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AFGHANISTAN ने कुनार नदी पर बांध बनाने का लिया फैसला, पाकिस्तान पर पड़ सकता है गंभीर असर, KPK की खेती पर होगा संकट

भारत के बाद अब अफगानिस्तान ने भी पाकिस्तान की ओर जाने वाले पानी को रोकने के लिए ठोस कदम उठाने का फैसला किया है। तालिबान सरकार ने घोषणा की है कि वह कुनार नदी पर बड़े पैमाने पर बांधों का निर्माण करेगी। यह कदम विशेष रूप से पाकिस्तान के खैबर-पख्तूनख्वा (KPK) प्रांत के जल संकट और सिंचाई पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है।तालिबान के सर्वोच्च नेता मावलवी हिबतुल्लाह अखुंदजादा ने जल और ऊर्जा मंत्रालय को आदेश दिया है कि बांध निर्माण जल्द से जल्द शुरू किया जाए। इसके लिए घरेलू कंपनियों को प्राथमिकता दी जाएगी और किसी विदेशी कंपनी का इंतजार नहीं किया जाएगा।

अफगानिस्तान का उद्देश्य

तालिबान सरकार के जल एवं ऊर्जा मंत्रालय के प्रमुख मुल्ला अब्दुल लतीफ मंसूर के अनुसार, यह परियोजना अफगानिस्तान में ऊर्जा संकट को कम करने और खाद्य सुरक्षा को बेहतर बनाने में अहम भूमिका निभाएगी। मंत्रालय का दावा है कि परियोजना पूरी होने पर लगभग 45 मेगावाट बिजली उत्पादन संभव होगा और लगभग 1.5 लाख एकड़ भूमि की सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध होगा।मंसूर ने कहा, “अफगानिस्तान को अपने जल संसाधनों के प्रबंधन का पूरा अधिकार है। हम यह सुनिश्चित करेंगे कि यह परियोजना अफगान कंपनियों के माध्यम से ही पूरी हो, ताकि विदेशी भागीदारी पर निर्भरता कम रहे।”

कुनार नदी और पाकिस्तान पर असर

कुनार नदी, जिसकी लंबाई लगभग 480 किलोमीटर है, अफगानिस्तान से निकलकर पाकिस्तान में चितराल नदी बन जाती है और फिर काबुल नदी में मिलती है। इस नदी का 70-80% पानी पाकिस्तान में जाता है, जो अंततः सिंधु नदी में शामिल होता है।अगर अफगानिस्तान बांध बनाकर पानी को रोकता है, तो इसका सीधा असर पाकिस्तान के KPK क्षेत्र पर पड़ेगा। खासकर बाजौर, मोहम्मद और चितराल जैसे इलाकों में खेती पूरी तरह इस नदी के पानी पर निर्भर है। सिंचाई रुकने से फसलें बर्बाद होने का खतरा बढ़ जाएगा।इसके अलावा, चितराल जिले में कुनार नदी पर चल रहे 20 से ज्यादा छोटे हाइडल प्रोजेक्ट भी प्रभावित होंगे। ये सभी प्रोजेक्ट ‘रन-ऑफ-रिवर’ तकनीक पर काम करते हैं, यानी ये सीधे नदी के बहाव से बिजली उत्पन्न करते हैं।

भारत से लिया गया सबक

विश्लेषकों का कहना है कि तालिबान ने भारत के कदम से प्रेरणा ली है। भारत ने अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में आतंकी हमले के तुरंत बाद सिंधु जल संधि को निलंबित कर दिया था। यह समझौता सिंधु और उसकी सहायक नदियों के पानी को सांझा करने के लिए 65 साल पुराना था।तालिबान की योजना भी इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है । पाकिस्तान को पानी के लिए दबाव में रखना और अपने क्षेत्रीय हित सुरक्षित करना।

अफगानिस्तान का यह कदम पाकिस्तान के लिए गंभीर चुनौती साबित हो सकता है। तालिबान ने अपने जल संसाधनों पर नियंत्रण के लिए बड़े बांध बनाने की योजना बनाई है, जिससे पाकिस्तान में खेती और बिजली उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। चीन की संभावित भागीदारी और क्षेत्रीय राजनीति को देखते हुए यह परियोजना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी संवेदनशील मुद्दा बन सकती है।

 

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