देशभर में आज महाशिवरात्रि की धूम है। मंदिरों में घंटियां बज रही हैं, रुद्राभिषेक और जलाभिषेक हो रहे हैं, श्रद्धालु व्रत रखकर भोलेनाथ की आराधना में लीन हैं। “हर-हर महादेव” के जयकारों के बीच पूरा वातावरण भक्तिमय बना हुआ है।
इसी बीच आगरा से एक ऐसी खबर सामने आई है, जिसने नए विवाद को जन्म दे दिया है।
क्या है पूरा मामला?
महाशिवरात्रि के अवसर पर अखिल भारत हिंदू महासभा के मंडल महामंत्री नीतेश भारद्वाज कलश में गोमूत्र लेकर ताजमहल के पश्चिमी गेट पर पहुंचे। उनका ऐलान था कि वे ताजमहल को गोमूत्र, गोबर और गंगाजल से “शुद्ध” करेंगे।
उनका दावा है कि ताजमहल वास्तव में “तेजो महालय” है और उर्स के दौरान इसे “अपवित्र” किया गया है। बता दें कि उर्स सूफी परंपरा में किसी संत की पुण्यतिथि पर मनाया जाने वाला आयोजन है, जिसे शोक नहीं बल्कि “ईश्वर से मिलन” के रूप में देखा जाता है।
पुलिस की कार्रवाई
प्रशासन पहले से सतर्क था। जैसे ही संबंधित पदाधिकारी बैरियर पार करने की कोशिश करने लगे, पुलिस ने उन्हें रोक दिया। करीब 15 मिनट तक नोकझोंक चली। मौके पर मौजूद पर्यटक भी रुककर यह दृश्य देखते रहे।
स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने उन्हें हिरासत में लेकर थाने भेज दिया। प्रशासन का स्पष्ट कहना है कि संरक्षित ऐतिहासिक स्मारकों पर किसी भी प्रकार की धार्मिक या राजनीतिक गतिविधि की अनुमति नहीं है।

ताजमहल बनाम “तेजो महालय” विवाद
ताजमहल को आम तौर पर मुगल बादशाह शाहजहां द्वारा अपनी पत्नी मुमताज महल की याद में बनवाया गया मकबरा माना जाता है।
हालांकि, समय-समय पर कुछ समूह इसे “तेजो महालय” बताते रहे हैं। यह विवाद अदालतों तक भी पहुंच चुका है। लेकिन अब तक आधिकारिक ऐतिहासिक और पुरातात्विक रिकॉर्ड ताजमहल को मुगलकालीन स्मारक ही मानते हैं।
इतिहास के दावों पर बहस संभव है, शोध संभव है, याचिका दायर की जा सकती है — लेकिन बिना न्यायिक या प्रशासनिक अनुमति के किसी संरक्षित स्मारक पर धार्मिक अनुष्ठान करना कानून के दायरे में नहीं आता।
बड़ा सवाल
महाशिवरात्रि जैसे पावन दिन पर उठे इस कदम ने कई सवाल खड़े किए हैं —
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क्या आस्था के नाम पर सार्वजनिक स्मारकों पर इस तरह की कार्रवाई उचित है?
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अगर एक समूह को अनुमति दी जाए, तो क्या कल कोई अन्य समूह किसी और स्मारक पर अपनी मान्यता के आधार पर आयोजन नहीं करेगा?
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कानून और आस्था के बीच संतुलन कैसे बना रहे?
विशेषज्ञों का कहना है कि लोकतंत्र में हर असहमति का संवैधानिक रास्ता होता है। नियमों में बदलाव की मांग अदालत और सरकार के माध्यम से की जा सकती है, न कि प्रशासनिक बैरियर तोड़कर।
धर्म बनाम कानून?
धर्म आस्था का विषय है, लेकिन संरक्षित स्मारक कानून के अधीन होते हैं। अगर हर समूह अपनी मान्यता के आधार पर सार्वजनिक स्थलों पर अनुष्ठान करने लगे, तो कानून-व्यवस्था की स्थिति चुनौतीपूर्ण हो सकती है।
ताजमहल एक अंतरराष्ट्रीय पहचान वाला स्मारक है, जहां प्रतिदिन हजारों देशी-विदेशी पर्यटक आते हैं। किसी भी तरह का टकराव देश की छवि पर असर डाल सकता है।