बिहार की राजनीति से जुड़ी एक बड़ी खबर सामने आई है। पूर्णिया से निर्दलीय सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव को कोर्ट से जमानत मिल गई है, लेकिन इसके बावजूद उन्हें अभी जेल से रिहाई नहीं मिल पाएगी। अलग-अलग मामलों में जारी प्रोडक्शन वारंट और रिमांड के चलते उन्हें फिलहाल पटना के बेऊर जेल में ही रहना होगा।
जानकारी के मुताबिक, पप्पू यादव को कोतवाली थाना और बुद्धा कॉलोनी थाना से जुड़े मामलों में अदालत ने प्रोडक्शन पर लिया है। कोतवाली थाना का मामला साल 2017 से जुड़ा है, जबकि बुद्धा कॉलोनी थाना में दर्ज केस के तहत उन्हें न्यायिक हिरासत में भेजा गया है।
प्रदर्शन के बाद दर्ज हुआ नया मामला
बताया जा रहा है कि जिस दिन पप्पू यादव की गिरफ्तारी हुई थी, उस दिन उनके समर्थकों ने जोरदार विरोध प्रदर्शन किया था। इसी दौरान कथित तौर पर सरकारी काम में बाधा और कानून व्यवस्था बिगाड़ने के आरोप लगाए गए, जिसके आधार पर बुद्धा कॉलोनी थाने में नया केस दर्ज किया गया। फिलहाल इसी मामले में पप्पू यादव को न्यायिक हिरासत में रखा गया है।

31 साल पुराने केस से जुड़ी गिरफ्तारी
गौर करने वाली बात यह है कि पप्पू यादव की गिरफ्तारी 31 साल पुराने विवाद से जुड़े एक मामले में हुई थी। इस कार्रवाई के बाद बिहार की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। विपक्षी दलों ने इस गिरफ्तारी को राजनीति से प्रेरित कार्रवाई बताया है।
कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल (RJD) समेत कई विपक्षी पार्टियों ने सरकार पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया है कि पुराने मामलों को निकालकर पप्पू यादव को फंसाया गया है।
NEET छात्रा केस से जोड़ा जा रहा मामला
विपक्ष का कहना है कि पप्पू यादव हाल ही में पटना की एक NEET छात्रा की संदिग्ध मौत के मामले में लगातार सरकार और प्रशासन से सवाल उठा रहे थे। उन्होंने इस मामले में निष्पक्ष जांच और दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की थी।आरोप है कि इसी वजह से दबाव बनाकर उन्हें पुराने मामलों में गिरफ्तार किया गया, ताकि उनकी आवाज को दबाया जा सके।
प्रशासन ने आरोपों से किया इनकार
वहीं प्रशासन और पुलिस ने इन आरोपों को खारिज किया है। अधिकारियों का कहना है कि कानून अपना काम कर रहा है और किसी तरह की राजनीतिक दुर्भावना नहीं है। पुलिस के अनुसार, पप्पू यादव की गिरफ्तारी पूरी तरह कानूनी प्रक्रिया के तहत की गई है और अदालत के आदेशों का पालन किया जा रहा है।
गरमाई बिहार की सियासत
पप्पू यादव की गिरफ्तारी के बाद बिहार की राजनीति और गरमा गई है। उनके समर्थक लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं और उनकी तुरंत रिहाई की मांग कर रहे हैं। विपक्ष इसे लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़कर देख रहा है।
फिलहाल सभी की निगाहें अदालत की अगली सुनवाई पर टिकी हुई हैं। यह मामला सिर्फ कानूनी लड़ाई नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति में बड़ा असर डालने वाला मुद्दा बन चुका है।