Delhi – NCR में 21 मई से टैक्सी-ऑटो हड़ताल, ECC और नए नियमों के खिलाफ यूनियनों का चक्का जाम ऐलान

Delhi-NCR में 21 मई से परिवहन सेवाओं पर असर पड़ सकता है, क्योंकि टैक्सी, ऑटो और ट्रांसपोर्ट यूनियनों ने तीन दिन की सांकेतिक हड़ताल का ऐलान किया है। All India Motor Transport Congress के नेतृत्व में कई संगठनों ने बढ़ती लागत और नई परिवहन नीतियों के विरोध में चक्का जाम करने का फैसला लिया है। इस दौरान सार्वजनिक परिवहन और माल ढुलाई सेवाएं प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है। यूनियनों का कहना है कि पर्यावरण क्षतिपूर्ति शुल्क (ECC) में हुई बढ़ोतरी और बीएस-4 वाहनों पर प्रस्तावित प्रतिबंध से ट्रांसपोर्ट कारोबार पर भारी दबाव पड़ा है। उनका आरोप है कि लगातार बढ़ते खर्च के कारण छोटे ट्रांसपोर्टर और ड्राइवर आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं। संगठनों का मानना है कि नई नीतियां बिना पर्याप्त तैयारी के लागू की जा रही हैं। हाल ही में हुई बैठक में दिल्ली-एनसीआर की 60 से अधिक परिवहन यूनियनों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। बैठक की अध्यक्षता AIMTC के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. हरीश सभरवाल ने की, जिसमें ECC शुल्क और परिवहन नियमों को लेकर सरकार के खिलाफ नाराजगी जाहिर की गई। यूनियनों ने सरकार से इन फैसलों पर दोबारा विचार करने की मांग की है। ऑटो और टैक्सी चालकों ने किराया बढ़ाने की मांग भी उठाई है। उनका कहना है कि सीएनजी, बीमा, मेंटेनेंस और अन्य खर्च लगातार बढ़ रहे हैं, जबकि किराए में लंबे समय से कोई संशोधन नहीं हुआ। यूनियनों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर जल्द फैसला नहीं लिया गया तो आंदोलन को और बड़ा रूप दिया जा सकता है।

Delhi-NCR में अगले सप्ताह परिवहन सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं, क्योंकि टैक्सी, ऑटो और ट्रांसपोर्ट यूनियनों ने 21 से 23 मई तक सांकेतिक चक्का जाम का ऐलान किया है। All India Motor Transport Congress के नेतृत्व में कई परिवहन संगठनों ने बढ़ते खर्च और नई नीतियों के विरोध में आंदोलन करने का फैसला लिया है। यूनियनों का कहना है कि पर्यावरण क्षतिपूर्ति शुल्क (ECC) में हुई बढ़ोतरी ने ट्रांसपोर्ट कारोबार पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डाल दिया है। उनका आरोप है कि यह शुल्क अब केवल ट्रांजिट वाहनों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राजधानी में जरूरी सामान पहुंचाने वाले कमर्शियल वाहनों पर भी लागू किया जा रहा है। इससे माल ढुलाई महंगी होने और आम लोगों पर महंगाई का असर बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। परिवहन संगठनों ने बीएस-4 कमर्शियल वाहनों पर प्रस्तावित प्रतिबंध का भी विरोध किया है। यूनियनों का कहना है कि लाखों छोटे ट्रांसपोर्टर अभी भी इन वाहनों पर निर्भर हैं और अचानक प्रतिबंध लगाने से उनकी आजीविका प्रभावित होगी। उनका सुझाव है कि पुराने वाहनों पर चरणबद्ध तरीके से रोक लागू की जाए ताकि कारोबारियों को तैयारी का समय मिल सके। ऑटो और टैक्सी यूनियनों ने भी किराया बढ़ाने की मांग तेज कर दी है। चालकों का कहना है कि सीएनजी की कीमतों, वाहन बीमा, फिटनेस, टायर और मेंटेनेंस खर्च में लगातार बढ़ोतरी हुई है, जबकि किराया दरों में लंबे समय से कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ। ऐसे में मौजूदा किराया ढांचा उनके लिए आर्थिक रूप से नुकसानदायक साबित हो रहा है। यूनियनों ने ओला, उबर और बाइक टैक्सी सेवाओं पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि इन ऐप आधारित सेवाओं के कारण पारंपरिक ऑटो और टैक्सी चालकों की आमदनी प्रभावित हो रही है। संगठनों ने दिल्ली सरकार से मांग की है कि इन सेवाओं को नियंत्रित करने के लिए नई नीति बनाई जाए। परिवहन संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर जल्द फैसला नहीं लिया गया तो आंदोलन को अनिश्चितकालीन हड़ताल में बदला जा सकता है। ऐसे में आने वाले दिनों में दिल्ली-एनसीआर में सार्वजनिक परिवहन और माल ढुलाई सेवाओं पर व्यापक असर देखने को मिल सकता है।

ECC शुल्क बढ़ने से महंगाई बढ़ने की आशंका

Delhi-NCR में 21 मई से परिवहन सेवाओं पर असर पड़ सकता है, क्योंकि टैक्सी, ऑटो और ट्रांसपोर्ट यूनियनों ने तीन दिन की सांकेतिक हड़ताल का ऐलान किया है। All India Motor Transport Congress के नेतृत्व में कई संगठनों ने बढ़ती लागत और नई परिवहन नीतियों के विरोध में चक्का जाम करने का फैसला लिया है। इस दौरान सार्वजनिक परिवहन और माल ढुलाई सेवाएं प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है। यूनियनों का कहना है कि पर्यावरण क्षतिपूर्ति शुल्क (ECC) में हुई बढ़ोतरी और बीएस-4 वाहनों पर प्रस्तावित प्रतिबंध से ट्रांसपोर्ट कारोबार पर भारी दबाव पड़ा है। उनका आरोप है कि लगातार बढ़ते खर्च के कारण छोटे ट्रांसपोर्टर और ड्राइवर आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं। संगठनों का मानना है कि नई नीतियां बिना पर्याप्त तैयारी के लागू की जा रही हैं। हुई बैठक में दिल्ली-एनसीआर की 60 से अधिक परिवहन यूनियनों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। बैठक की अध्यक्षता AIMTC के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. हरीश सभरवाल ने की, जिसमें ECC शुल्क और परिवहन नियमों को लेकर सरकार के खिलाफ नाराजगी जाहिर की गई। यूनियनों ने सरकार से इन फैसलों पर दोबारा विचार करने की मांग की है। ऑटो और टैक्सी चालकों ने किराया बढ़ाने की मांग भी उठाई है। उनका कहना है कि सीएनजी, बीमा, मेंटेनेंस और अन्य खर्च लगातार बढ़ रहे हैं, जबकि किराए में लंबे समय से कोई संशोधन नहीं हुआ। यूनियनों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर जल्द फैसला नहीं लिया गया तो आंदोलन को और बड़ा रूप दिया जा सकता है। परिवहन संगठनों का कहना है कि पर्यावरण क्षतिपूर्ति शुल्क (ECC) का मकसद केवल उन ट्रांजिट वाहनों को नियंत्रित करना था जो बिना किसी काम के दिल्ली से गुजरते हैं, लेकिन अब यह शुल्क उन ट्रकों और वाणिज्यिक वाहनों पर भी लगाया जा रहा है जो राजधानी में जरूरी सामान पहुंचाते हैं. यूनियनों का दावा है कि इससे ट्रांसपोर्ट लागत बढ़ेगी और इसका सीधा असर आम लोगों पर महंगाई के रूप में दिखाई देगा.

भारी ट्रकों से लेकर छोटे कमर्शियल वाहनों तक बढ़ा बोझ

Delhi-NCR में परिवहन संगठनों ने ECC शुल्क में बढ़ोतरी को लेकर गहरी नाराजगी जताई है। यूनियनों का कहना है कि हल्के वाणिज्यिक वाहनों पर शुल्क में बड़ी वृद्धि की गई है, जबकि बड़े ट्रकों के लिए ECC दरों में 40 से 55 प्रतिशत तक बढ़ोतरी ने ट्रांसपोर्ट कारोबारियों की चिंता बढ़ा दी है। उनका मानना है कि इससे पूरे परिवहन क्षेत्र पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव पड़ेगा। ट्रांसपोर्ट ऑपरेटरों का कहना है कि पहले से ही डीजल की बढ़ती कीमतें, टोल टैक्स, फिटनेस सर्टिफिकेट और वाहन मेंटेनेंस का खर्च कारोबार को प्रभावित कर रहा है। ऐसे में नए शुल्क लागू होने से छोटे और मध्यम ट्रांसपोर्टरों के लिए काम करना और मुश्किल हो जाएगा। यूनियनों का दावा है कि इसका असर माल ढुलाई लागत पर पड़ेगा, जिससे बाजार में वस्तुओं की कीमतें भी बढ़ सकती हैं। परिवहन संगठनों ने 1 नवंबर 2026 से बीएस-4 कमर्शियल वाहनों के दिल्ली प्रवेश पर प्रस्तावित प्रतिबंध का भी विरोध किया है। उनका कहना है कि देशभर में लाखों छोटे कारोबारी और ट्रांसपोर्टर अभी भी बीएस-4 वाहनों पर निर्भर हैं। अचानक प्रतिबंध लगाने से उनकी रोजी-रोटी पर सीधा असर पड़ेगा और कई लोगों का कारोबार बंद होने की स्थिति में आ सकता है।

यूनियनों ने रखीं कई मांगें, न मानने पर अनिश्चितकालीन आंदोलन की चेतावनी

Delhi-NCR में प्रदर्शन कर रही परिवहन यूनियनों ने सरकार के सामने कई अहम मांगें रखी हैं। संगठनों का कहना है कि बढ़ा हुआ पर्यावरण क्षतिपूर्ति शुल्क (ECC) केवल उन ट्रांजिट वाहनों पर लागू किया जाए, जो बिना किसी व्यावसायिक कार्य के राजधानी से गुजरते हैं। जरूरी सामान ढोने वाले ट्रकों और कमर्शियल वाहनों को इस अतिरिक्त शुल्क से राहत देने की मांग की गई है। यूनियनों ने बीएस-6 वाहनों को पूरी तरह छूट देने की बात कही है, जबकि बीएस-4 वाहनों पर प्रतिबंध को चरणबद्ध तरीके से लागू करने की मांग उठाई गई है। उनका कहना है कि लाखों ट्रांसपोर्टर अभी भी पुराने वाहनों पर निर्भर हैं और अचानक प्रतिबंध से उनके कारोबार और रोजगार पर गंभीर असर पड़ सकता है। प्रदर्शनकारी संगठनों ने यह भी मांग की है कि जिन वाहनों के पास वैध प्रदूषण प्रमाणपत्र मौजूद हैं, उन्हें निर्धारित समय तक संचालन की अनुमति दी जाए। यूनियनों का तर्क है कि पर्यावरण सुरक्षा जरूरी है, लेकिन नियमों को लागू करते समय ट्रांसपोर्ट सेक्टर की आर्थिक स्थिति और व्यावहारिक चुनौतियों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। परिवहन संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने जल्द उनकी मांगों पर सकारात्मक फैसला नहीं लिया, तो 21 से 23 मई तक प्रस्तावित सांकेतिक चक्का जाम के बाद आंदोलन को अनिश्चितकालीन हड़ताल में बदला जा सकता है। इससे दिल्ली-एनसीआर में सार्वजनिक परिवहन और माल ढुलाई सेवाओं पर बड़ा असर पड़ने की संभावना जताई जा रही है।

ऑटो-टैक्सी यूनियनों ने किराया बढ़ाने की उठाई मांग

इधर ऑटो और टैक्सी संगठनों ने भी बढ़ती महंगाई और सीएनजी कीमतों में हालिया बढ़ोतरी को लेकर किराया संशोधन की मांग तेज कर दी है. यूनियनों का कहना है कि बीते कुछ वर्षों में वाहन बीमा, टायर, फिटनेस और रखरखाव का खर्च काफी बढ़ चुका है. ऐसे में मौजूदा किराया ढांचा चालकों के लिए घाटे का सौदा बन गया है. ऑटो-टैक्सी संगठनों ने दिल्ली सरकार से ओला, उबर और रैपिडो जैसी बाइक टैक्सी सेवाओं पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है. यूनियनों का कहना है कि कई राज्यों में इस तरह की सेवाओं पर रोक लग चुकी है और दिल्ली में भी पारंपरिक ऑटो-टैक्सी चालकों के हितों की रक्षा के लिए ऐसा कदम उठाया जाना चाहिए. संगठनों ने कहा है कि यदि उनकी मांगों पर जल्द फैसला नहीं लिया गया तो वो अपने सहयोगी संगठनों के साथ बड़े स्तर पर आंदोलन शुरू करेंगे. यूनियनों का दावा है कि परिवहन क्षेत्र से जुड़े लाखों लोगों की आजीविका दांव पर लगी हुई है और सरकार को इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करना चाहिए .

Exit mobile version