Neet Paper Leak के विरोध में हुए छात्र आंदोलनों के दौरान कथित पुलिस कार्रवाई को लेकर मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के राज्यसभा सांसद मनोज कुमार झा ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करते हुए कथित पुलिस ज्यादती की निष्पक्ष जांच और संबंधित मामलों में एफआईआर दर्ज करने की मांग की है। अदालत ने याचिका को स्वीकार करते हुए इसे अन्य संबंधित मामलों के साथ सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कर दिया है याचिका में कहा गया है कि 20 से 25 जुलाई के बीच देश के विभिन्न राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में हुए छात्र प्रदर्शनों के दौरान कई जगहों पर प्रदर्शनकारियों के खिलाफ अत्यधिक बल प्रयोग किए जाने के आरोप सामने आए हैं। विशेष रूप से दिल्ली के जंतर-मंतर और बिहार के सीवान जिले की घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि इन मामलों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए ताकि पूरे घटनाक्रम की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सके। मनोज झा ने अपनी याचिका में मांग की है कि प्रत्येक राज्य और केंद्रशासित प्रदेश में दो वरिष्ठ महिला आईपीएस अधिकारियों वाली विशेष जांच टीम (SIT) गठित की जाए। साथ ही जांच प्रक्रिया की निगरानी किसी सेवानिवृत्त हाई कोर्ट के न्यायाधीश की देखरेख में कराई जाए, ताकि जांच पूरी तरह निष्पक्ष और पारदर्शी रहे। याचिका में यह भी आग्रह किया गया है कि पूरी जांच निर्धारित समय सीमा के भीतर पूरी की जाए। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि बिहार के सीवान जिले में छात्र प्रदर्शन के दौरान पुलिस फायरिंग की घटना में कई प्रदर्शनकारी घायल हुए थे। इसके अलावा अन्य राज्यों में भी पुलिस कार्रवाई को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। याचिका में इन सभी मामलों की एक समान और स्वतंत्र जांच कराने की मांग की गई है, ताकि यदि कहीं कानून का उल्लंघन हुआ हो तो उसकी जिम्मेदारी तय की जा सके। अब इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में अन्य संबंधित याचिकाओं के साथ होगी। अदालत के आगामी फैसले पर सभी पक्षों की नजरें टिकी हैं, क्योंकि इससे छात्र आंदोलनों के दौरान पुलिस कार्रवाई, जवाबदेही और निष्पक्ष जांच से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनी पहलुओं पर आगे की दिशा तय हो सकती है।
पुलिस कार्रवाई से जुड़े सभी रिकॉर्ड सार्वजनिक करने और सुरक्षित रखने की मांग

दोषी पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई और मुआवजे की मांग
याचिका में सांसद मनोज झा ने मांग की है कि यदि जांच के दौरान किसी पुलिस अधिकारी की भूमिका नियमों के विपरीत पाई जाती है, तो उसके खिलाफ कानून के अनुसार आपराधिक और विभागीय कार्रवाई की जाए। उनका कहना है कि कानून का पालन सभी के लिए समान होना चाहिए और यदि किसी स्तर पर अधिकारों का दुरुपयोग हुआ है, तो उसकी निष्पक्ष जांच के बाद जवाबदेही तय की जानी चाहिए। याचिका में पुलिस कार्रवाई के दौरान घायल हुए प्रदर्शनकारियों को उचित मुआवजा और इलाज का पूरा खर्च उपलब्ध कराने की भी मांग की गई है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि यदि किसी नागरिक को पुलिस कार्रवाई के दौरान शारीरिक नुकसान पहुंचा है, तो उसे समय पर चिकित्सा सुविधा और आवश्यक सहायता मिलनी चाहिए। इसके लिए संबंधित अधिकारियों को आवश्यक निर्देश जारी करने का अनुरोध किया गया है। इसके अलावा 20 से 25 जुलाई के बीच छात्र प्रदर्शनों से जुड़े सभी मामलों में दर्ज एफआईआर का पूरा विवरण सार्वजनिक करने की मांग भी की गई है। याचिका में कहा गया है कि इससे जांच प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहेगी और लोगों को यह जानकारी मिल सकेगी कि किन घटनाओं में क्या कानूनी कार्रवाई की गई है। साथ ही यह भी आग्रह किया गया है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल छात्रों को अनावश्यक रूप से डराने, धमकाने या बिना उचित आधार के हिरासत में लेने जैसी कार्रवाई से रोका जाए। याचिका में पूरे देश के लिए सार्वजनिक प्रदर्शनों के दौरान पुलिस बल के इस्तेमाल को लेकर एक समान राष्ट्रीय मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार करने की मांग भी की गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि वर्तमान में अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग तरीके अपनाए जाते हैं, इसलिए एक समान दिशा-निर्देश लागू होने से पुलिस कार्रवाई अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और कानूनी मानकों के अनुरूप हो सकेगी। याचिकाकर्ता का मानना है कि स्पष्ट और समान एसओपी लागू होने से कानून-व्यवस्था बनाए रखने और नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों के बीच बेहतर संतुलन स्थापित किया जा सकेगा। अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान इन मांगों पर विचार किया जाएगा और अदालत के निर्देशों के आधार पर आगे की कानूनी प्रक्रिया तय हो सकती है।
हर पुलिस कार्रवाई की वीडियो रिकॉर्डिंग की मांग
याचिका में मांग की गई है कि 20 से 25 जुलाई के बीच छात्र प्रदर्शनों से जुड़े सभी मामलों में दर्ज एफआईआर का पूरा विवरण सार्वजनिक किया जाए, ताकि जांच प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहे। याचिकाकर्ता का कहना है कि इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि किन घटनाओं में क्या कानूनी कार्रवाई की गई और किन आधारों पर मामले दर्ज किए गए। उनका तर्क है कि संवेदनशील मामलों में जानकारी सार्वजनिक होने से न्यायिक प्रक्रिया पर लोगों का भरोसा भी मजबूत होता है। इसके साथ ही याचिका में यह भी अनुरोध किया गया है कि प्रदर्शन में शामिल छात्रों के साथ किसी प्रकार की अनावश्यक सख्ती न बरती जाए। याचिकाकर्ता का कहना है कि बिना उचित कानूनी आधार के किसी छात्र को डराना-धमकाना या हिरासत में लेना संवैधानिक अधिकारों के विपरीत है। उनका मानना है कि शांतिपूर्ण विरोध लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसकी सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य की जिम्मेदारी है। सुप्रीम कोर्ट से पूरे देश में सार्वजनिक प्रदर्शनों के दौरान पुलिस बल के इस्तेमाल के लिए एक समान राष्ट्रीय मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार करने की भी मांग की गई है। याचिका में सुझाव दिया गया है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस केवल न्यूनतम आवश्यक बल का ही प्रयोग करे। साथ ही हर कार्रवाई की अनिवार्य वीडियो रिकॉर्डिंग हो, ताकि भविष्य में किसी विवाद की स्थिति में निष्पक्ष तरीके से तथ्यों की जांच की जा सके। याचिका में यह भी प्रस्ताव रखा गया है कि ड्यूटी पर मौजूद सभी पुलिसकर्मी नाम-पट्टिका सहित निर्धारित वर्दी में हों और बल प्रयोग की प्रत्येक घटना का स्पष्ट रिकॉर्ड रखा जाए। इसके अलावा किसी भी कार्रवाई के बाद उसकी जवाबदेही तय करने की व्यवस्था हो, जिससे यदि कहीं नियमों का उल्लंघन पाया जाए तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जा सके। अब इस मामले की आगामी सुनवाई पर सभी की नजरें टिकी हैं। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला भविष्य में छात्र आंदोलनों, सार्वजनिक प्रदर्शनों और पुलिस कार्रवाई से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनी मानकों को स्पष्ट कर सकता है। साथ ही यह भी तय करने में मदद मिल सकती है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने और नागरिकों के शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार के बीच संतुलन किस प्रकार सुनिश्चित किया जाए।