पर्याप्त जानकारी नहीं दी गई। ऐसे में मतदाताओं के लिए यह समझना मुश्किल हो सकता है कि उन्हें किस विशेष रिकॉर्ड या जानकारी के आधार पर जवाब देना है। सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए लगाए गए कर्मचारियों की संख्या की जानकारी भी चुनाव आयोग से मांगी है। सुनवाई के दौरान आयोग की ओर से बताया गया कि बड़ी संख्या में BLO और ERO इस प्रक्रिया में काम कर रहे हैं। वहीं, अधिकारियों के मुताबिक नोटिस मिलना अपने आप में मतदाता का नाम हटाने का आदेश नहीं है; संबंधित व्यक्ति को जवाब देने और दस्तावेज पेश करने का अवसर दिया जाता है। इस बीच दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने नोटिस से जुड़े बूथ-वार आंकड़े और कारणों की जानकारी भी सार्वजनिक की है। इसमें ‘नो मैपिंग’ के अलावा नाम या अन्य विवरणों में दर्ज विसंगतियों जैसी जानकारियां शामिल हैं। SIR प्रक्रिया में नोटिस पाने वाले मतदाताओं के लिए सुनवाई और दस्तावेज जमा करने की प्रक्रिया जारी है। चुनाव अधिकारियों के अनुसार, नोटिस मिलने का मतलब सीधे तौर पर मतदाता सूची से नाम हटना नहीं है। अंतिम निर्णय से पहले संबंधित मतदाता को अपनी स्थिति स्पष्ट करने का अवसर दिया जाना है। अब सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद चुनाव आयोग को ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ की परिभाषा, नोटिस जारी करने की प्रक्रिया और इस काम के लिए लगाए गए संसाधनों से जुड़ी जानकारी अदालत के सामने रखनी होगी। दिल्ली की अंतिम मतदाता सूची को लेकर आगे की प्रक्रिया में इस जवाब की अहम भूमिका रहेगी।
कोर्ट के सुझाव
दिल्ली में SIR प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान मतदाताओं की परेशानियों को कम करने के लिए कई सुझाव सामने आए। अदालत ने माना कि अलग-अलग तरह की आपत्तियों के लिए स्पष्ट और आसान जानकारी उपलब्ध कराना जरूरी है, ताकि लोगों को यह समझने में परेशानी न हो कि नोटिस का जवाब किस तरह दिया जाना है। सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने सुझाव दिया कि यदि मतदाताओं को 15 से 20 अलग-अलग प्रकार की आपत्तियों के आधार पर नोटिस मिल रहे हैं, तो प्रत्येक श्रेणी के लिए एक मानक जवाब तैयार किया जा सकता है। इससे नोटिस पाने वाले लोगों को यह समझने में मदद मिलेगी कि संबंधित आपत्ति के जवाब में उन्हें कौन-कौन से दस्तावेज या जानकारी उपलब्ध करानी है। अदालत की ओर से यह भी कहा गया कि जवाब देने की प्रक्रिया जितनी स्पष्ट होगी, मतदाताओं के बीच उतना ही भरोसा बढ़ेगा। एक तय प्रारूप या उदाहरण उपलब्ध होने से लोगों को बार-बार अलग-अलग कार्यालयों के चक्कर लगाने की जरूरत कम हो सकती है और अधिकारी भी समान प्रकार के मामलों को एक व्यवस्थित तरीके से देख सकेंगे। सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने सुझाव दिया कि बूथ लेवल अधिकारियों यानी BLO को वार्ड कार्यालयों में उपलब्ध कराया जा सकता है। इससे जिन मतदाताओं को नोटिस मिला है, वे संबंधित कार्यालय में पहुंचकर अपनी समस्या सीधे अधिकारी के सामने रख सकेंगे और जवाब तैयार करने में जरूरी सहायता ले सकेंगे। चुनाव आयोग की ओर से बताया गया कि मतदाताओं की सुविधा के लिए इस दिशा में पहले से कई कदम उठाए जा रहे हैं। आयोग के मुताबिक अलग-अलग स्थानों पर सहायता कैंप आयोजित किए जा रहे हैं, जहां लोगों को SIR से जुड़ी प्रक्रिया और नोटिस के संबंध में जानकारी दी जा रही है। इसके अलावा मतदाताओं की सहायता के लिए व्हाट्सऐप ग्रुप भी बनाए गए हैं। इनके जरिए लोगों तक जरूरी सूचनाएं पहुंचाने और उनकी समस्याओं का समाधान करने की कोशिश की जा रही है। इस व्यवस्था का उद्देश्य यह है कि नोटिस प्राप्त करने वाले मतदाताओं को जवाब दाखिल करने की प्रक्रिया समझने में आसानी हो। SIR को लेकर चल रही सुनवाई में अब प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और लोगों के लिए आसान बनाने पर भी ध्यान दिया जा रहा है। सहायता कैंप और BLO की उपलब्धता जैसे सुझावों के जरिए मतदाताओं को अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए बेहतर सुविधा देने की बात सामने आई है।

दिल्ली में SIR की स्थिति
दिल्ली में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR के तहत 31 अगस्त को ड्राफ्ट मतदाता सूची जारी की गई। इस सूची में कुल 97,53,577 मतदाताओं के नाम शामिल हैं, जबकि 30 जून की सूची में करीब 1.45 करोड़ मतदाता दर्ज थे। इस तरह ड्राफ्ट सूची में करीब 47.56 लाख नाम शामिल नहीं हैं। ड्राफ्ट सूची से बाहर रहने वाले नामों को अलग-अलग श्रेणियों में रखा गया है। इनमें अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत और डुप्लीकेट जैसे मामले शामिल हैं। चुनाव अधिकारियों के अनुसार, ड्राफ्ट सूची में नाम नहीं होने वाले पात्र मतदाताओं को अपनी जानकारी और जरूरी दस्तावेजों के साथ दावा दाखिल कर दोबारा नाम शामिल कराने का अवसर दिया गया है। SIR के दौरान सिर्फ उन मतदाताओं के रिकॉर्ड की जांच नहीं हुई जिनके नाम ड्राफ्ट सूची में नहीं आए, बल्कि सूची में शामिल लाखों मतदाताओं के रिकॉर्ड में भी कुछ विसंगतियां चिन्हित की गई हैं। करीब 33.13 लाख मतदाताओं को ‘No Mapping’ और ‘Logical Discrepancies’ जैसी श्रेणियों में रखा गया है। करीब 13.80 लाख मतदाताओं का रिकॉर्ड 2002 की पुरानी SIR मतदाता सूची से मैप नहीं हो पाया है। वहीं लगभग 19.33 लाख मतदाताओं के रिकॉर्ड में ‘Logical Discrepancy’ दर्ज की गई है। इन मामलों में पुराने और मौजूदा रिकॉर्ड के बीच जानकारी के अंतर को सत्यापन के लिए जांच के दायरे में रखा गया है। इस पूरी प्रक्रिया को लेकर अब सुप्रीम कोर्ट में भी सवाल उठ रहे हैं। अदालत ने चुनाव आयोग से ‘Logical Discrepancy’ की स्पष्ट व्याख्या और ऐसे नोटिस जारी करने के आधार की जानकारी मांगी है। मामले में याचिकाकर्ताओं ने यह भी सवाल उठाया है कि मतदाताओं को दिए जा रहे नोटिस में आपत्ति के कारण और उसका जवाब देने के तरीके को पर्याप्त रूप से स्पष्ट किया जाना चाहिए। ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से नाम गायब होना अंतिम तौर पर मतदाता सूची से नाम हटने के बराबर नहीं है। संबंधित मतदाताओं के लिए दावा और आपत्ति दर्ज कराने की प्रक्रिया रखी गई है। दिल्ली चुनाव कार्यालय के मुताबिक, ड्राफ्ट सूची में नाम नहीं मिलने वाले लोग तय प्रक्रिया के तहत 30 सितंबर तक अपना दावा दाखिल कर सकते हैं। SIR की प्रक्रिया आगे बढ़ने के साथ अब सबसे ज्यादा ध्यान उन मतदाताओं पर है जिनके नाम ड्राफ्ट सूची में नहीं हैं और उन लोगों पर भी जिन्हें रिकॉर्ड में विसंगति के चलते नोटिस जारी किए गए हैं। दावे, दस्तावेजों और सत्यापन के आधार पर आगे की प्रक्रिया पूरी की जाएगी, जिसके बाद दिल्ली की अंतिम मतदाता सूची जारी होगी।
दिल्ली में चल रही विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR प्रक्रिया के तहत बड़ी संख्या में मतदाताओं के रिकॉर्ड की दोबारा जांच की जा रही है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार करीब 33.13 लाख मतदाताओं को ‘नो मैपिंग’ और ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ जैसी श्रेणियों के तहत नोटिस जारी किए गए हैं। इनमें लगभग 13.80 लाख रिकॉर्ड नो मैपिंग और करीब 19.33 लाख रिकॉर्ड लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी के तहत रखे गए हैं। यह मामला उस समय और महत्वपूर्ण हो गया जब 31 अगस्त को जारी दिल्ली की ड्राफ्ट मतदाता सूची में करीब 47.56 लाख नाम शामिल नहीं किए गए। इन नामों को अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत या डुप्लीकेट यानी ASDD श्रेणी से जोड़ा गया है। दूसरी ओर, 33 लाख से अधिक ऐसे मतदाता हैं जिनके नाम ड्राफ्ट सूची में मौजूद हैं, लेकिन उनके रिकॉर्ड को अतिरिक्त सत्यापन के लिए चिन्हित किया गया है। ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ को लेकर सबसे बड़ा सवाल इसके स्पष्ट मानकों का है। याचिकाकर्ताओं ने अदालत के सामने यह मुद्दा उठाया है कि मतदाताओं को नोटिस भेजते समय उन्हें यह पर्याप्त रूप से बताया जाना चाहिए कि रिकॉर्ड में किस तरह की विसंगति मिली है और उसका जवाब देने के लिए कौन सी जानकारी या दस्तावेज जरूरी होंगे। इसी विषय पर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से इस श्रेणी के आधार और प्रक्रिया की स्पष्ट जानकारी मांगी है। सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान अदालत ने बड़ी संख्या में जारी किए गए नोटिस को लेकर भी सवाल उठाए। अदालत ने चुनाव आयोग से यह बताने को कहा कि करीब 33 लाख मामलों को देखने के लिए कितने अधिकारियों और कर्मचारियों को लगाया गया है। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि अलग-अलग प्रकार की आपत्तियों के लिए FAQ या मानक जवाब उपलब्ध कराने से मतदाताओं को प्रक्रिया समझने में मदद मिल सकती है। इसी बीच दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने नोटिस पाने वाले मतदाताओं से जुड़ा बूथ-वार डेटा सार्वजनिक किया है। इसमें कुछ मामलों में नामों के अंतर और पुराने रिकॉर्ड से संबंधित अलग-अलग तरह की विसंगतियों की जानकारी दी गई है। इससे पहले केवल कुल आंकड़े सामने थे, जबकि नए विवरण में नोटिस के पीछे बताए गए कारणों को अधिक स्पष्ट रूप से दर्ज किया गया है।चुनाव प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों की ओर से यह स्पष्ट किया गया है कि SIR नोटिस मिलना अपने आप में मतदाता का नाम अंतिम सूची से हटने का मतलब नहीं है। नोटिस पाने वाले व्यक्ति को अपनी स्थिति स्पष्ट करने और आवश्यक दस्तावेज या जानकारी उपलब्ध कराने का अवसर दिया जाता है। इसके बाद रिकॉर्ड का सत्यापन किया जाना है और अंतिम मतदाता सूची में नाम को लेकर फैसला संबंधित प्रक्रिया के आधार पर होगा। अब सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग के जवाब पर नजर रहेगी। अदालत के सामने ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ की परिभाषा, नोटिस जारी करने के आधार और इस पूरी प्रक्रिया को संभालने के लिए उपलब्ध मानव संसाधन से जुड़े सवाल हैं। SIR की अंतिम प्रक्रिया पूरी होने से पहले इन मुद्दों पर मिलने वाला स्पष्टीकरण उन मतदाताओं के लिए महत्वपूर्ण होगा जिन्हें अपने रिकॉर्ड के संबंध में नोटिस मिला है।









