
वास्तविक परीक्षा 2027 में आयोजित की जाएगी। यदि अखिलेश 2027 में यूपी जीत लेते हैं, तो वे राष्ट्रीय
राष्ट्रीय राजनीति में यह बहस लगातार तेज होती जा रही है कि आने वाले समय में विपक्ष का वास्तविक चेहरा कौन होगा। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि क्षेत्रीय दल अपने-अपने राज्यों में मजबूत प्रदर्शन करते हैं, तो वे राष्ट्रीय स्तर पर राहुल गांधी से अधिक प्रभावशाली स्थिति में नजर आ सकते हैं। दूसरी ओर यह भी तर्क दिया जा रहा है कि यदि ये क्षेत्रीय नेतृत्व अपेक्षित प्रदर्शन करने में असफल रहते हैं, तो राष्ट्रीय राजनीति में राहुल गांधी 2029 के लिए एकमात्र प्रमुख विपक्षी चेहरा बनकर उभर सकते हैं। ऐसे में विपक्षी राजनीति का पूरा संतुलन एक ही धुरी पर केंद्रित हो सकता है। क्षेत्रीय दलों की सबसे बड़ी चुनौती यह मानी जाती है कि उनकी राजनीतिक ताकत मुख्य रूप से उनके राज्य विशेष तक सीमित रहती है। राज्य में सत्ता या प्रभाव होने के बावजूद राष्ट्रीय स्तर पर उनकी भूमिका सीमित हो जाती है, जिससे वे देशव्यापी नेतृत्व के दावे में कमजोर पड़ते हैं। इसके विपरीत कांग्रेस और राहुल गांधी के लिए राजनीतिक ब्रांडिंग का आधार केवल चुनावी जीत या हार नहीं बल्कि राष्ट्रीय उपस्थिति माना जाता है। यही कारण है कि उनका प्रभाव कई राज्यों में चुनावी परिणामों से परे भी देखा जाता है, जो उन्हें एक निरंतर राष्ट्रीय राजनीतिक पहचान प्रदान करता है।
कहां हैं 2024 के ‘चैलेंजर्स’?
2014, 2019 तथा 2024… इन तीन आम चुनावों में बीजेपी का मुकाबला करने वाला विपक्ष कभी एकसाथ नहीं बोल पाया। मठाधीशों की विभिन्न महत्वाकांक्षाएं हमेशा इस एकता को कमजोर करती रही हैं। पिछले चुनाव में जब नीतीश कुमार को संयोजक के रूप में प्रस्तावित किया गया, तो ममता बनर्जी ने इसे अस्वीकार कर दिया। राहुल गांधी के मुद्दे पर कभी भी सहमति स्थापित नहीं हो सकी. नतीजा यह निकला कि टूटा हुआ विपक्ष अपने-अपने राज्यों के गढ़ों में सिमट कर रह गया, जिन्हें बीजेपी एक-एक कर ध्वस्त कर रही है।
Mamata Banerjee के नेतृत्व में All India Trinamool Congress ने लोकसभा चुनाव में अपनी राजनीतिक पकड़ को मजबूत बनाए रखने की कोशिश की, लेकिन जमीनी स्तर पर बढ़ती चुनौतियाँ लगातार सामने आती रहीं। पार्टी ने कई क्षेत्रों में अपनी पुरानी रणनीतियों को दोहराया, लेकिन बदलते राजनीतिक समीकरणों ने परिणामों पर असर डाला। वहीं Bharatiya Janata Party ने अपनी मजबूत सोशल इंजीनियरिंग और संगठनात्मक विस्तार के जरिए कई क्षेत्रों में प्रभाव बढ़ाया। खासकर चुनावी माहौल के अंतिम चरण में बीजेपी की रणनीति ने राजनीतिक संतुलन को प्रभावित किया, जिससे कई सीटों पर मुकाबला और भी कड़ा हो गया। Indian National Congress के लिए यह चुनाव सीमित लेकिन प्रतीकात्मक सफलता लेकर आया, जहां उसे कुछ सीटों पर बढ़त मिली। हालांकि पार्टी की स्थिति अब भी राज्य में कमजोर मानी जाती है, लेकिन इन परिणामों ने उसके लिए एक छोटे स्तर पर राजनीतिक उपस्थिति बनाए रखने का अवसर जरूर दिया। West Bengal की बदलती राजनीति यह संकेत देती है कि पारंपरिक प्रभुत्व अब पहले जैसा नहीं रहा। टीएमसी की एकछत्र पकड़ पर सवाल उठने लगे हैं और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा पहले की तुलना में अधिक बहुस्तरीय और चुनौतीपूर्ण हो गई है, जिससे राज्य का राजनीतिक परिदृश्य लगातार परिवर्तन की ओर बढ़ रहा है।
Arvind Kejriwal ने दिल्ली और Punjab की राजनीति में मजबूत उपस्थिति दर्ज कराते हुए Indian National Congress के पारंपरिक वोट बैंक में बड़ी सेंध लगाई। पार्टी का दावा था कि वह देश की राजनीति में एक “तीसरे विकल्प” के रूप में उभर रही है, जिसने राष्ट्रीय स्तर पर मुकाबले को और अधिक त्रिकोणीय बना दिया। 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान वाराणसी में प्रधानमंत्री Narendra Modi को सीधी चुनौती देकर केजरीवाल ने राष्ट्रीय राजनीति में अपनी महत्वाकांक्षा स्पष्ट कर दी थी। हालांकि, समय के साथ यह स्पष्ट हुआ कि उनकी राजनीतिक रणनीति का मुख्य संघर्ष Bharatiya Janata Party के खिलाफ ही केंद्रित रहा, जिससे मुकाबला द्विध्रुवीय होता चला गया। वहीं Nitish Kumar ने भी 2024 से पहले विपक्षी एकता को मजबूत करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने कई राज्यों का दौरा कर विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने का प्रयास किया, लेकिन विभिन्न दलों के बीच मतभेद और नेतृत्व को लेकर असहमति ने इस प्रयास को कमजोर कर दिया। भारतीय राजनीति में इन दोनों नेताओं की भूमिका महत्वपूर्ण रही है, लेकिन बदलते राजनीतिक समीकरणों और गठबंधन की चुनौतियों ने उनके राष्ट्रीय नेतृत्व की संभावनाओं को सीमित कर दिया।
बैसाखियों पर टिकी कांग्रेस और ‘परजीवी’ राजनीति
2024 में 99 सीटें जीतने पर कांग्रेस ने ऐसा जश्न मनाया, जैसे देश की सबसे पुरानी पार्टी फिर से अपने पुराने ऐश्वर्य में लौट आई हो। लेकिन यह आशा जल्दी ही चुराई गई. हरियाणा में जीत की तैयारियाँ थीं, लेकिन कांग्रेस की आंतरिक कलह और बीजेपी की सूक्ष्म योजनाओं ने खेल मोड़ दिया। इसके बाद हार का एक निरंतर क्रम प्रारंभ हो गया. जम्मू-कश्मीर में अलायंस ने जीत हासिल की, लेकिन उमर अब्दुल्ला की सत्ता में भागीदारी को लेकर कांग्रेस का दृष्टिकोण असहज बना रहा। महाराष्ट्र और बिहार में कांग्रेस सबसे कमजोर स्थिति में पहुंच गई. गनीमत यही रही कि उसके मजबूत साथी राजद, उद्धव शिवसेना और शरद पवार की एनसीपी भी अपनी रक्षा नहीं कर सके। असम में कांग्रेस की प्रतिष्ठा केवल मुस्लिम बहुल क्षेत्रों तक सीमित रह गई, जबकि बंगाल की दौड़ से वह पूरी तरह बाहर हो गई। जब तमिलनाडु में DMK का जहाज डूबने लगा, तब चतुर कांग्रेस ने समय पर पाला बदलकर पांच विधायकों के साथ सत्ता के नए जहाज पर कूद लगा दी। केरल में सत्ता का संप्रदाय हर पांच साल में बदलता रहा है। इस बार कांग्रेस के नेतृत्व वाले UDF की बारी थी, इसलिए यह एक ‘निश्चित परिवर्तन’ था, कोई कांग्रेस का जादू नहीं।