भारत के कृषि निर्यात क्षेत्र को एक साथ दो बड़े झटके लगे हैं, जिसने किसानों और व्यापारियों की चिंता बढ़ा दी है। एक तरफ जापान ने भारतीय आमों के आयात पर रोक लगा दी है, वहीं दूसरी ओर चीन ने भारतीय चावल की कई खेपों को वापस लौटा दिया है। इन घटनाओं ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार और कृषि निर्यात को लेकर नई बहस छेड़ दी है। जापान द्वारा भारतीय आमों पर लगाया गया प्रतिबंध खास तौर पर चिंता का विषय माना जा रहा है। भारतीय आम दुनियाभर में अपनी गुणवत्ता, स्वाद और खुशबू के लिए मशहूर हैं। अल्फांसो, दशहरी और केसर जैसे आमों की विदेशी बाजारों में हमेशा बड़ी मांग रही है। ऐसे में जापान का यह फैसला भारतीय निर्यातकों के लिए बड़ा आर्थिक झटका माना जा रहा है। जापान ने कुछ खेपों में गुणवत्ता और स्वास्थ्य मानकों से जुड़ी आपत्तियां जताई हैं। कहा जा रहा है कि आयात नियमों और फाइटोसैनिटरी मानकों को लेकर सख्ती बढ़ाई गई है। हालांकि भारतीय निर्यातक संगठनों का कहना है कि वे लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन करते आ रहे हैं और इस मामले पर दोनों देशों के बीच बातचीत जरूरी है। करीब दो दशकों बाद भारत और जापान के बीच आम व्यापार को लेकर ऐसी स्थिति सामने आई है। इससे पहले दोनों देशों के बीच कृषि व्यापार काफी सकारात्मक माना जाता था। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह प्रतिबंध लंबे समय तक जारी रहता है तो इसका असर छोटे किसानों और फल निर्यात उद्योग पर पड़ सकता है। दूसरी ओर चीन ने भी भारतीय चावल की कई खेपों को रिजेक्ट कर दिया है। जानकारी के मुताबिक चीन ने अब तक लगभग 70 बार भारतीय चावल की खेपों पर आपत्ति जताई है। इससे भारतीय चावल व्यापारियों में नाराजगी और चिंता दोनों बढ़ गई हैं। निर्यातकों का कहना है कि चीन लगातार तकनीकी कारणों का हवाला देकर भारतीय उत्पादों को रोक रहा है।
व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि चीन और भारत के बीच जारी रणनीतिक तनाव का असर अब व्यापारिक संबंधों पर भी दिखाई देने लगा है। कुछ जानकार इसे केवल गुणवत्ता का मामला नहीं बल्कि आर्थिक दबाव की रणनीति के रूप में भी देख रहे हैं। खासकर ऐसे समय में जब वैश्विक बाजार में भारतीय कृषि उत्पादों की मांग बढ़ रही है। भारतीय बासमती और गैर-बासमती चावल की अंतरराष्ट्रीय बाजार में अच्छी पहचान है। कई देशों में भारतीय चावल की बड़ी मांग रहती है। ऐसे में चीन द्वारा लगातार खेप लौटाए जाने से निर्यातकों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। इससे किसानों की आय और कृषि बाजार दोनों प्रभावित हो सकते हैं। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को अब अपने निर्यात तंत्र को और मजबूत बनाने की जरूरत है। गुणवत्ता जांच, पैकेजिंग और अंतरराष्ट्रीय मानकों के पालन पर अधिक ध्यान देना होगा ताकि भविष्य में ऐसे प्रतिबंधों का सामना कम करना पड़े। साथ ही सरकार को व्यापारिक स्तर पर भी सक्रिय भूमिका निभानी होगी। भारत सरकार की ओर से इस पूरे मामले पर नजर रखी जा रही है। उम्मीद जताई जा रही है कि जापान और चीन के साथ कूटनीतिक तथा व्यापारिक बातचीत के जरिए समाधान निकालने की कोशिश की जाएगी। किसानों और निर्यातकों को भी उम्मीद है कि आने वाले समय में भारतीय कृषि उत्पादों के लिए वैश्विक बाजार फिर से सामान्य होगा।
भारतीय आमों पर जापान ने लगाया बैन


चावल पर चीन ने दिया झटका
भारत के कृषि निर्यात को लेकर एक बार फिर चिंता बढ़ गई है। जापान द्वारा भारतीय आमों पर सख्ती के बाद अब चीन ने भारतीय नॉन-बासमती चावल की खेपों को रिजेक्ट कर दिया है। इस फैसले ने चावल निर्यातकों और किसानों के बीच बेचैनी बढ़ा दी है। जानकारी के अनुसार चीन ने भारतीय चावल की खेपों में जेनेटिकली मॉडिफाइड ऑर्गेनिज्म यानी GMO पाए जाने का दावा किया है। इसी आधार पर कई खेपों को वापस लौटा दिया गया। हालांकि भारत ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज किया है। भारतीय अधिकारियों का कहना है कि देश में कपास को छोड़कर किसी भी जीएम फसल की व्यावसायिक खेती की अनुमति नहीं है। ऐसे में नॉन-बासमती चावल में GMO मिलने की संभावना बेहद कम मानी जा रही है। भारत ने इस मुद्दे पर चीन से तकनीकी स्तर पर स्पष्ट जानकारी भी मांगी है। यह पहली बार नहीं है जब चीन ने भारतीय चावल की खेपों पर आपत्ति जताई हो। रिपोर्ट्स के मुताबिक इससे पहले भी करीब 70 बार भारतीय चावल की खेपों को रोका या वापस किया जा चुका है। मार्च और अप्रैल के दौरान भी कई भारतीय कंपनियों के निर्यात प्रभावित हुए थे। व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की लगातार कार्रवाई से भारत के कृषि निर्यात पर असर पड़ सकता है। वहीं निर्यातकों का कहना है कि यदि यह सिलसिला जारी रहा तो किसानों और चावल उद्योग को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। अब सभी की नजर दोनों देशों के बीच होने वाली आगे की व्यापारिक बातचीत पर टिकी हुई है।










