केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकों के लिए कागज खरीद से जुड़े विवाद पर सख्त रुख अपनाया है। उन्होंने उन अधिकारियों की भूमिका की जांच के निर्देश दिए हैं, जो दिल्ली हाई कोर्ट में परिषद के फैसले का प्रभावी ढंग से पक्ष नहीं रख सके। मंत्रालय का कहना है कि सरकारी मामलों में किसी भी स्तर की प्रशासनिक या कानूनी लापरवाही को गंभीरता से लिया जाएगा। यह मामला उस कंपनी से जुड़ा है, जिसे एनसीईआरटी ने अपनी खरीद प्रक्रिया से दो वर्षों के लिए बाहर करने का निर्णय लिया था। कंपनी ने इस फैसले को चुनौती देते हुए दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अब इस पूरे मामले में ब्लैकलिस्टिंग की प्रक्रिया और उससे जुड़े प्रशासनिक निर्णयों की भी समीक्षा की जाएगी। सुनवाई के दौरान एनसीईआरटी की ओर से कोई प्रतिनिधि अदालत में उपस्थित नहीं होने की बात सामने आई। इसके बाद हाई कोर्ट ने कंपनी को अंतरिम राहत प्रदान करते हुए अगले आदेश तक उसके खिलाफ किसी भी प्रकार की कार्रवाई पर रोक लगा दी। इस घटनाक्रम के बाद मंत्रालय ने पूरे मामले की विस्तृत रिपोर्ट तलब की है। शिक्षा मंत्रालय ने अधिकारियों की जवाबदेही तय करने के निर्देश देते हुए यह भी कहा है कि भविष्य में अदालतों में सरकारी संस्थानों का पक्ष पूरी तैयारी और जिम्मेदारी के साथ रखा जाना चाहिए। साथ ही यह भी जांच की जाएगी कि खरीद प्रक्रिया के दौरान सभी नियमों और पात्रता शर्तों का पालन किया गया था या नहीं। मंत्रालय का कहना है कि छात्रों तक समय पर पाठ्यपुस्तकें पहुंचाना सर्वोच्च प्राथमिकता है। इसलिए खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता, जवाबदेही और समयबद्ध कार्य सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएंगे। जांच रिपोर्ट आने के बाद संबंधित अधिकारियों के खिलाफ आगे की कार्रवाई की जाएगी।

NCERT टेंडर मामले में जांच तेज, 20 जुलाई को अगली सुनवाई
एनसीईआरटी की खरीद प्रक्रिया से जुड़े इस विवाद ने सरकारी संस्थानों में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है। शिक्षा मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर यह सुनिश्चित किया जाएगा कि भविष्य में किसी भी स्तर पर प्रक्रिया संबंधी चूक दोबारा न हो। मंत्रालय का कहना है कि छात्रों से जुड़े मामलों में किसी भी प्रकार की लापरवाही स्वीकार नहीं की जाएगी। जांच के दौरान अधिकारियों से खरीद प्रक्रिया से संबंधित सभी दस्तावेज, टेंडर शर्तें और निर्णय लेने की पूरी प्रक्रिया का विवरण मांगा जाएगा। यदि किसी स्तर पर नियमों का उल्लंघन, प्रक्रियागत कमी या प्रशासनिक लापरवाही सामने आती है, तो उसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाएगी। साथ ही भविष्य में ऐसी परिस्थितियों से बचने के लिए आवश्यक सुधारात्मक कदम भी सुझाए जाएंगे। शिक्षा मंत्रालय ने इस बात पर भी जोर दिया है कि पाठ्यपुस्तकों की समय पर उपलब्धता छात्रों की पढ़ाई से सीधे जुड़ा विषय है। इसलिए कागज की आपूर्ति, छपाई और वितरण की पूरी व्यवस्था की समीक्षा की जाएगी, ताकि आने वाले शैक्षणिक सत्रों में किसी प्रकार की देरी न हो और स्कूलों तक किताबें निर्धारित समय पर पहुंच सकें। दूसरी ओर, संबंधित कंपनी ने अदालत में अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों को देरी का प्रमुख कारण बताया है। कंपनी का कहना है कि आवश्यक रसायनों की कमी के कारण उत्पादन प्रभावित हुआ, जिससे कागज की आपूर्ति तय समय पर नहीं हो सकी। इन दावों की सत्यता का आकलन अदालत और जांच एजेंसियों द्वारा उपलब्ध दस्तावेजों एवं तथ्यों के आधार पर किया जाएगा। सभी की निगाहें दिल्ली हाई कोर्ट में होने वाली अगली सुनवाई और शिक्षा मंत्रालय द्वारा मांगी गई जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं। इन दोनों के आधार पर यह तय होगा कि मामले में आगे क्या प्रशासनिक और कानूनी कदम उठाए जाएंगे। मंत्रालय ने दोहराया है कि पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता, जवाबदेही और नियमों का पालन सर्वोच्च प्राथमिकता रहेगी।