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रूस में भारतीय छात्रों की सुरक्षा खतरे में, हमलों में तीन गुना बढ़ोतरी

रूस में भारतीय मेडिकल छात्रों पर हुए ताज़ा चाकू हमले ने एक बार फिर विदेशों में पढ़ रहे भारतीय छात्रों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस हमले में चार भारतीय छात्र गंभीर रूप से घायल हो गए। यह घटना न केवल चिंता बढ़ाने वाली है, बल्कि उन हज़ारों छात्रों की रोज़मर्रा की हकीकत को भी उजागर करती है, जो बेहतर भविष्य की उम्मीद लेकर विदेशों का रुख करते हैं।

यह हमला अचानक जरूर हुआ, लेकिन इसके पीछे छिपी चिंताएं नई नहीं हैं। लंबे समय से रूस में पढ़ रहे भारतीय छात्र नस्लीय भेदभाव, शोषण और असुरक्षा की शिकायत करते आ रहे हैं। विदेश मंत्रालय के ताज़ा आंकड़े इस सच्चाई को और पुख्ता करते हैं।

50% से ज़्यादा शिकायतें अकेले रूस से

विदेश मंत्रालय के अनुसार, दुनिया भर में भारतीय छात्रों द्वारा दर्ज कराई गई कुल शिकायतों में से 50 प्रतिशत से अधिक शिकायतें केवल रूस से सामने आई हैं। वर्ष 2025 में कुल 350 शिकायतें दर्ज हुईं, जिनमें से 200 से अधिक मामले रूस से जुड़े थे। यह आंकड़ा दर्शाता है कि समस्या केवल कुछ घटनाओं तक सीमित नहीं, बल्कि यह एक गंभीर और लगातार बढ़ती चुनौती बन चुकी है।

तीन गुना बढ़े हमले

पिछले तीन वर्षों के आंकड़े स्थिति की भयावहता को साफ़ दिखाते हैं।

  • 2023: 68 शिकायतें
  • 2024: 78 शिकायतें
  • 2025: 201 शिकायतें

सिर्फ एक साल में शिकायतों की संख्या लगभग तीन गुना बढ़ जाना, यह सवाल खड़ा करता है कि क्या भारतीय छात्रों की सुरक्षा को लेकर पर्याप्त कदम उठाए जा रहे हैं?

कम फीस, लेकिन भारी जोखिम

रूस भारतीय छात्रों, खासकर मेडिकल की पढ़ाई करने वालों के लिए एक लोकप्रिय गंतव्य रहा है। कम ट्यूशन फीस, आसान प्रवेश प्रक्रिया और कम प्रतिस्पर्धा के चलते राजस्थान, गुजरात, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, केरल और तमिलनाडु से बड़ी संख्या में छात्र रूस जाते हैं।

लेकिन अब यही सस्ती पढ़ाई कई छात्रों के लिए महंगे खतरे में बदलती दिख रही है। नस्लीय भेदभाव, शैक्षणिक शोषण, मानसिक दबाव और सुरक्षा की कमी — ये सभी चुनौतियां वहां पढ़ रहे छात्रों के सामने लगातार बनी हुई हैं।

विश्वविद्यालयों पर गंभीर आरोप

फॉरेन मेडिकल ग्रेजुएट्स एसोसिएशन (FMGA) के अनुसार, कई रूसी विश्वविद्यालय तय मानकों का उल्लंघन करते हुए निर्धारित सीमा से कहीं अधिक छात्रों को प्रवेश दे देते हैं। ऑल एफएमजीज़ के कोऑर्डिनेटर डी. कौशल का कहना है कि कुछ संस्थान 1,200 से भी अधिक छात्रों को एडमिशन दे देते हैं, जबकि संसाधन सीमित होते हैं। बाद में नियमों का हवाला देकर छात्रों को बाहर कर दिया जाता है, जिससे उनका भविष्य अधर में लटक जाता है।

डर, दबाव और चुप्पी

भारतीय छात्रों को वहां न केवल शैक्षणिक शोषण का सामना करना पड़ता है, बल्कि सामाजिक भेदभाव, नस्लीय टिप्पणियों और कभी-कभी हिंसक घटनाओं से भी गुजरना पड़ता है। कई छात्र डर के कारण शिकायत दर्ज नहीं कराते, क्योंकि उन्हें वीज़ा और पढ़ाई पर असर पड़ने का खतरा सताता रहता है। भाषा की बाधा और स्थानीय कानूनों की जानकारी की कमी इस समस्या को और गंभीर बना देती है।

सरकार के प्रयास और ज़मीनी हकीकत

लोकसभा में पूछे गए सवाल के जवाब में विदेश राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने बताया कि विदेशों में भारतीय मिशनों में तैनात अधिकारी छात्रों से संपर्क में रहते हैं और उन्हें सुरक्षा संबंधी जानकारी देते हैं। दूतावास के वरिष्ठ अधिकारी संस्थानों का दौरा कर छात्रों से संवाद भी करते हैं।

हालांकि, इसके बावजूद लगातार बढ़ती शिकायतें यह संकेत देती हैं कि मौजूदा प्रयास नाकाफी साबित हो रहे हैं। छात्रों और उनके परिवारों को सिर्फ आश्वासन नहीं, बल्कि ठोस सुरक्षा व्यवस्था और त्वरित सहायता की आवश्यकता है।

समय रहते ठोस कदम जरूरी

भारत और रूस के बीच शैक्षणिक सहयोग ढांचे की समीक्षा बेहद ज़रूरी है। जिन विश्वविद्यालयों से बार-बार शिकायतें सामने आ रही हैं, उनकी मान्यता और गतिविधियों पर सख्त निगरानी होनी चाहिए। साथ ही, छात्रों को विदेश जाने से पहले संभावित जोखिमों की पूरी जानकारी देना भी आवश्यक है।

सिर्फ चार छात्र नहीं, हज़ारों की चिंता

रूस में हमले में घायल चार भारतीय छात्र सिर्फ चार नाम नहीं हैं, बल्कि वे उन हज़ारों युवाओं की आवाज़ हैं, जो अपने सपनों की पढ़ाई के लिए घर-परिवार से दूर, असुरक्षा के माहौल में जी रहे हैं। यह घटना एक चेतावनी है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह संकट और गहराता जाएगा।

अब ज़रूरत है कि सरकार, शैक्षणिक संस्थान और समाज मिलकर यह सुनिश्चित करें कि भारतीय छात्र दुनिया के किसी भी कोने में हों — वे सुरक्षित रहें, सम्मान के साथ पढ़ सकें और उनका भविष्य हिंसा व भेदभाव की भेंट न चढ़े।

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