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CBI कोर्ट में आज भुल्लर की अर्जी पर फैसला

निलंबित डीआईजी हरचरण सिंह भुल्लर और उनके कथित बिचौलिए कृष्णु शारदा से जुड़े रिश्वत मामले में आज चंडीगढ़ स्थित सीबीआई की विशेष अदालत अहम फैसला सुनाने जा रही है। अदालत दोनों आरोपियों द्वारा दायर डिस्चार्ज अर्जी पर अपना निर्णय देगी। इस फैसले पर कानूनी विशेषज्ञों और जांच एजेंसियों की नजर बनी हुई है, क्योंकि इससे मामले की आगे की दिशा तय हो सकती है। भुल्लर की ओर से अदालत में दायर अर्जी में दावा किया गया है कि वह पंजाब सरकार के अधिकारी हैं और उनके खिलाफ सीधे तौर पर एफआईआर दर्ज करने का अधिकार सीबीआई के पास नहीं था। बचाव पक्ष का कहना है कि एजेंसी ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कार्रवाई की और इसी आधार पर उन्हें गिरफ्तार किया गया। इसलिए उनके खिलाफ दर्ज मामले को समाप्त किया जाना चाहिए। बचाव पक्ष ने अदालत के समक्ष यह भी तर्क रखा है कि जांच एजेंसी द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया कानूनी मानकों के अनुरूप नहीं थी। उनका कहना है कि यदि प्रारंभिक कार्रवाई ही अधिकार क्षेत्र के दायरे से बाहर की गई है, तो उसके आधार पर आगे की कार्यवाही भी सवालों के घेरे में आती है। इसी कारण आरोपियों को मामले से मुक्त किए जाने की मांग की गई है। दूसरी ओर, सीबीआई ने इन दलीलों का विरोध करते हुए कहा है कि एजेंसी ने कानून के अनुसार कार्रवाई की है। जांच एजेंसी का कहना है कि शिकायत और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही मामला दर्ज किया गया था और गिरफ्तारी की प्रक्रिया भी कानूनी प्रावधानों के तहत पूरी की गई। सीबीआई का पक्ष है कि आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त आधार मौजूद हैं, इसलिए डिस्चार्ज अर्जी खारिज की जानी चाहिए। अब इस पूरे मामले में अदालत के फैसले का इंतजार किया जा रहा है। यदि अर्जी स्वीकार होती है तो आरोपियों को बड़ी राहत मिल सकती है, जबकि अर्जी खारिज होने पर मामले की सुनवाई आगे बढ़ेगी। ऐसे में आज का फैसला न केवल हरचरण सिंह भुल्लर और कृष्णु शारदा के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि इस चर्चित मामले की आगे की कानूनी प्रक्रिया के लिए भी निर्णायक साबित हो सकता है।

एजेंसी ने कानून के दायरे में रहकर कार्रवाई की

मामले की सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने अदालत के समक्ष कई कानूनी तर्क पेश किए। आरोपियों की ओर से कहा गया कि राज्य कैडर के आईपीएस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय पहले भी सामने आ चुके हैं, जिनका लाभ इस मामले में भी दिया जाना चाहिए। इसी संदर्भ में मद्रास हाईकोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए अदालत से राहत की मांग की गई। बचाव पक्ष का कहना है कि संबंधित फैसले में राज्य कैडर के अधिकारियों के खिलाफ जांच और कार्रवाई की प्रक्रिया को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणियां की गई थीं। उनका तर्क था कि यदि उन कानूनी सिद्धांतों को वर्तमान मामले में लागू किया जाए तो आरोपियों के खिलाफ दर्ज कार्यवाही पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए। इसी आधार पर अदालत से आरोपों से मुक्त करने की मांग रखी गई। वकीलों ने यह भी कहा कि किसी भी सरकारी अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई करते समय निर्धारित कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया जाना आवश्यक है। यदि प्रक्रिया में किसी प्रकार की त्रुटि या अधिकार क्षेत्र से जुड़ा विवाद सामने आता है, तो उसका प्रभाव पूरे मामले पर पड़ सकता है। इसलिए अदालत को इन पहलुओं पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। दूसरी ओर, सीबीआई के सरकारी वकील ने बचाव पक्ष की दलीलों का कड़ा विरोध किया। उन्होंने अदालत को बताया कि जांच एजेंसी ने कानून के सभी प्रावधानों का पालन करते हुए कार्रवाई की है। सीबीआई का कहना है कि मामला दर्ज करने से लेकर गिरफ्तारी और जांच तक की पूरी प्रक्रिया विधि सम्मत तरीके से की गई है। सीबीआई ने अदालत के समक्ष यह भी दलील दी कि उपलब्ध साक्ष्यों और शिकायत के आधार पर की गई कार्रवाई पूरी तरह वैध है। एजेंसी का मानना है कि इस स्तर पर आरोपियों को राहत देने का कोई कानूनी आधार नहीं बनता। अब अदालत के फैसले पर सभी की नजरें टिकी हैं, क्योंकि यही तय करेगा कि मामले की सुनवाई आगे किस दिशा में बढ़ेगी।

8 लाख रुपए रिश्वत मांगने का आरोप

यह मामला पिछले साल तब सामने आया था, जब मंडी गोबिंदगढ़ के व्यापारी आकाश बत्ता की शिकायत पर सीबीआई ने कार्रवाई की थी। शिकायत में यह आरोप था कि एक आपराधिक मामले में गिरफ्तारी का भय दिखाकर उनसे 8 लाख रुपए की रिश्वत मांगी गई थी। इसी शिकायत के आधार पर सीबीआई ने हरचरण सिंह भुल्लर और कृष्णु शारदा को गिरफ्तार किया था। गिरफ्तारी के बाद सीबीआई ने भुल्लर के सेक्टर-40 स्थित घर पर छापा मारा था। जांच के दौरान वहां से लगभग 7.5 करोड़ रुपए नकद, करीब ढाई किलो सोना और कई महंगी घड़ियां बरामद हुई थीं। इसके बाद सीबीआई ने उनके खिलाफ आय से अधिक संपत्ति का मामला भी दर्ज किया। इसी बीच, प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने भी इस मामले में मनी लॉन्ड्रिंग के संबंध में जांच शुरू कर दी है। भुल्लर द्वारा दायर अर्जी में कहा गया है कि वह पंजाब सरकार के अधीन कार्यरत अधिकारी रहे हैं और उनके खिलाफ सीधे एफआईआर दर्ज करने का अधिकार सीबीआई के पास नहीं थ। बचाव पक्ष का कहना है कि एजेंसी ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कार्रवाई की और गिरफ्तारी की प्रक्रिया अपनाई। इसी आधार पर अदालत से पूरे मामले में राहत मांगी गई है। सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने कुछ पूर्व न्यायिक फैसलों का भी उल्लेख किया। उनका तर्क है कि राज्य कैडर के अधिकारियों से जुड़े मामलों में उच्च न्यायालयों द्वारा दिए गए कुछ निर्णय भी इस मामले में लागू हो सकते हैं। वकीलों ने अदालत के सामने यह तर्क रखा कि यदि उन फैसलों की व्याख्या को ध्यान में रखा जाए तो आरोपियों को डिस्चार्ज करने पर विचार किया जा सकता है। दूसरी ओर, सीबीआई ने इन सभी दलीलों का तीखा विरोध किया है। एजेंसी का कहना है कि पूरी कार्रवाई कानून के अनुसार की गई है।
यह मामला तब सुर्खियों में आया जब मंडी गोबिंदगढ़ के एक व्यवसायी ने शिकायत की। शिकायत में यह आरोप लगाया गया कि एक आपराधिक मामले में कार्यवाहीे बचने और गिरफ्तारी से बचने के लिए रिश्वत मांगी गई थी। शिकायत के आधर पर सीबीआई नगहन जांच प्रारंभ की और बद में दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तारी के बाद जांच एजेंसी ने कई स्थानों पर छापे भी मारे। जांच के दौरान बड़ी मात्रा में नकद, सोने और अन्य मूल्यवान सामान की बरामदगी का दावा किया गया। इस बरामदगी के बाद मामला और अधिक गंभीर हो गया और जांच का दायरा बढ़ा दिया गया। एजेंसी ने इन तथ्यों को अपनी जांच का एक महत्वपूर्ण तत्व बताया है। सीबीआई की कार्रवाई के बाद भुल्लर के खिलाफ अवैध संपत्ति से संबंधित मामला भी दर्ज किया गया। जांच एजेंसियां उनकी संपत्तियों, वित्तीय लेन-देन और अन्य निवेशों की विस्तृत जांच कर रही हैं। इसी दौरान प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने भी मामले के वित्तीय पक्षों की जांच शुरू कर दी थी और मनी लॉन्ड्रिंग के संभावित पहलू पर काम हो रहा है। अब सभी की नजरें चंडीगढ़ की विशेष सीबीआई अदालत के निर्णय पर टिकी हैं। यदि अदालत डिस्चार्ज अर्जी स्वीकार करती है तो आरोपियों को बड़ी राहत मिल सकती है, जबकि अर्जी खारिज होने पर मामले की सुनवाई आगे बढ़ेगी। अदालत का यह आदेश न केवल इस चर्चित मामले की दिशा तय करेगा, बल्कि आगे की जांच और कानूनी प्रक्रिया पर भी गहरा असर डाल सकता है।

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