Shiv Sena (UBT) में जारी राजनीतिक उथल-पुथल के बीच पार्टी के छह बागी सांसदों ने बड़ा कदम उठाते हुए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात की है। सूत्रों के अनुसार, इन सांसदों ने स्पीकर को एक पत्र सौंपकर स्पष्ट किया है कि वे अब एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के साथ जुड़ना चाहते हैं। इस घटनाक्रम ने महाराष्ट्र की राजनीति में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है। बताया जा रहा है कि सांसदों ने अपने पत्र में आरोप लगाया है कि शिवसेना (UBT) अपनी मूल विचारधारा और राजनीतिक उद्देश्यों से भटक गई है। उनका कहना है कि पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेता कांग्रेस के साथ नजदीकी बढ़ाने और संगठन को उस दिशा में ले जाने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे वे सहमत नहीं हैं। इसी वजह से उन्होंने अलग राजनीतिक रास्ता अपनाने का फैसला किया है। बागी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष से अनुरोध किया है कि उन्हें संसद में शिवसेना (शिंदे गुट) के साथ मान्यता दी जाए और उनकी सीटों की व्यवस्था भी उसी अनुसार की जाए। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि यह प्रक्रिया पूरी होती है तो संसद में शिंदे गुट की ताकत और प्रभाव बढ़ सकता है। इस घटनाक्रम को उद्धव ठाकरे गुट के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। पार्टी पहले ही कई राजनीतिक चुनौतियों का सामना कर रही है और अब सांसदों की इस बगावत ने संगठन की एकजुटता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर दोनों गुटों की ओर से और प्रतिक्रियाएं सामने आने की संभावना है, जिससे महाराष्ट्र की राजनीति में हलचल और तेज हो सकती है।
चिट्ठी में क्या लिखा है
लोकसभा अध्यक्ष को सौंपे गए पत्र में शिवसेना (UBT) के बागी सांसदों ने पार्टी नेतृत्व पर गंभीर आरोप लगाए हैं। सांसदों का कहना है कि संगठन अब अपनी मूल विचारधारा और राजनीतिक दिशा से दूर होता जा रहा है, जिसके कारण उन्हें यह कठिन फैसला लेना पड़ा। पत्र में उन्होंने अपनी असहमति के कारणों को विस्तार से रखा है। बागी सांसदों ने दावा किया है कि पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेता कांग्रेस के साथ अत्यधिक नजदीकी बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं और संगठन को उसी दिशा में ले जाना चाहते हैं। सांसदों का मानना है कि यह कदम शिवसेना की पारंपरिक पहचान और सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है। इसी वजह से उन्होंने पार्टी से अलग होने का निर्णय लिया है। पत्र में सांसदों ने स्पष्ट रूप से लिखा है कि वे अब एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले शिवसेना गुट के साथ जुड़ना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि छहों सांसद सामूहिक रूप से शिंदे गुट में विलय का फैसला कर चुके हैं और भविष्य में उसी राजनीतिक मंच के साथ काम करेंगे। साथ ही सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष से अनुरोध किया है कि संसद में उनकी बैठने की व्यवस्था और राजनीतिक पहचान को भी शिंदे गुट के अनुसार मान्यता दी जाए। इस मांग के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में हलचल और बढ़ गई है तथा आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिल सकते हैं।

बागी सांसदों ने कैसे किया खेल
शिवसेना (UBT) के बागी सांसदों की गतिविधियों को लेकर अब कई नई जानकारियां सामने आ रही हैं। बताया जा रहा है कि दिल्ली में हुए राजनीतिक घटनाक्रम से पहले नेताओं की आवाजाही बेहद गोपनीय तरीके से की गई थी। अलग-अलग स्थानों से सांसदों के राजधानी पहुंचने की योजना पहले से तैयार की गई थी, जिससे किसी तरह की राजनीतिक चर्चा समय से पहले सामने न आ सके। नागेश पाटिल अष्टिकार 16 जून की देर रात नांदेड़ से निजी विमान के जरिए दिल्ली पहुंचे। इसी दिन संजय देशमुख और संजय जाधव भी अलग-अलग प्राइवेट जेट से राजधानी पहुंचे। वहीं भाऊसाहब वाघचौरे हैदराबाद से दिल्ली आए और बाद में अन्य नेताओं के साथ संपर्क में रहे। राजनीतिक गतिविधियों के इस दौर में संजय दीना पाटिल और विधायक प्रताप सरनायक भी 16 जून की रात दिल्ली पहुंचे। दूसरी ओर, एकनाथ शिंदे मुंबई से जयपुर गए और वहां से आगे दिल्ली पहुंचे। इन यात्राओं को लेकर राजनीतिक गलियारों में कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। इसी क्रम में धाराशिव से सांसद ओमराजे निंबालकर भी श्रीकांत शिंदे के साथ पुणे से दिल्ली पहुंचे। अलग-अलग नेताओं का एक ही समय में राजधानी पहुंचना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि पूरे घटनाक्रम की रणनीति पहले से तैयार की गई थी। बाद में हुई बैठकों और राजनीतिक फैसलों ने इन अटकलों को और मजबूत कर दिया है।
कब क्या हुआ ये भी जानिए
सांसदों का आगे का क्या प्लान
यूबीटी(शिवसेना) के 6 बागी सांसद 20 जून को एकनाथ शिंदे से चर्चा करेंगे। इसके बाद विस्तृत जानकारी देंगे कि उन्होंने स्पीकर ओम बिरला से कब मुलाकात की। बागी सांसद उस पत्र को जारी करेंगे जिसमें बताया जाएगा कि उन्होंने पार्टी से अलग होने का निर्णय क्यों लिया। सांसदों का कहना है कि शिवसेना (UBT) अपनी मूल विचारधारा से विमुख हो गई है। वे आरोप लगा रहे हैं कि पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेता कांग्रेस के साथ अत्यधिक घनिष्ठता बढ़ा रहे हैं, जिससे संगठन की पहचान प्रभावित हो रही है। इसी कारण से उन्होंने अलग रास्ता अपनाने का विकल्प चुना है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह निर्णय सिर्फ व्यक्तिगत असहमति का परिणाम नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर लंबे समय से चले आ रहे वैचारिक मतभेदों का भी संकेत हो सकता है। सांसदों का यह निर्णय आगामी दिनों में महाराष्ट्र की राजनीति पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है। दिल्ली में इस पूरे घटनाक्रम को अत्यंत गोपनीय तरीके से अंजाम दिया गया है। इससे यह इंगित होता है कि इस कदम की तैयारी पूर्व से की गई थी।










