Moga में आवारा कुत्तों के हमले से किसान की मौत, ग्रामीणों में प्रशासन के खिलाफ रोष पंजाब के मोगा जिले से एक बेहद दर्दनाक घटना सामने आई है, जहां आवारा कुत्तों के हमले में एक किसान की जान चली गई। यह घटना शनिवार देर शाम की बताई जा रही है, जब किसान खेत में काम खत्म कर घर लौट रहा था। इसी दौरान रास्ते में कुत्तों के झुंड ने उस पर अचानक हमला कर दिया। प्रत्यक्षदर्शियों और ग्रामीणों के अनुसार, कुत्तों ने किसान को चारों ओर से घेर लिया और उस पर बुरी तरह हमला किया। हमले में वह गंभीर रूप से घायल हो गया और मौके पर ही उसकी हालत बिगड़ गई। शरीर पर गहरे घाव और कई जगह चोटों के निशान पाए गए। रविवार सुबह जब ग्रामीण खेतों की ओर जा रहे थे, तो उन्होंने रास्ते में किसान का शव पड़ा देखा। इस घटना की जानकारी मिलते ही पूरे गांव में हड़कंप मच गया और बड़ी संख्या में लोग मौके पर इकट्ठा हो गए। शव को तुरंत अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। मृतक किसान की पहचान कपूरे गांव के निवासी के रूप में हुई है। इस दर्दनाक घटना के बाद परिवार में कोहराम मच गया है और गांव में शोक का माहौल है। ग्रामीणों ने कहा कि किसान मेहनत-मजदूरी कर अपने परिवार का पालन-पोषण करता था। घटना के बाद स्थानीय लोगों में प्रशासन के खिलाफ गहरा आक्रोश देखने को मिला। ग्रामीणों का आरोप है कि आवारा कुत्तों की समस्या को लेकर कई बार शिकायतें की गईं, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। उनका कहना है कि हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। ग्रामीणों ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद स्थानीय स्तर पर कुत्तों की नसबंदी और नियंत्रण के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए गए। इसी लापरवाही का नतीजा है कि अब यह जानलेवा घटना सामने आई है। गांव के लोगों ने मांग की है कि मृतक के परिवार को तुरंत आर्थिक सहायता दी जाए, क्योंकि परिवार की आर्थिक स्थिति पहले से ही कमजोर है। साथ ही उन्होंने प्रशासन से आवारा कुत्तों पर नियंत्रण के लिए सख्त और स्थायी उपाय लागू करने की अपील की है। इस घटना ने एक बार फिर ग्रामीण क्षेत्रों में आवारा कुत्तों की समस्या और उनकी रोकथाम को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। लोगों का कहना है कि यदि समय रहते कार्रवाई होती, तो शायद यह दुखद हादसा टल सकता था।
किसान की जांघ से कुत्ते मांस नोच ले गए।
पंजाब के मोगा जिले के कपूरे गांव में हुई एक दर्दनाक घटना ने पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया है। आवारा कुत्तों के हमले में 50 वर्षीय किसान सरबजीत सिंह की मौत के बाद गांव में भय और चिंता का माहौल बन गया है। ग्रामीण इस घटना को लेकर गहरी नाराजगी जता रहे हैं। घटना के बाद गांव के लोगों ने कहा कि यदि आवारा कुत्ते एक वयस्क व्यक्ति की जान ले सकते हैं, तो छोटे बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जा सकती है। इस सवाल ने ग्रामीणों की चिंता को और बढ़ा दिया है और लोग अपने परिवार की सुरक्षा को लेकर डरे हुए हैं। स्थानीय निवासी गुरप्रीत सिंह कपूरे ने इस घटना पर कड़ा रोष व्यक्त करते हुए कहा कि प्रशासन और सरकार की लापरवाही के कारण ऐसी घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि बार-बार शिकायतों के बावजूद भी कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया गया है। ग्रामीणों का कहना है कि हाईकोर्ट के निर्देशों के बावजूद पंजाब सरकार आवारा कुत्तों की समस्या को नियंत्रित करने में पूरी तरह असफल रही है। उनका दावा है कि इस तरह की घटनाएं पहले भी कई बार हो चुकी हैं, लेकिन समाधान के नाम पर केवल आश्वासन ही मिले हैं। गांव के लोगों ने प्रशासन से मांग की है कि आवारा कुत्तों की समस्या का स्थायी समाधान निकाला जाए और प्रभावित परिवार को तुरंत आर्थिक सहायता दी जाए। साथ ही, उन्होंने बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा के लिए विशेष कदम उठाने की भी अपील की है।

पहले भी हो चुकी कई घटनाएं
पंजाब के मोगा जिले के कपूरे गांव में किसान की मौत के बाद ग्रामीणों में गहरा आक्रोश और चिंता का माहौल है। ग्रामीणों का कहना है कि यह घटना अचानक नहीं हुई, बल्कि पहले से चली आ रही समस्या का गंभीर परिणाम है। गांव में आवारा कुत्तों के हमलों की यह पहली घटना नहीं है। इससे पहले भी इस तरह की 8 से 10 घटनाएं हो चुकी हैं, जिनमें कई लोग घायल हुए हैं। लगातार बढ़ती घटनाओं के बावजूद स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है। ग्रामीणों का आरोप है कि उन्होंने इस समस्या को लेकर प्रशासन को कई बार लिखित और मौखिक रूप से शिकायत दी, लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। लोगों का कहना है कि शिकायतों को नजरअंदाज किया गया, जिससे हालात और गंभीर होते गए। गांव के पंचायत सदस्य जसविंदर सिंह ने इस घटना के लिए सीधे तौर पर पंजाब सरकार और जिला प्रशासन को जिम्मेदार ठहराया है। उनका कहना है कि यदि समय रहते आवारा कुत्तों की नसबंदी और नियंत्रण के लिए प्रभावी कार्रवाई की जाती, तो यह दर्दनाक घटना टाली जा सकती थी। घटना के बाद गांव में शोक और भय का माहौल है। मृतक किसान के घर पर परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है, वहीं ग्रामीण प्रशासन से तुरंत कार्रवाई और स्थायी समाधान की मांग कर रहे हैं, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं दोबारा न हों।
मृतक के परिवार को मुआवजा देने की मांग
पंजाब के मोगा जिले के कपूरे गांव में हुई दर्दनाक घटना के बाद ग्रामीणों में गहरा शोक और आक्रोश है। आवारा कुत्तों के हमले में किसान सरबजीत सिंह की मौत के बाद पूरा गांव सदमे में है और लोग प्रशासन से तुरंत कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। ग्रामीणों ने स्पष्ट रूप से कहा है कि मृतक के परिवार को तत्काल आर्थिक सहायता दी जानी चाहिए, क्योंकि परिवार की पूरी जिम्मेदारी अब टूट चुकी है। सरबजीत सिंह ही घर के एकमात्र कमाने वाले सदस्य थे, ऐसे में परिवार के सामने आजीविका का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। गांव के लोगों का कहना है कि इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि ग्रामीण इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था कितनी कमजोर है। लोगों ने प्रशासन से अपील की है कि प्रभावित परिवार को सरकारी सहायता पैकेज दिया जाए, ताकि वे इस कठिन समय में संभल सकें। इसके साथ ही ग्रामीणों ने आवारा कुत्तों की समस्या के स्थायी समाधान की भी मांग की है। उनका कहना है कि केवल आश्वासन से काम नहीं चलेगा, बल्कि जमीनी स्तर पर नसबंदी, नियंत्रण और निगरानी जैसे ठोस कदम उठाने जरूरी हैं। स्थानीय लोगों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द कार्रवाई नहीं हुई, तो ऐसी घटनाएं भविष्य में भी दोहराई जा सकती हैं। ग्रामीणों ने प्रशासन से इस मामले को गंभीरता से लेने और जल्द से जल्द प्रभावी नीति लागू करने की अपील की है, ताकि लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
कुत्तों को लेकर सुप्रीम कोर्ट भी आदेश दे चुका
सुप्रीम कोर्ट ने देशभर में लगातार बढ़ रहे डॉग बाइट मामलों और उनसे होने वाली गंभीर घटनाओं को देखते हुए स्वतः संज्ञान लिया था। अदालत ने कहा कि सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़े इन मामलों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, खासकर जब बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा पर सवाल उठ रहे हों। इस मामले में मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने पहले के आदेशों को बरकरार रखते हुए कुछ अहम दिशा-निर्देश जारी किए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आवारा कुत्तों के प्रबंधन को लेकर सभी राज्यों और स्थानीय निकायों को जिम्मेदारी के साथ काम करना होगा। अदालत ने यह भी कहा कि एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) नियमों का सख्ती से पालन किया जाए, ताकि आवारा कुत्तों की संख्या को नियंत्रित किया जा सके। इसके साथ ही नियमित टीकाकरण और नसबंदी कार्यक्रमों को प्रभावी ढंग से लागू करने पर जोर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्देशों में सार्वजनिक स्थानों पर आवारा कुत्तों की उपस्थिति को नियंत्रित करने और संवेदनशील इलाकों जैसे स्कूल, अस्पताल और आवासीय क्षेत्रों में विशेष सतर्कता बरतने की बात भी कही। कोर्ट ने साफ किया कि यह मुद्दा केवल पशु कल्याण का नहीं, बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा और संतुलन का है। इसलिए सभी हितधारकों को मिलकर ऐसा समाधान निकालना होगा, जिससे इंसानों और जानवरों दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
सड़कों पर खाना खिलाने (डॉग फीडिंग) को लेकर नियम बनाए
सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों से जुड़े मामलों में सार्वजनिक स्थानों पर भोजन कराने की प्रथा को लेकर महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने कहा कि सड़कों, फुटपाथों और आम रास्तों पर कुत्तों को खाना खिलाने से न केवल भीड़भाड़ की समस्या बढ़ती है, बल्कि इससे सुरक्षा संबंधी जोखिम भी पैदा हो सकते हैं। कोर्ट ने सभी राज्यों और स्थानीय निकायों को निर्देश दिया है कि वे हर वार्ड में निर्धारित स्थानों पर “डेजिग्नेटेड फीडिंग जोन” (निर्धारित भोजन स्थल) बनाएं। इन स्थानों पर ही आवारा कुत्तों को भोजन कराया जाए, ताकि सार्वजनिक स्थानों पर अनावश्यक जमावड़ा न हो और नागरिकों की सुरक्षा बनी रहे। इसके साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति किसी आवारा कुत्ते को अपने निजी परिसर में नियमित रूप से भोजन कराता है या उसे वहां रखता है, तो उसकी जिम्मेदारी भी तय होगी। ऐसे मामलों में सावधानी बरतना अनिवार्य बताया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि कोई ऐसा कुत्ता, जिसे किसी व्यक्ति द्वारा खिलाया या रखा जा रहा है, किसी व्यक्ति को नुकसान पहुंचाता है, तो संबंधित फीडर की जिम्मेदारी तय की जा सकती है। इसमें पीड़ित के उपचार का खर्च और कानूनी जवाबदेही शामिल हो सकती है। अदालत ने अपने निर्देशों में यह भी कहा कि यह व्यवस्था सार्वजनिक सुरक्षा और पशु कल्याण के बीच संतुलन बनाने के उद्देश्य से है। इसलिए सभी संबंधित पक्षों को मिलकर जिम्मेदारी से कार्य करना चाहिए, ताकि किसी भी प्रकार की अप्रिय घटना को रोका जा सके।
डॉग लवर्स बचाव में आए, लोगों से भिड़े
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद देशभर में इस मुद्दे पर लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आईं। आम नागरिकों के एक बड़े वर्ग ने अदालत के फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि सार्वजनिक सुरक्षा सर्वोपरि है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लोगों का कहना है कि देश में हर साल बड़ी संख्या में डॉग बाइट के मामले सामने आते हैं, जिनमें कई बार गंभीर संक्रमण और रेबीज जैसी बीमारियों के कारण जान भी चली जाती है। ऐसे में सड़कों और रिहायशी इलाकों में सुरक्षा सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है। नागरिकों ने संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला देते हुए कहा कि हर व्यक्ति को जीने का अधिकार है, जिसमें सुरक्षित और भयमुक्त वातावरण में जीवन जीना भी शामिल है। इसलिए पार्कों, गलियों और आवासीय सोसायटियों में बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। वहीं दूसरी ओर, पशु अधिकार कार्यकर्ताओं और डॉग लवर्स ने इस आदेश पर आपत्ति जताई है। उनका मानना है कि आवारा कुत्तों को उनके प्राकृतिक वातावरण से हटाकर शेल्टर होम में रखना उचित समाधान नहीं है और यह पशु कल्याण के खिलाफ है। उनका तर्क है कि समस्या का स्थायी समाधान कुत्तों को हटाना नहीं, बल्कि एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) नियमों के तहत उनकी नियमित नसबंदी और टीकाकरण करना है। इससे न केवल उनकी संख्या नियंत्रित होगी बल्कि उनके आक्रामक व्यवहार में भी कमी आएगी और इंसानों तथा जानवरों के बीच संतुलन बनाए रखा जा सकेगा।
स्थानीय स्तर पर बढ़े झगड़े
इस मुद्दे को लेकर देश के कई हिस्सों में तनाव और टकराव की स्थिति देखने को मिली है। आवारा कुत्तों को लेकर चल रही बहस केवल सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रही, बल्कि कई स्थानों पर यह जमीन पर भी विवाद का कारण बन गई। जालंधर की रॉयल कॉलोनी में हालात उस समय बिगड़ गए जब स्थानीय निवासियों और कुछ पशु प्रेमियों के बीच कुत्तों को खाना खिलाने को लेकर बहस शुरू हो गई। देखते ही देखते यह बहस झगड़े में बदल गई और दोनों पक्षों के बीच धक्का-मुक्की और मारपीट की घटनाएं सामने आईं। इसी तरह इंदौर सहित अन्य शहरों में भी इस मुद्दे पर तनाव देखने को मिला। स्थानीय लोगों का कहना था कि आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या और उनके व्यवहार से सुरक्षा को खतरा पैदा हो रहा है, जबकि पशु प्रेमी इसे गलत तरीके से संभाले जाने का आरोप लगा रहे थे। कई जगहों पर स्थिति इतनी बिगड़ गई कि पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा। प्रशासन ने दोनों पक्षों से शांति बनाए रखने की अपील की और मामले को बातचीत के जरिए सुलझाने पर जोर दिया। यह विवाद केवल एक स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक बहस का हिस्सा बन चुका है, जिसमें सार्वजनिक सुरक्षा और पशु कल्याण के बीच संतुलन बनाना सबसे बड़ी चुनौती है।