राज्यसभा सीट पर छगन भुजबल की नजर

Maharashtra की राजनीति में राज्यसभा की एक सीट को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) की नेता सुनेत्रा पवार के इस्तीफे के बाद खाली हुई सीट पर कई नेताओं की नजरें टिकी हैं। इस बीच राज्य के वरिष्ठ ओबीसी नेता और मौजूदा मंत्री छगन भुजबल का नाम सबसे प्रमुख दावेदारों में सामने आ रहा है। राज्य की राजनीति में लंबे समय से सक्रिय छगन भुजबल अब राष्ट्रीय स्तर पर अपनी भूमिका बढ़ाने के इच्छुक बताए जा रहे हैं। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि वह राज्यसभा के जरिए दिल्ली की राजनीति में प्रवेश करना चाहते हैं। इसके लिए उन्होंने पार्टी नेतृत्व के सामने अपनी दावेदारी भी मजबूत तरीके से रखी है। महाराष्ट्र में ओबीसी समाज के प्रभावशाली चेहरे माने जाने वाले भुजबल का मानना है कि संसद के उच्च सदन में उनकी मौजूदगी पार्टी और समाज दोनों के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है। उनके समर्थक भी लगातार राज्यसभा में भेजे जाने की मांग उठा रहे हैं। यदि उन्हें राज्यसभा भेजा जाता है तो वह मंत्री पद छोड़ने के लिए भी तैयार हैं। यही वजह है कि इस संभावित बदलाव को लेकर राजनीतिक समीकरणों पर भी चर्चा शुरू हो गई है। माना जा रहा है कि उनके स्थान पर किसी नए चेहरे को मंत्रिमंडल में मौका मिल सकता है।

इसी बीच यह भी खबरें सामने आ रही हैं कि भुजबल अपने भतीजे समीर भुजबल को राज्य मंत्रिमंडल में शामिल कराने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि पार्टी की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया गया है, लेकिन राजनीतिक चर्चाओं का बाजार गर्म है। एनसीपी के भीतर राज्यसभा सीट को लेकर कई नेताओं की महत्वाकांक्षाएं भी सामने आ रही हैं। ऐसे में पार्टी नेतृत्व के लिए अंतिम निर्णय लेना आसान नहीं माना जा रहा। पार्टी इस बात पर विचार कर रही है कि किस उम्मीदवार को भेजने से संगठन और राजनीतिक समीकरण दोनों मजबूत होंगे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि छगन भुजबल को राज्यसभा भेजा जाता है तो इससे ओबीसी वोट बैंक को सकारात्मक संदेश जा सकता है। महाराष्ट्र में ओबीसी राजनीति का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है और ऐसे में पार्टी इस पहलू को नजरअंदाज नहीं करना चाहेगी। दूसरी ओर, कुछ नेताओं का मानना है कि पार्टी को युवा नेतृत्व को अवसर देना चाहिए। इसलिए राज्यसभा सीट को लेकर अंतिम फैसला कई राजनीतिक और सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखकर लिया जाएगा। आने वाले दिनों में पार्टी की रणनीति और अधिक स्पष्ट हो सकती है। सभी की नजरें एनसीपी नेतृत्व के निर्णय पर टिकी हैं। राज्यसभा की इस खाली सीट को लेकर जारी चर्चाओं ने महाराष्ट्र की राजनीति को एक बार फिर गर्मा दिया है। अब देखना होगा कि पार्टी अनुभव को प्राथमिकता देती है या किसी नए चेहरे पर भरोसा जताती है।

अभी दो साल बाकी है कार्यकाल

महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर छगन भुजबल का नाम चर्चा के केंद्र में है। राज्य के वरिष्ठ ओबीसी नेता माने जाने वाले भुजबल की नजर अब राज्यसभा की उस सीट पर है जो सुनेत्रा पवार के इस्तीफे के बाद रिक्त हुई है। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि वह सक्रिय रूप से इस सीट के लिए अपनी दावेदारी मजबूत करने में जुटे हुए हैं। छगन भुजबल का राजनीतिक अनुभव काफी लंबा और प्रभावशाली रहा है। वह महाराष्ट्र सरकार में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं और उपमुख्यमंत्री के साथ-साथ गृह मंत्री के पद पर भी कार्य कर चुके हैं। ओबीसी समाज में उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है और समता परिषद के माध्यम से उन्होंने वर्षों तक सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर अपनी पहचान बनाई है। राज्यसभा की इस सीट का कार्यकाल अभी करीब दो वर्ष शेष है, इसलिए यह अवसर भुजबल के लिए राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने का मार्ग खोल सकता है। माना जा रहा है कि यदि उन्हें राज्यसभा भेजा जाता है तो वह दिल्ली की राजनीति में अधिक प्रभावी भूमिका निभाना चाहेंगे। राज्यसभा सदस्य बनने की स्थिति में उन्हें अपने मंत्री पद और विधानसभा सदस्यता से इस्तीफा देना पड़ सकता है। वर्तमान में वह नासिक जिले की येवला विधानसभा सीट का प्रतिनिधित्व करते हैं और राज्य सरकार में खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री के रूप में कार्यरत हैं। ऐसे में उनके संभावित राज्यसभा जाने से राज्य की राजनीति में कई नए समीकरण बन सकते हैं। राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि भुजबल अपने भतीजे समीर भुजबल को राज्य मंत्रिमंडल में स्थान दिलाने के पक्ष में हैं। समीर भुजबल पहले नासिक से लोकसभा सांसद रह चुके हैं और पार्टी संगठन में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभा चुके हैं। उन्हें अजित पवार गुट की मुंबई इकाई का नेतृत्व करने का अनुभव भी प्राप्त है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि छगन भुजबल को राज्यसभा भेजा जाता है तो इससे पार्टी को ओबीसी समुदाय में सकारात्मक संदेश देने का मौका मिल सकता है। वहीं समीर भुजबल को नई जिम्मेदारी मिलने की स्थिति में पार्टी संगठन और सरकार दोनों में नए राजनीतिक समीकरण देखने को मिल सकते हैं। फिलहाल अंतिम फैसला पार्टी नेतृत्व के हाथ में है और सभी की नजरें इसी निर्णय पर टिकी हुई हैं।

परिवारवाद पर दो मापदंड!

छगन भुजबल के खेमे का कहना है कि यदि अन्य नेताओं के परिवार के सदस्य महत्वपूर्ण पदों पर पहुंच सकते हैं, तो भुजबल परिवार पर परिवारवाद के आरोप क्यों लगाए जाते हैं। भुजबल के समर्थकों में से एक नेता ने कहा कि जब अजीत पवार उपमुख्यमंत्री थे, तब सुनेत्रा पवार को सांसद बनाया गया, सुनील तटकरे के सांसद रहते उनकी बेटी को राज्य में कैबिनेट मंत्री बनाया गया, और पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष राज्य की उपमुख्यमंत्री हैं, जबकि उनके बेटे पार्थ पवार सांसद हैं, तो भुजबल परिवार के मामले में अलग मानदंड क्यों अपनाए जा रहे हैं। छगन भुजबल ने यह लॉबिंग तब शुरू की है जब अजित पवार नहीं हैं, क्योंकि अजित पवार के जीवित रहने के दौरान भुजबल की ताकत कमो गई थी। अब देखना है कि जब एनसीपी की कमान नई पीढ़ी के हाथ में है, तो क्या भुजबल की इच्छाएं पूरी होंगी।
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