Lucknow के अलीगंज क्षेत्र में हुए भीषण अग्निकांड ने पूरे शहर को झकझोर कर रख दिया है। इस हादसे में 15 लोगों की दर्दनाक मौत के बाद अब जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे कई पुराने दस्तावेज सामने आ रहे हैं, जिन्होंने मामले को एक नए नजरिए से देखे जाने पर मजबूर कर दिया है। जांच में यह सामने आया है कि जिस इमारत में यह हादसा हुआ, उसके खिलाफ वर्ष 2016 में लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) द्वारा ध्वस्तीकरण का आदेश जारी किया गया था। यह कार्रवाई अवैध निर्माण और नियमों के उल्लंघन को लेकर की गई थी। हालांकि हैरानी की बात यह है कि यह ध्वस्तीकरण आदेश कुछ ही समय बाद, केवल दो महीनों के भीतर ही रद्द कर दिया गया। इस फैसले के बाद अब यह सवाल उठ रहा है कि आखिर किस आधार पर और किन परिस्थितियों में यह आदेश वापस लिया गया। इसके बाद वर्षों तक इस भवन में किसी प्रकार की सख्त कार्रवाई नहीं की गई। धीरे-धीरे इस आवासीय इमारत का उपयोग व्यावसायिक गतिविधियों के लिए होने लगा, जिसमें कोचिंग सेंटर और अन्य संस्थान संचालित किए जाने लगे। बढ़ती गतिविधियों और छात्रों की भारी आवाजाही के बावजूद समय रहते सुरक्षा और नियमों के पालन को लेकर ठोस कदम नहीं उठाए गए, जिससे यह पूरा मामला अब प्रशासनिक लापरवाही और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।


Lucknow अग्निकांड लापरवाही और जांच के घेरे में सिस्टम
लखनऊ के अलीगंज में हुए भीषण अग्निकांड के बाद अब प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। इस हादसे में 15 लोगों की मौत के बाद स्थानीय स्तर पर हुई शिकायतों और जारी किए गए नोटिसों के बावजूद समय पर प्रभावी कार्रवाई न होने को लेकर कई अधिकारियों की भूमिका जांच के दायरे में है। प्रारंभिक जांच में यह तथ्य सामने आया है कि वर्ष 2014 से 2026 के बीच लगभग 30 अधिकारी, इंजीनियर और प्रशासनिक कर्मी इस क्षेत्र में तैनात रहे। अब यह जांच का विषय बन गया है कि इतने लंबे समय तक नियमों के उल्लंघन के बावजूद ठोस कार्रवाई क्यों नहीं की गई। इस पूरे घटनाक्रम ने भवन सुरक्षा मानकों के पालन और प्रशासनिक निगरानी प्रणाली की गंभीर खामियों को उजागर किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते नियमों को सख्ती से लागू किया जाता, तो इस दर्दनाक हादसे को रोका जा सकता था। वर्तमान में मामले की जांच SIT के हवाले है, जो लगातार संबंधित अधिकारियों और दस्तावेजों की जांच कर रही है। कुछ अधिकारियों पर निलंबन और गिरफ्तारी की कार्रवाई भी की गई है, लेकिन जांच अभी निर्णायक मोड़ पर नहीं पहुंची है। पीड़ित परिवारों का दर्द इस हादसे के साथ और गहरा हो गया है। जिन परिवारों ने अपने बच्चों को बेहतर भविष्य के सपनों के साथ भेजा था, उनके लिए यह घटना जीवनभर का असहनीय आघात बन गई है। अब पूरा देश इस जांच के नतीजों का इंतजार कर रहा है कि क्या यह केवल एक दुर्घटना थी या वर्षों की लापरवाही का परिणाम।










