रामचंद्र छत्रपति हत्याकांड में गुरमीत राम रहीम बरी, हाईकोर्ट ने उठाए CBI जांच पर सवाल

Punjab and Haryana High Court ने डेरा सच्चा सौदा प्रमुख Gurmeet Ram Rahim Singh को 2002 के चर्चित पत्रकार हत्या मामले में बरी कर दिया है। यह मामला पत्रकार Ram Chandra Chhatrapati की हत्या से जुड़ा था। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि जांच एजेंसी आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत पेश नहीं कर पाई।

यह फैसला 7 मार्च को सुनाया गया था, जिसके बाद अदालत ने 113 पन्नों का विस्तृत आदेश भी जारी किया।

क्या है पूरा मामला

साल 2002 में हरियाणा के सिरसा में पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। छत्रपति एक स्थानीय अखबार चलाते थे और उन्होंने डेरा सच्चा सौदा से जुड़े कुछ विवादित मामलों को प्रकाशित किया था। इसके बाद उनकी हत्या हो गई थी।

इस मामले की जांच बाद में Central Bureau of Investigation (CBI) को सौंपी गई थी। जांच के बाद CBI ने डेरा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को इस केस में आरोपी बनाया था।

2019 में मिली थी उम्रकैद

जनवरी 2019 में Panchkula की विशेष CBI अदालत ने गुरमीत राम रहीम सिंह को दोषी मानते हुए उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसके बाद राम रहीम ने इस फैसले को पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

हाईकोर्ट ने क्या कहा

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि इस हत्या में गुरमीत राम रहीम की भूमिका थी। अदालत ने कहा कि अगर किसी मामले में आरोपी के दोषी और निर्दोष होने की दो संभावनाएं हों, तो कानून के अनुसार आरोपी को संदेह का लाभ दिया जाता है।

अदालत ने मामले के मुख्य गवाह खट्टा सिंह की गवाही पर भी सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि गवाह ने कई बार अपने बयान बदले और शुरुआत में राम रहीम का नाम भी नहीं लिया था। ऐसे में उसकी गवाही पूरी तरह भरोसेमंद नहीं मानी जा सकती।

CBI जांच पर भी उठाए सवाल

हाईकोर्ट ने इस मामले में CBI की जांच प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि ऐसा लगता है कि जांच एजेंसी पर केस को जल्दी खत्म करने का दबाव था, जिसके कारण गवाहों पर बयान देने के लिए दबाव डाला गया।

जेल से अभी बाहर नहीं आएंगे राम रहीम

हालांकि इस मामले में बरी होने के बावजूद गुरमीत राम रहीम अभी जेल से बाहर नहीं आ सकेंगे। वह फिलहाल Sunaria Jail, Rohtak में बंद हैं। उन्हें 2017 में अपनी दो शिष्याओं से दुष्कर्म के मामले में 20 साल की सजा सुनाई गई थी।

हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद यह मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है। कुछ लोग इस फैसले का स्वागत कर रहे हैं, जबकि कुछ लोग जांच प्रक्रिया और न्याय व्यवस्था पर सवाल उठा रहे हैं।

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