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DMK को SC की फटकार

करूर भगदड़ मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान अदालत ने याचिकाकर्ता पक्ष से कई महत्वपूर्ण सवाल पूछे। मामले में मुख्यमंत्री विजय और राज्य के मंत्रियों की सार्वजनिक टिप्पणियों पर रोक लगाने की मांग की गई थी, जिस पर कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए याचिका के आधार पर सवाल उठाए। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि न्यायालय का काम किसी मुख्यमंत्री के भाषण, दौरे या सार्वजनिक गतिविधियों को नियंत्रित करना नहीं है। अदालत ने यह भी कहा कि मुख्यमंत्री विजय इस मामले में आरोपी नहीं हैं, ऐसे में उनके सार्वजनिक कार्यक्रमों या बयानों पर रोक लगाने की मांग को किस आधार पर उचित ठहराया जा सकता है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता से यह भी पूछा कि पीड़ित परिवारों से मुलाकात को गवाहों को प्रभावित करने का प्रयास कैसे माना जा सकता है। न्यायालय का मानना था कि केवल मुलाकात या सहायता प्रदान करने से जांच प्रभावित होने का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। इस दौरान अदालत ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के महत्व पर भी जोर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने यह संकेत भी दिया कि न्यायिक मंच का उपयोग राजनीतिक विवादों को आगे बढ़ाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। अदालत की सख्त टिप्पणियों के बाद याचिकाकर्ता पक्ष पर दबाव बढ़ गया और कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि यदि याचिका वापस नहीं ली गई तो उसे खारिज किया जा सकता है। अदालत के रुख को देखते हुए अंततः याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका वापस लेने का फैसला किया। इसके साथ ही यह मामला एक नए मोड़ पर पहुंच गया। फिलहाल करूर भगदड़ मामले की जांच जारी है और संबंधित एजेंसियां घटना से जुड़े सभी पहलुओं की पड़ताल कर रही हैं।

डीएमके ने याचिका में की थी ये मांग

करूर भगदड़ मामले में दायर एक याचिका ने तमिलनाडु की राजनीति और कानूनी बहस को नया मोड़ दे दिया। इस याचिका में मामले की जांच के दौरान राजनीतिक हस्तक्षेप की आशंका जताते हुए कई मांगें सुप्रीम कोर्ट के समक्ष रखी गई थीं। याचिकाकर्ता का कहना था कि जांच प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष और स्वतंत्र तरीके से आगे बढ़नी चाहिए। याचिका में यह मांग की गई थी कि राज्य के शीर्ष राजनीतिक पदों पर बैठे लोगों को मामले से संबंधित सार्वजनिक बयान देने से रोका जाए। याचिकाकर्ता का तर्क था कि जांच के दौरान दिए गए बयान जनमत को प्रभावित कर सकते हैं और इससे जांच की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो सकते हैं। इसलिए जांच पूरी होने तक सार्वजनिक टिप्पणी से परहेज किए जाने की आवश्यकता बताई गई। इसके अलावा याचिका में पीड़ित परिवारों को दी जाने वाली सरकारी सहायता को लेकर भी चिंता व्यक्त की गई थी। याचिकाकर्ता का कहना था कि मृतकों और घायलों के परिवार जांच में महत्वपूर्ण गवाह हो सकते हैं। ऐसे में जांच पूरी होने से पहले राजनीतिक नेतृत्व और गवाहों के बीच सीधे संपर्क को लेकर सावधानी बरती जानी चाहिए। याचिका में यह भी उल्लेख किया गया था कि सरकार द्वारा राहत और सहायता प्रदान करने पर किसी प्रकार की आपत्ति नहीं है, लेकिन इसकी प्रक्रिया पारदर्शी और जांच एजेंसियों की जानकारी में होनी चाहिए। याचिकाकर्ता का मानना था कि इससे भविष्य में किसी भी प्रकार के विवाद या संदेह की संभावना कम हो सकती है। इस पूरे मामले में अंतिम निर्णय न्यायालय और जांच एजेंसियों के अधिकार क्षेत्र में आता है। करूर भगदड़ मामले की जांच जारी है और संबंधित एजेंसियां घटना से जुड़े सभी तथ्यों की पड़ताल कर रही हैं। ऐसे में आगे की कानूनी प्रक्रिया और जांच रिपोर्ट के आधार पर ही मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

क्या है करूर भगदड़ मामला

27 सितंबर 2025 को टीवीके यानी सीएम विजय की एक रैलीे दौरान करूर में भगदड़ आई थी, जिसमें 41 लोगों की मौत हो गई थी और 142 लोग घायल हुए थे। सुप्रीम कोर्ट ने 13 अक्टूबर 2025 को सीबीआई को इस मामले की जांच सौंपी थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतांत्रिक प्रणाली का एक अहम हिस्सा है। अदालत ने यह भी पूछा कि यदि कोई व्यक्ति सार्वजनिक रूप से बयान दे रहा है, तो वह दूसरों की अभिव्यक्ति पर रोक लगाने की मांग कैसे कर सकता है। कोर्ट की यह टिप्पणी मामले की सुनवाई का एक महत्वपूर्ण पक्ष मानी जा रही है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी मुख्यमंत्री द्वारा पीड़ित परिवारों से मुलाकात करना या सहायता देना अपने आप में जांच को प्रभावित करने के सबूत नहीं हो सकता। न्यायालय ने पूछा कि पीड़ितों से मुलाकात को गवाहों को प्रभावित करने के प्रयास के रूप में किस आधार पर देखा जा रहा है। सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों ने यह भी बताया कि न्यायिक मंच का राजनीतिक उद्देश्यों के लिए उपयोग नहीं होना चाहिए। अदालत ने कहा कि यदि कोई याचिका केवल राजनीतिक विवाद को बढ़ाने के लिए दाखिल की जाती है, तो उसे स्वीकार करना उचित नहीं होगा। इस टिप्पणी के बाद याचिकाकर्ता पक्ष ने अपने दृष्टिकोण पर पुनर्विचार किया।
मामले में याचिकाकर्ता ने स्वयं को पक्षकार बनाने की मांग की थी। उनका कहना था कि वे मामले से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं को अदालत के सामने रखना चाहते हैं। हालांकि, अदालत ने इस मांग पर गंभीर प्रश्न उठाए और पूछा कि इस चरण में उनकी भूमिका क्या होगी। सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणियों के बाद अंततः याचिका वापस लेने का निर्णय लिया गया। अदालत ने संकेत दिया था कि यदि याचिका वापस नहीं ली गई तो उसे खारिज किया जा सकता है। इसके उपरांत याचिकाकर्ता पक्ष ने अपनी याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी, जिसे स्वीकार कर लिया गया। करूर भगदड़ मामला तमिलनाडु की राजनीति में लंबे समय सचर्चित रहा है। इस घटना में बड़ी संख्या में लोगों की जान गई थी और कई लोग घायल हुए थे। घटना के बाद विभिन्न राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों ने जांच को लेकर अपनी-अपनी मांगें उठाई थीं। मामले की जांच केंद्रीय एजेंसी द्वारा जारी है और अदालत भी समय-समय पर इसकी प्रगति पर नजर रख रही है। सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणियों ने स्पष्ट किया है कि जांच प्रक्रिया को स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ने दिया जाना चाहिए और न्यायिक मंच का उपयोग केवल कानूनी मुद्दों के समाधान के लिए होना चाहिए।

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