संसद में प्रस्तावित डिलिमिटेशन (परिसीमन) बिल को लेकर देश की राजनीति में नई हलचल देखने को मिल रही है। महाराष्ट्र के वरिष्ठ नेता शरद पवार की अगुवाई वाली एनसीपी (एसपी) के इस विधेयक का समर्थन करने की संभावना ने राजनीतिक समीकरणों को लेकर चर्चाएं तेज कर दी हैं। विपक्षी गठबंधन का हिस्सा मानी जाने वाली पार्टी का यह रुख कई राजनीतिक सवाल भी खड़े कर रहा है। एनसीपी (एसपी) संसद में डिलिमिटेशन बिल के पक्ष में मतदान कर सकती है या उसका समर्थन जता सकती है। हालांकि पार्टी की ओर से अभी तक इस संबंध में कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है, लेकिन इस खबर के सामने आने के बाद राजनीतिक गलियारों में अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। यदि एनसीपी (एसपी) वास्तव में इस विधेयक का समर्थन करती है, तो यह केवल महाराष्ट्र ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय राजनीति के लिहाज से भी एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम होगा। विपक्षी दलों की रणनीति और संसद में संख्या बल पर भी इसका असर पड़ सकता है। डिलिमिटेशन बिल का उद्देश्य जनगणना के आधार पर लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं तथा सीटों के वितरण का पुनर्निर्धारण करना है। सरकार का कहना है कि लंबे समय से जनसंख्या में हुए बदलावों के बावजूद निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन नहीं हो पाया है, इसलिए नई व्यवस्था लागू करना आवश्यक है। अब सभी की नजरें एनसीपी (एसपी) के आधिकारिक रुख और संसद में होने वाली आगे की चर्चा पर टिकी हैं। यदि पार्टी समर्थन का ऐलान करती है, तो यह विधेयक पर होने वाली बहस को नई दिशा दे सकता है और आने वाले दिनों में राष्ट्रीय राजनीति में इसके व्यापक प्रभाव देखने को मिल सकते हैं।
परिसीमन (डिलिमिटेशन) बिल को देश की चुनावी व्यवस्था में बड़े बदलाव की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इस विधेयक का उद्देश्य लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण करना है, ताकि निर्वाचन क्षेत्रों का स्वरूप वर्तमान जनसंख्या के अनुरूप बनाया जा सके। यदि यह बिल लागू होता है, तो कई राज्यों में सीटों की संख्या और चुनावी सीमाओं में बदलाव देखने को मिल सकता है। इस प्रस्तावित व्यवस्था के तहत नवीनतम जनगणना के आंकड़ों के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन किया जाएगा। सरकार का कहना है कि पिछले कई दशकों में देश की आबादी और भौगोलिक परिस्थितियों में बड़े बदलाव आए हैं, लेकिन कई क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व अब भी पुराने आधार पर तय होता है। ऐसे में परिसीमन प्रक्रिया को दोबारा लागू करना समय की आवश्यकता है। विधेयक के लागू होने के बाद संविधान के कुछ प्रावधानों में संशोधन किए जाने का प्रस्ताव है, जिससे संसद और विधानसभाओं में सीटों का बंटवारा वर्तमान जनसंख्या के अनुपात में किया जा सके। इससे प्रतिनिधित्व को अधिक संतुलित और प्रभावी बनाने का प्रयास किया जाएगा। प्रस्तावों के अनुसार, लोकसभा की कुल सीटों की संख्या में भी बढ़ोतरी संभव है। सरकार की योजना के अनुसार परिसीमन आयोग का गठन किया जाएगा, जो राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का अध्ययन कर नई सिफारिशें तैयार करेगा। आयोग यह सुनिश्चित करेगा कि प्रत्येक क्षेत्र में जनसंख्या के आधार पर उचित प्रतिनिधित्व मिले और चुनावी क्षेत्रों का संतुलन बना रहे। परिसीमन बिल को लेकर राजनीतिक और संवैधानिक स्तर पर व्यापक चर्चा जारी है। समर्थकों का मानना है कि इससे लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व अधिक न्यायसंगत होगा, जबकि विभिन्न राजनीतिक दल इस विषय पर अपने-अपने दृष्टिकोण रख रहे हैं। आने वाले समय में संसद में इस विधेयक पर होने वाली बहस और निर्णय देश की चुनावी व्यवस्था के भविष्य को नई दिशा दे सकते हैं।

अप्रैल में गिरा था बिल
इस वर्ष संसद के विशेष सत्र में महिला आरक्षण और परिसीमन से संबंधित संवैधानिक संशोधन विधेयक पेश किया गया था। उस समय इस प्रस्ताव को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस देखने को मिली। मतदान के दौरान विधेयक को आवश्यक समर्थन नहीं मिल पाया और यह पारित नहीं हो सका। इसके बाद से ही इस मुद्दे पर राजनीतिक चर्चा लगातार जारी है। विधेयक के पक्ष में बड़ी संख्या में सांसदों ने मतदान किया, लेकिन संवैधानिक संशोधन होने के कारण इसे पारित कराने के लिए आवश्यक बहुमत हासिल नहीं हो सका। विपक्षी दलों ने संयुक्त रूप से इसका विरोध किया था, जिसके चलते सरकार का प्रयास सफल नहीं हो पाया। इसके बाद केंद्र सरकार ने संकेत दिया था कि भविष्य में इस विषय को फिर से आगे बढ़ाया जाएगा। हाल के दिनों में परिसीमन विधेयक को लेकर एक बार फिर राजनीतिक हलचल बढ़ गई है। विभिन्न राजनीतिक दलों के रुख पर नजर रखी जा रही है। कुछ सूत्रों का दावा है कि कई दल इस मुद्दे पर नए सिरे से विचार कर रहे हैं, हालांकि संबंधित पार्टियों की ओर से अभी तक कोई औपचारिक घोषणा नहीं की गई है। परिसीमन विधेयक का उद्देश्य देश में लोकसभा और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण करना है। प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार यह प्रक्रिया नई जनगणना के आंकड़ों के आधार पर पूरी की जाएगी, ताकि जनसंख्या के अनुरूप निर्वाचन क्षेत्रों का संतुलित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सके। सरकार का कहना है कि लंबे समय से लंबित इस प्रक्रिया को अब आगे बढ़ाना आवश्यक है। यदि यह विधेयक भविष्य में संसद से पारित होता है, तो परिसीमन आयोग का गठन किया जाएगा। यह आयोग राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की नई चुनावी सीमाएं तय करेगा तथा सीटों के पुनर्वितरण से संबंधित सिफारिशें देगा। माना जा रहा है कि इस प्रक्रिया का देश की चुनावी व्यवस्था और राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।
परिसीमन विधेयक को लेकर केंद्र सरकार का कहना है कि मौजूदा लोकसभा और विधानसभा सीटों का निर्धारण कई दशक पुराने जनसंख्या आंकड़ों के आधार पर किया गया था। सरकार का तर्क है कि समय के साथ देश की आबादी, शहरीकरण और जनसंख्या का वितरण काफी बदल चुका है। ऐसे में निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को अधिक संतुलित और प्रभावी बनाने की दिशा में जरूरी कदम माना जा रहा है। सरकार का मानना है कि नई जनगणना के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं तय होने से प्रत्येक क्षेत्र को उसकी वास्तविक जनसंख्या के अनुरूप प्रतिनिधित्व मिल सकेगा। इसके लिए परिसीमन आयोग का गठन किया जाएगा, जो राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की सीटों और चुनावी सीमाओं का अध्ययन कर नई सिफारिशें तैयार करेगा। सरकार इसे चुनावी व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और समावेशी बनाने की प्रक्रिया बता रही है। दूसरी ओर, विपक्ष के कई दलों ने इस प्रस्ताव पर पहले भी अपनी चिंताएं जताई हैं। उनका कहना है कि परिसीमन की प्रक्रिया का असर विभिन्न राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर पड़ सकता है। इसलिए उनका आग्रह रहा है कि इस तरह के महत्वपूर्ण संवैधानिक बदलाव से पहले सभी राजनीतिक दलों के बीच व्यापक चर्चा और सहमति बनाई जाए। इस मुद्दे पर पहले भी संसद में लंबी बहस हो चुकी है। विशेष सत्र के दौरान संबंधित संवैधानिक संशोधन प्रस्ताव आवश्यक बहुमत नहीं जुटा सका था, जिसके कारण वह पारित नहीं हो पाया। उस समय सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच इस विषय पर तीखी राजनीतिक बहस देखने को मिली थी, जिससे यह स्पष्ट हो गया था कि परिसीमन का मुद्दा केवल चुनावी नहीं बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। अब एक बार फिर इस विधेयक को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। विभिन्न दलों के संभावित रुख पर लगातार नजर रखी जा रही है। यदि संसद में इस बार विधेयक को पर्याप्त समर्थन मिलता है, तो यह देश की चुनावी संरचना में बड़ा बदलाव ला सकता है। ऐसे में आगामी संसदीय चर्चा और राजनीतिक दलों के आधिकारिक निर्णय इस पूरे घटनाक्रम की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे।










