अभी 37 लाख से ज्यादा अपीलें लंबित
पश्चिम बंगाल में SIR से जुड़ी अपीलों के निपटारे को लेकर चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में अहम आंकड़े साझा किए हैं। आयोग के अनुसार, ट्रिब्यूनलों ने अप्रैल के मध्य से इन मामलों की सुनवाई शुरू की थी। इसके बाद से अब तक 1,26,194 अपीलों का निपटारा किया जा चुका है। ट्रिब्यूनलों में मामलों के निपटारे की मौजूदा गति करीब 25,238 अपील प्रति माह है। यह आंकड़ा उस स्थिति को ध्यान में रखकर निकाला गया है, जिसमें सप्ताह के सभी सात दिनों को कामकाजी दिन माना गया है। इसके बावजूद लंबित मामलों की संख्या काफी अधिक बनी हुई है। 16 सितंबर तक ट्रिब्यूनलों के सामने 37,05,235 अपीलें लंबित थीं। यानी अब भी लाखों मामलों पर सुनवाई और फैसला बाकी है। इतनी बड़ी संख्या में मामलों के लंबित रहने से इनके निपटारे में लगने वाले समय को लेकर चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के सामने स्थिति स्पष्ट की है। चुनाव आयोग की गणना के अनुसार, अगर ट्रिब्यूनल इसी रफ्तार से लगातार काम करते रहे तो मौजूदा बैकलॉग को खत्म करने में करीब 146 महीने लग सकते हैं। यह अवधि 12 साल से भी अधिक बैठती है। आयोग ने इसी आधार पर लंबित मामलों के जल्द निपटारे के लिए अतिरिक्त ट्रिब्यूनलों की जरूरत पर जोर दिया है। अब इस मामले में आगे की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर निर्भर करेगी। बड़ी संख्या में लंबित अपीलों को देखते हुए सुनवाई की क्षमता बढ़ाना इस पूरी प्रक्रिया का अहम हिस्सा बन सकता है। फिलहाल चुनाव आयोग की ओर से दिए गए आंकड़ों ने SIR से जुड़ी अपीलों के भारी बैकलॉग और मौजूदा निपटारे की गति को सामने रखा है।

42 लोकसभा सीटों के हिसाब से ट्रिब्यूनल बनाने का प्रस्ताव
पश्चिम बंगाल में SIR से जुड़ी लंबित अपीलों के बढ़ते बोझ को देखते हुए चुनाव आयोग ने ट्रिब्यूनलों की संख्या बढ़ाने की मांग की है। आयोग ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के सामने अपना प्रस्ताव रखा है। उसका कहना है कि मौजूदा व्यवस्था में बड़ी संख्या में मामलों की सुनवाई बाकी है, इसलिए अतिरिक्त ट्रिब्यूनल की जरूरत है। पश्चिम बंगाल की 42 लोकसभा सीटों के आधार पर 42 ट्रिब्यूनल बनाए जाएं। यानी प्रत्येक लोकसभा क्षेत्र के लिए एक ट्रिब्यूनल रखने का सुझाव दिया गया है। आयोग का मानना है कि इससे मामलों को अलग-अलग स्तर पर बांटकर सुनवाई की प्रक्रिया को व्यवस्थित किया जा सकता है। SIR के दौरान मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने से जुड़े बड़ी संख्या में मामले सामने आए हैं। इन मामलों में लोगों की ओर से दाखिल की गई अपीलों पर सुनवाई की जानी है। ऐसे में ट्रिब्यूनलों की संख्या बढ़ने से लंबित मामलों को निपटाने के लिए अतिरिक्त न्यायिक क्षमता उपलब्ध हो सकती है। अगर ज्यादा ट्रिब्यूनल उपलब्ध होते हैं तो एक ही जगह पर मामलों का दबाव कम किया जा सकेगा। इससे अपीलों की सुनवाई और दस्तावेजों की जांच जैसे काम अलग-अलग ट्रिब्यूनलों में किए जा सकेंगे। आयोग इसी आधार पर प्रक्रिया को तेज करने की जरूरत बता रहा है। अब इस प्रस्ताव पर सुप्रीम कोर्ट के रुख पर नजर रहेगी। अदालत की ओर से ट्रिब्यूनलों की संख्या बढ़ाने को लेकर जो भी दिशा-निर्देश दिए जाएंगे, उसके आधार पर आगे की व्यवस्था तय होगी। फिलहाल चुनाव आयोग का जोर SIR से जुड़ी लंबित अपीलों की सुनवाई को तेजी से आगे बढ़ाने पर है।
38.31 लाख अपीलें दाखिल, नाम जोड़ने और हटाने दोनों से जुड़े मामले
पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR के बाद बड़ी संख्या में अपीलें ट्रिब्यूनलों तक पहुंची हैं। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, SIR से जुड़े आदेशों के खिलाफ कुल 38.31 लाख अपीलें दाखिल की गई हैं। इन मामलों में मतदाता सूची में नाम शामिल करने और हटाने, दोनों तरह के विवाद शामिल हैं। करीब 22.21 लाख अपीलें ऐसे लोगों की ओर से दाखिल की गई हैं, जिनके नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं। इन लोगों ने अपना नाम दोबारा मतदाता सूची में शामिल करने की मांग की है। इससे पता चलता है कि नाम हटाए जाने से जुड़े मामलों की संख्या काफी बड़ी है और इन पर ट्रिब्यूनलों में सुनवाई हो रही है। दूसरी तरफ करीब 16.10 लाख अपीलें ऐसे नामों को लेकर हैं, जिन्हें मतदाता सूची में शामिल किया गया है। इन मामलों में अपील करने वालों ने सूची में जोड़े गए नामों पर आपत्ति जताई है। यानी SIR के बाद सामने आई कानूनी प्रक्रिया सिर्फ हटाए गए नामों की बहाली तक सीमित नहीं है, बल्कि नए शामिल किए गए नामों को लेकर भी बड़ी संख्या में मामले मौजूद हैं।अब तक ट्रिब्यूनलों ने 1,26,194 अपीलों पर अपना फैसला सुनाया है। इनमें 1,13,943 मामलों में संबंधित आवेदकों के नाम दोबारा मतदाता सूची में शामिल करने का निर्णय हुआ। यानी जिन मामलों पर अभी तक फैसला आया है, उनमें बड़ी संख्या नाम बहाली से जुड़ी रही है। अब तक निपटाई गई अपीलों में 90 प्रतिशत से अधिक मामलों में नाम दोबारा मतदाता सूची में जोड़े गए हैं। हालांकि, लाखों अपीलें अभी भी लंबित हैं और उन पर सुनवाई बाकी है। ऐसे में आने वाले समय में ट्रिब्यूनलों के सामने लंबित मामलों का निपटारा करना बड़ी जिम्मेदारी बनी हुई है।
चुनाव नतीजों पर SIR के असर के दावे को EC ने नकारा
पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान मतदाता सूची से हटाए गए नामों को लेकर चुनावी नतीजों पर असर के दावों पर चुनाव आयोग ने अपना पक्ष सामने रखा है। आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में कहा कि केवल हटाए गए मतदाताओं की संख्या को किसी विधानसभा सीट पर जीत के अंतर से जोड़कर चुनाव परिणाम पर सीधा निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है। ऐसी तुलना करते समय मतदाता सूची में शामिल अलग-अलग श्रेणियों को भी ध्यान में रखना जरूरी है। आयोग ने बताया कि अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत और डुप्लीकेट जैसी श्रेणियों में दर्ज प्रविष्टियों को इस तरह की गणना में अलग-अलग तरीके से देखना पड़ता है। इसलिए सिर्फ डिलीट किए गए नामों की संख्या को आधार बनाना पूरी तस्वीर नहीं दिखाता। चुनाव आयोग ने इस तरह की तुलना को लेकर आपत्ति जताते हुए कहा कि केवल दो आंकड़ों यानी हटाए गए नाम और जीत के अंतर को सामने रखकर चुनाव परिणामों पर SIR के प्रभाव का आकलन नहीं किया जा सकता। इस तरीके में मतदाता सूची से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं को नजरअंदाज कर दिया जाता है। अपने पक्ष को समझाने के लिए आयोग ने कुछ ऐसी विधानसभा सीटों का भी उल्लेख किया, जहां मतदाता सूची से हटाए गए नामों की संख्या संबंधित चुनावी जीत के अंतर से अधिक थी। इसके बावजूद इन सीटों पर तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार चुनाव जीतने में सफल रहे। आयोग ने इसे अपने तर्क के समर्थन में उदाहरण के तौर पर पेश किया। इस पूरे विवाद के बीच SIR से जुड़े आंकड़ों और उनके चुनावी प्रभाव को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए हैं। चुनाव आयोग का कहना है कि मतदाता सूची में हुए बदलावों और चुनाव परिणामों के बीच सीधा संबंध स्थापित करने के लिए सिर्फ हटाए गए नामों और जीत के अंतर की तुलना पर्याप्त नहीं है। इस मुद्दे पर अंतिम स्थिति अदालत के समक्ष चल रही प्रक्रिया और उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर ही स्पष्ट होगी।
अभी 19 ट्रिब्यूनल कर रहे अपीलों की सुनवाई
पश्चिम बंगाल में SIR से जुड़ी लाखों अपीलों के निपटारे को लेकर सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। अदालत ने चुनाव आयोग से लंबित मामलों की संख्या और अब तक हुए निपटारे का पूरा ब्योरा मांगा था। साथ ही यह भी पूछा गया था कि बड़ी संख्या में लंबित अपीलों को तय समय में निपटाने के लिए कितने अतिरिक्त ट्रिब्यूनलों की जरूरत होगी। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद कलकत्ता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने 19 अपीलीय ट्रिब्यूनल गठित किए। इन ट्रिब्यूनलों की अध्यक्षता हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीशों और न्यायाधीशों को सौंपी गई है। इनका मुख्य काम SIR के दौरान मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने से जुड़े मामलों पर आई अपीलों की सुनवाई करना है। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, SIR से संबंधित कुल 38.31 लाख अपीलें दाखिल की गई हैं। इनमें 22.21 लाख मामले ऐसे हैं, जिनमें मतदाता सूची से हटाए गए नामों को दोबारा शामिल करने की मांग की गई है। वहीं 16.10 लाख अपीलें उन नामों को चुनौती देने से संबंधित हैं, जिन्हें मतदाता सूची में शामिल किया गया है। इससे ट्रिब्यूनलों के सामने मौजूद मामलों की व्यापकता का अंदाजा लगाया जा सकता है। अब तक जिन मामलों पर फैसला हुआ है, उनमें नाम बहाली से जुड़े फैसले बड़ी संख्या में रहे हैं। आयोग के अनुसार, ट्रिब्यूनलों ने 1,26,194 अपीलों का निपटारा किया है। इनमें 1,13,943 मामलों में आवेदकों के नाम दोबारा मतदाता सूची में शामिल करने का निर्णय लिया गया। यानी अब तक निपटाए गए मामलों में 90 फीसदी से अधिक में नाम बहाल हुए हैं। SIR के चुनावी नतीजों पर संभावित असर को लेकर उठाए गए सवालों पर भी चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के सामने अपना पक्ष रखा है। आयोग का कहना है कि केवल हटाए गए मतदाताओं की संख्या को किसी सीट के जीत के अंतर से जोड़ना पर्याप्त आधार नहीं है। आयोग के अनुसार अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत और डुप्लीकेट जैसी अलग-अलग श्रेणियों को भी आंकड़ों का आकलन करते समय ध्यान में रखना जरूरी है। अब चुनाव आयोग ने लंबित मामलों के दबाव को देखते हुए 42 ट्रिब्यूनल बनाने का प्रस्ताव रखा है। यह प्रस्ताव पश्चिम बंगाल की 42 लोकसभा सीटों के आधार पर है। आयोग का कहना है कि अतिरिक्त ट्रिब्यूनल बनने से मामलों को ज्यादा संख्या में मंचों पर सुना जा सकेगा और लंबित अपीलों के निपटारे की प्रक्रिया को गति मिल सकती है। अब इस प्रस्ताव पर सुप्रीम कोर्ट के अगले निर्देश का इंतजार है।









