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POK में झुकी पाकिस्तान सरकार: प्रदर्शनकारियों की अधिकतर मांगें मानीं, समझौते पर हुए हस्ताक्षर POK में घटा तनाव

पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (POK) में पिछले कई महीनों से जारी जनआंदोलन के बाद आखिरकार पाकिस्तान सरकार को झुकना पड़ ही गया है। लोगों के लगातार विरोध प्रदर्शनों और हिंसक झड़पों के दबाव में सरकार ने प्रदर्शनकारियों की अधिकतर मांगें मान ली हैं। देर रात सरकार और प्रदर्शनकारियों के प्रतिनिधियों के बीच समझौते पर हस्ताक्षर किए गए, जिसके बाद क्षेत्र में तनाव में थोड़ी कमी आई है।

प्रदर्शन का कारण

POK में हाल के महीनों में लोग बिजली और गेहूं की बढ़ती कीमतों, भ्रष्टाचार, और सरकारी भेदभाव के खिलाफ सड़कों पर उतर आए थे।नागरिकों का आरोप था कि पाकिस्तान की सरकार उनके संसाधनों का शोषण कर रही है, जबकि उन्हें बुनियादी सुविधाएं तक नहीं मिल रही हैं। खासकर बिजली दरों को लेकर भारी नाराजगी थी। स्थानीय लोग कहते रहे हैं कि नेहरू जलविद्युत परियोजना से उत्पन्न बिजली पंजाब और इस्लामाबाद भेजी जाती है, जबकि POK के आम नागरिकों को महंगे दामों पर बिजली खरीदनी पड़ती है।

क्या थीं प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांगें

प्रदर्शनकारियों की मांग थी कि  बिजली के दाम स्थानीय उत्पादन लागत के अनुसार तय किए जाएं।लोगों को   गेहूं और आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में राहत दी जाए। स्थानीय सरकार में पारदर्शिता बढ़ाई जाए और भ्रष्टाचार पर कानूनी कार्रवाई हो।

समझौते में क्या हुआ

सरकार ने प्रदर्शनकारियों के साथ हुई बातचीत में उनकी कई प्रमुख मांगों को स्वीकार कर लिया।

समझौते के मुख्य मांगे थी कि –

बिजली की दरें तत्काल प्रभाव से कम की जाएंगी।

गेहूं सब्सिडी को बहाल किया जाएगा।

स्थानीय प्रशासन में भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ जांच शुरू की जाएगी।

प्रदर्शन के दौरान हुई गिरफ्तारियां रद्द की जाएंगी और गिरफ्तार लोगों को रिहा किया जाएगा।

भविष्य में ऐसे विरोध प्रदर्शनों से पहले बातचीत की प्रक्रिया स्थापित की जाएगी।

कैसे बढ़ा विरोध आंदोलन?

यह आंदोलन मई 2025 से धीरे-धीरे तेज हुआ था।पहले यह सिर्फ बिजली और गेहूं के दामों को लेकर था, लेकिन बाद में इसमें बेरोजगारी, करों की नीति और राजनीतिक उपेक्षा जैसे मुद्दे भी शामिल हो गए।कई बार पुलिस और सुरक्षा बलों के साथ झड़पें भी हुईं, जिनमें कई लोग घायल और कुछ मारे गए।हालात इतने बिगड़ गए कि कई जगहों पर कर्फ्यू तक लगाना पड़ा।

सरकार का रुख और झुकाव

इस्लामाबाद में बैठी पाकिस्तान सरकार ने पहले इस आंदोलन को “स्थानीय असंतोष” करार देते हुए नजरअंदाज किया था, लेकिन धीरे-धीरे जब आंदोलन पूरे क्षेत्र में फैल गया और अंतरराष्ट्रीय मीडिया का ध्यान इस ओर गया, तब सरकार पर दबाव बढ़ा।प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की सरकार ने “बातचीत से समाधान” की नीति अपनाई।उच्च स्तरीय समिति को मुजफ्फराबाद भेजा गया, जिसने स्थानीय नेताओं और प्रदर्शनकारियों से कई दौर की वार्ता की।आखिरकार 3 दिनों की लगातार बातचीत के बाद समझौते पर हस्ताक्षर हुए।

प्रदर्शनकारियों का बयान

समझौते के बाद आंदोलन के नेताओं ने कहा —

“हमारी लड़ाई अपने अधिकारों के लिए थी, पाकिस्तान सरकार ने आखिरकार हमारी आवाज सुनी। अब हमें देखना होगा कि वादे कितने ईमानदारी से पूरे किए जाते हैं।”लोगों ने राहत तो महसूस की, लेकिन भरोसा जताने से पहले “कार्रवाई देखने” की बात कही है।

भारत की प्रतिक्रिया

भारतीय विश्लेषकों का कहना है किPOK  में बढ़ते विरोध प्रदर्शन इस बात का प्रमाण हैं कि पाकिस्तान वहां के लोगों को बराबरी का हक नहीं दे पा रहा है। भारत ने हमेशा POK  को अपना अभिन्न हिस्सा बताया है और यह कहा है कि वहां के नागरिकों की दुर्दशा पाकिस्तानी प्रशासन की विफलता का परिणाम है।संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय मानवाधिकार संगठनों ने POK में मानवाधिकारों के उल्लंघन पर पहले भी चिंता जताई थी। अब इस समझौते के बाद स्थिति पर नजर रखी जा रही है कि क्या वास्तव में स्थानीय लोगों की स्थितियां सुधरती हैं या नहीं।

POK  में हुए इस समझौते को वहां के लोगों की लोकशक्ति की जीत माना जा रहा है।

 

 

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