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13 दिसंबर 2001 की दर्दनाक याद, संसद पर आतंकी हमले की बरसी, शहीदों को किया गया नमन

भारतीय संसद भवन पर 13 दिसंबर 2001 को हुए घातक आतंकी हमले की बरसी पर शुक्रवार को शहीदों को गहरी श्रद्धांजलि अर्पित की गई। सदन की कार्यवाही शुरू होते ही राज्यसभा के सभापति सी. पी. राधाकृष्णन ने इस दुखद दिवस का उल्लेख करते हुए शहीद सुरक्षाकर्मियों और संसद कर्मचारियों को नमन किया। इसके बाद सदन में दो मिनट का मौन रखकर उनके सर्वोच्च बलिदान को स्मरण किया गया।सभापति राधाकृष्णन ने कहा कि 13 दिसंबर 2001 भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का अत्यंत वेदनापूर्ण दिन है। उस दिन आतंकियों ने लोकतंत्र के सर्वोच्च संस्थान भारतीय संसद पर हमला किया था। उन्होंने कहा, “संसद भवन में उस समय कई सांसद और कर्मचारी मौजूद थे, लेकिन हमारे वीर सुरक्षा कर्मियों ने अद्वितीय साहस, तत्परता और बलिदान से आतंकियों की साजिश को विफल कर लोकतंत्र की मर्यादा की रक्षा की।”उन्होंने आगे कहा कि कई बहादुर जवान आतंकियों और इस ‘लोकतंत्र के मंदिर’ के बीच अडिग खड़े रहे और गोलियां झेलीं। उनकी निस्वार्थ कर्तव्यनिष्ठा आज भी देशवासियों को प्रेरित करती है।

हमले का घटनाक्रम

13 दिसंबर 2001 की सुबह करीब 11:30 बजे पांच आतंकी नकली सरकारी स्टिकर लगी एक सफेद एंबेसडर कार से संसद परिसर में घुसे। सुरक्षा कर्मियों को शक होने पर कार को रोकने की कोशिश की गई, तभी आतंकियों ने स्वचालित हथियारों से अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। संसद परिसर गोलियों की आवाज से दहल उठा और तत्काल अलर्ट जारी किया गया। CRPF और अन्य सुरक्षा बलों ने मोर्चा संभालते हुए संसद भवन को सील कर दिया।

सुरक्षाबलों की त्वरित कार्रवाई में सभी पांच आतंकी मारे गए। इस दौरान दिल्ली पुलिस के 5 जवान, CRPF की एक महिला सुरक्षाकर्मी, राज्यसभा सचिवालय के 2 कर्मचारी और एक माली शहीद हो गए। सुरक्षाबलों की बहादुरी से उस समय संसद में मौजूद सैकड़ों सांसदों, कर्मचारियों और मीडिया प्रतिनिधियों की जान बच सकी।

कानूनी कार्रवाई

हमले के दो दिन बाद 15 दिसंबर 2001 को अफजल गुरु, एस.ए.आर. गिलानी, अफशान गुरु और शौकत हुसैन को गिरफ्तार किया गया। न्यायिक प्रक्रिया के बाद अफजल गुरु को दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई गई, जिसे 9 फरवरी 2013 को तिहाड़ जेल में फांसी के रूप में लागू किया गया।

लोकतंत्र की आत्मा पर हमला

राज्यसभा के सदस्यों ने कहा कि संसद पर हमला केवल एक इमारत पर नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा पर हमला था। सदन ने शहीदों के परिजनों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए दोहराया कि देश उनके बलिदान को कभी नहीं भूलेगा और लोकतांत्रिक आदर्शों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध रहेगा। संसद पर हुआ यह हमला भारत के इतिहास की गंभीर आतंकी घटनाओं में से एक माना जाता है

 

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