Lok Sabha सीट विस्तार और महिला आरक्षण विवाद से जुड़ी संवैधानिक राजनीति की बड़ी विफलता

भारत की संसद में हाल में एक बड़ा राजनीतिक विकास हुआ, जब लोकसभा की 543 (तरतालिस) सीटों को 850 करने वाला संविधान संशोधन विधेयक पास नहीं हो सका। यह केवल एक साधारण विधायी असफलता नहीं थी, बल्कि केंद्रीय सरकार पिछले 12 वर्षों में पहली बार संसद में कोई महत्वपूर्ण विधेयक पारित कराने में विफल रही। इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए हमें यह जानना होगा कि यह विधेयक क्या था, क्यों लाया गया था, कहां गलती हुई और अब इसका देश की राजनीति और महिला आरक्षण पर क्या प्रभाव पड़ेगा। सबसे पहले यह समझते हैं कि यह बिल क्या था। सरकार ने संविधान का 131वां संशोधन बिल प्रस्तुत किया था, जिसका उद्देश्य लोकसभा सीटों की संख्या में वृद्धि करना और परिसीमन (Delimitation) की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना था। परिसीमन का मतलब है कि देश की जनसंख्या के अनुसार संसदीय क्षेत्रों की सीमाएं और संख्या निर्धारित करना। चूंकि भारत में जनसंख्या निरंतर बदल रही है, इसलिए कई सीटों पर मतदाताओं की संख्या अत्यधिक बढ़ गई है, जबकि कुछ स्थानों पर कम है। सरकार का तर्क था कि इस असंतुलन को ठीक करने के लिए सीटों की वृद्धि आवश्यक है।

महिला आरक्षण बिल समर्थन के बावजूद बहुमत की कमी से संसद में पराजय

इस बिल का सीधे महिला आरक्षण कानून या ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ से संबंध था। इस कानून के तहत लोकसभा और विधानसभा में 33% सीटें महिलाओं के लिए सुरक्षित की जाएंगी। लेकिन यह आरक्षण तभी प्रभावी होगा जब नई जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया पूरी कर ली जाए। यानी सीटें निर्धारित होंगी, फिर उनमें से एक-तिहाई महिलाओं के लिए सुरक्षित होंगी।

अब देखते हैं कि संसद में क्या घटनाएँ हुईं। इस बिल पर लगभग 21 घंटे तक बहस चली। इसे पास कराने के लिए सरकार ने पूरी कोशिश की। लेकिन जब मतदान हुआ, तो परिणाम कुछ और था। कुल 528 सांसदों ने वोट दिया, जिनमें से 298 ने बिल के समर्थन में और 230 ने विरोध में मतदान किया। चूंकि यह संविधान संशोधन बिल था, इसे पास कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत यानी 352 वोट की आवश्यकता थी। लेकिन सरकार को 54 वोटों की कमी का सामना करना पड़ा और बिल गिर गया।

यहां सबसे बड़ा प्रश्न है कि सरकार क्यों हारी। पहला कारण संख्या का गणित है। NDA के पास कुल मिलाकर लगभग 293 सांसद हैं। सरकार को कम से कम 352 मत चाहिए थे, अर्थात विपक्ष या अन्य दलों से लगभग 60 अतिरिक्त मतों की आवश्यकता थी। लेकिन सरकार केवल 5 अतिरिक्त सांसदों को ही अपने पक्ष में ला सकी। इसका अर्थ स्पष्ट है कि सरकार विपक्ष को भरोसे में लेने में पूरी तरह असफल रही।

दूसरा मुख्य कारण राजनीतिक विश्वास की कमी थी। विपक्ष ने इस विधेयक का विरोध महिला आरक्षण के कारण नहीं किया, बल्कि परिसीमन के मुद्दे पर किया। विपक्ष का आरोप था कि सरकार परिसीमन के जरिए चुनावी नक्शा बदलने का प्रयास कर रही है। विशेषकर दक्षिण भारत के राज्यों को यह चिंता थी कि उनकी संसद में हिस्सेदारी घट जाएगी, क्योंकि उत्तर भारत की जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है।

तीसरा मुद्दा OBC, SC और ST के प्रतिनिधित्व का था। विपक्ष का कहना था कि इस प्रक्रिया में पिछड़े वर्गों को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिलेगा। उनका यह भी आरोप था कि सरकार ने महिला आरक्षण को राजनीतिक उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया है, ताकि परिसीमन को आगे बढ़ाया जा सके।

चौथा कारण समय और प्रक्रिया से संबंधित शिकायती थे। विपक्ष का तर्क था कि 2023 में महिला आरक्षण कानून पारित होने के बाद इसे लागू करने में किसलिए देरी हुई। और अब अचानक विशेष सत्र बुलाकर जल्दी-जल्दी संशोधन लाने की आवश्यकता क्यों थी।

महिला आरक्षण बिल विफलता के कारण और उसके राजनीतिक प्रभाव

अब हम चर्चा करते हैं कि इस पूरे प्रक्रिया में क्या त्रुटियाँ हुईं। सबसे बड़ी गलती राजनीतिक सहमति बनाने में असफलता थी। संविधान संशोधन जैसे महत्वपूर्ण निर्णय सामान्यतः सर्वसम्मति या व्यापक सहमति के साथ लिए जाते हैं। लेकिन इस मामले में सरकार विपक्ष को भरोसे में नहीं ले सकी।

दूसरी भूल थी बिल को अत्यधिक जटिल बनाना। महिला आरक्षण जैसे संवेदनशील और प्रसिद्ध मामले को परिसीमन जैसे विवादास्पद मुद्दे से संबंधित कर दिया गया। इससे विपक्ष को विरोध करने का अवसर प्राप्त हुआ।

तीसरी गलती रणनीति से संबंधित थी। सरकार को पहले से पता था कि उसके पास संख्या कम है, फिर भी उसने बिल को मतदान के लिए रखा। इससे यह संकेत मिला कि या तो सरकार ने राजनीतिक स्थिति का गलत मूल्यांकन किया या यह एक राजनीतिक चाल थी।

अब यह प्रश्न है कि इसका परिणाम क्या होगा। इसका सबसे प्रमुख प्रभाव महिला आरक्षण पर पड़ेगा। अब यह लगभग निश्चित है कि 2029 के लोकसभा चुनाव में महिलाओं को 33% आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा। यह प्रक्रिया अब 2034 तक लेट हो सकती है, क्योंकि पहले नई जनगणना और फिर परिसीमन आवश्यक होगा।

दूसरा प्रभाव राजनीतिक परिस्थिति पर होगा। विपक्ष इसे अपनी महत्वपूर्ण जीत के रूप में दिखा रहा है और दावा कर रहा है कि उसने संविधान और लोकतंत्र को सुरक्षित किया है। दूसरी ओर, सरकार इसे महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ कदम मान रही है और इसे चुनावी मुद्दा बना सकती है।

तीसरा प्रभाव केंद्र और राज्यों के बीच संबंधों पर भी होगा। विशेषकर दक्षिण भारत के राज्यों और केंद्र के बीच तनाव में वृद्धि हो सकती है, क्योंकि परिसीमन का विषय सीधे उनकी राजनीतिक शक्ति से संबंधित है।

महिला आरक्षण बिल के बाद सरकार के विकल्प और लोकतांत्रिक संतुलन की चुनौती

अब आगे क्या किया जाएगा। सरकार के पास कुछ विकल्प मौजूद हैं। पहला, वह इस विधेयक को संशोधित करके पुनः प्रस्तुत कर सकती है और विपक्ष के साथ वार्ता कर सहमति प्राप्त करने का प्रयास कर सकती है। दूसरा, वह परिसीमन के आधार को संशोधित कर सकती है, जैसे कि 2011 की बजाय 2027 की जनगणना को आधार बनाना। तीसरा, वह महिला आरक्षण को परिसीमन से अलग कर लागू करने का विकल्प तलाश सकती है।

यह समग्र प्रक्रिया भारतीय लोकतंत्र की जटिलता को उजागर करती है। यहां सिर्फ बहुमत ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि सहमति, विश्वास और राजनीतिक संतुलन भी आवश्यक हैं। यह घटना भविष्य के चुनावों और राजनीतिक योजनाओं पर भी असर डालेगी।

यह सिर्फ एक बिल की अस्वीकृति नहीं है, बल्कि यह एक संकेत है कि देश की राजनीति अब अधिक प्रतिस्पर्धी और संतुलित हो गई है, जहां हर प्रमुख निर्णय के लिए व्यापक समर्थन आवश्यक रहेगा।

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