भारतीय नौसेना की ताकत को बढ़ाते हुए तीन अत्याधुनिक स्वदेशी युद्धपोत INS दूनागिरी, INS संशोधक और INS अग्रय को नौसेना के बेड़े में शामिल किया गया है। इन जहाजों का डिजाइन और निर्माण भारत में ही किया गया है, जो रक्षा क्षेत्र में देश की बढ़ती आत्मनिर्भरता का प्रतीक है। इन युद्धपोतों के शामिल होने से नौसेना की परिचालन क्षमता और समुद्री सुरक्षा व्यवस्था को नई मजबूती मिलेगी। INS दूनागिरी को आधुनिक स्टील्थ तकनीक के साथ विकसित किया गया है, जिससे इसे दुश्मन के रडार द्वारा आसानी से पहचान पाना मुश्किल होता है। यह युद्धपोत ब्रह्मोस जैसी शक्तिशाली सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों से लैस है, जो समुद्र और जमीन दोनों पर सटीक हमला करने में सक्षम हैं। इसकी तैनाती से भारतीय नौसेना की आक्रमण क्षमता और रणनीतिक प्रभाव में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। INS संशोधक एक अत्याधुनिक सर्वेक्षण पोत है, जिसका मुख्य उद्देश्य समुद्री क्षेत्रों का अध्ययन और नौवहन संबंधी महत्वपूर्ण जानकारी जुटाना है। यह जहाज एक बार में लगभग 12 हजार किलोमीटर तक लगातार यात्रा कर सकता है। समुद्र की गहराई, समुद्री मार्गों और तटीय क्षेत्रों का सर्वेक्षण कर यह जहाज नौसेना और अन्य समुद्री एजेंसियों को महत्वपूर्ण डेटा उपलब्ध कराएगा। वहीं INS अग्रय को विशेष रूप से दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाने और उन्हें निष्क्रिय करने के लिए तैयार किया गया है। यह एंटी-सबमरीन वॉरफेयर पोत उथले समुद्री क्षेत्रों में भी प्रभावी ढंग से कार्य कर सकता है। अत्याधुनिक सोनार सिस्टम, टॉरपीडो और स्वदेशी हथियार प्रणालियों से लैस यह जहाज भारतीय तटों की सुरक्षा को और अधिक मजबूत बनाएगा। युद्धपोतों के नौसेना में शामिल होने के अवसर पर प्रधानमंत्री Narendra Modi ने कहा कि भारत अब रक्षा क्षेत्र में केवल आयातक देश बनकर नहीं रहना चाहता। उन्होंने जोर देकर कहा कि आत्मनिर्भर भारत की दिशा में रक्षा उत्पादन एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। इन स्वदेशी युद्धपोतों की सफलता न केवल देश की सैन्य शक्ति को मजबूत करती है, बल्कि भारतीय रक्षा उद्योग और तकनीकी क्षमता को भी वैश्विक स्तर पर नई पहचान दिलाती है।
भारतीय नौसेना में 140 से 145 वॉरशिप्स
भारतीय नौसेना आज दुनिया की तेजी से आधुनिक होती समुद्री सेनाओं में शामिल है, जिसका लक्ष्य केवल रक्षा करना ही नहीं बल्कि समुद्री क्षेत्र में रणनीतिक संतुलन बनाए रखना भी है। वर्तमान में नौसेना के पास लगभग 140 से 145 सक्रिय युद्धपोत हैं, जो विभिन्न प्रकार के अभियानों में लगातार तैनात रहते हैं। इन जहाजों की सहायता से भारत अपने समुद्री हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है और अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों पर भी मजबूत उपस्थिति बनाए रखता है। नौसेना का दीर्घकालिक लक्ष्य वर्ष 2030 तक अपने बेड़े का विस्तार कर इसे लगभग 150 से 160 युद्धपोतों तक पहुंचाना है। इसके लिए स्वदेशी निर्माण, तकनीकी उन्नयन और निजी-सरकारी साझेदारी पर विशेष जोर दिया जा रहा है। इस विस्तार योजना का उद्देश्य केवल संख्या बढ़ाना नहीं है, बल्कि अत्याधुनिक तकनीक से लैस जहाजों को शामिल कर नौसेना की क्षमता को और मजबूत बनाना है। भारतीय युद्धपोतों की तैनाती रणनीतिक रूप से तीन प्रमुख नौसैनिक कमांडों और एक विशिष्ट द्वीप कमान के तहत की जाती है। पूर्वी नौसैनिक कमान का कार्य क्षेत्र मुख्य रूप से बंगाल की खाड़ी और मलक्का जलडमरूमध्य तक फैला हुआ है, जहां समुद्री गतिविधियों पर निरंतर निगरानी रखी जाती है। यह क्षेत्र भारत की पूर्वी समुद्री सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। पश्चिमी नौसैनिक कमान, जो मुंबई और कारवार जैसे प्रमुख बेस से संचालित होती है, अरब सागर में देश की समुद्री सीमाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करती है। यहां तैनात जहाज न केवल सुरक्षा कार्यों में लगे रहते हैं, बल्कि समुद्री डकैती और अवैध गतिविधियों पर भी नजर रखते हैं। यह कमान भारत के व्यापारिक जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने में अहम भूमिका निभाती है। इसके अलावा अंडमान और निकोबार कमान को भारत की सबसे रणनीतिक समुद्री स्थिति माना जाता है, जो हिंद महासागर में प्रवेश करने वाले महत्वपूर्ण मार्गों पर नियंत्रण रखती है। यहां तैनात नौसैनिक संसाधन किसी भी संभावित खतरे को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आधुनिक युद्धपोत आज केवल समुद्र में चलने वाले जहाज नहीं रहे, बल्कि ये तैरते हुए सैन्य अड्डे बन चुके हैं, जो भारत की समुद्री शक्ति और सुरक्षा का मजबूत आधार हैं।
समुद्र में बढ़ी परमाणु ताकत
भारत की समुद्री परमाणु क्षमता अब उसकी रणनीतिक सुरक्षा नीति का एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। परमाणु पनडुब्बियां विशेष रूप से ऐसे हथियार मंच हैं जो समुद्र की गहराइयों में लंबे समय तक छिपकर कार्य करने में सक्षम होती हैं। इनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये किसी भी स्थिति में दुश्मन की निगरानी से बचकर भी रणनीतिक जवाब देने की क्षमता रखती हैं। INS अरिहंत जैसी परमाणु पनडुब्बियां भारत की ‘सेकेंड स्ट्राइक कैपेसिटी’ को मजबूत आधार प्रदान करती हैं। इसका अर्थ यह है कि यदि किसी भी प्रकार का पहला परमाणु हमला देश पर होता है, तो भारत के पास जवाबी कार्रवाई करने की पूर्ण क्षमता बनी रहती है। यह क्षमता किसी भी देश की परमाणु नीति में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि यह प्रतिरोधक शक्ति को मजबूत करती है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत अब शांति काल में भी सीमित संख्या में परमाणु हथियारों को बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियों पर तैनात करने की दिशा में आगे बढ़ा है। यह कदम भारत की समुद्री और रणनीतिक सुरक्षा नीति में एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है, जिससे उसकी प्रतिरोध क्षमता और अधिक प्रभावी हुई है। भारत ने अपने परमाणु हथियारों की संख्या में वृद्धि की है। अनुमान के अनुसार देश का परमाणु भंडार 180 से बढ़कर लगभग 190 तक पहुंच गया है। यह वृद्धि भारत की सुरक्षा आवश्यकताओं और बदलते वैश्विक परिदृश्य को ध्यान में रखते हुए की गई मानी जाती है। भारत की यह समुद्री परमाणु क्षमता न केवल उसकी रक्षा प्रणाली को मजबूत बनाती है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी रणनीतिक स्थिति को भी सुदृढ़ करती है। आधुनिक समय में समुद्री शक्ति और परमाणु क्षमता दोनों मिलकर किसी भी देश की सुरक्षा और प्रभाव का प्रमुख आधार बन गए हैं, और भारत इस दिशा में लगातार अपनी क्षमताओं को विस्तार दे रहा है।