रक्षा मंत्रालय की सालाना रिपोर्ट में भारत-चीन सीमा को लेकर एक अहम जानकारी सामने आई है। रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2025 के दौरान उत्तरी सीमा के सामने चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) की तैनाती में कमी देखने को मिली। इसे LAC पर लंबे समय से जारी सैन्य तनाव को कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है। वास्तविक नियंत्रण रेखा के करीब चीन की तरफ अलग-अलग इलाकों और पारंपरिक ट्रेनिंग क्षेत्रों में PLA की कंबाइंड आर्म्स ब्रिगेड तैनात हैं। इन सैन्य इकाइयों में अलग-अलग तरह की सैन्य क्षमताएं शामिल होती हैं, जिससे सीमा के आसपास उनकी मौजूदगी रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती है। गलवान घाटी में वर्ष 2020 में हुई झड़प के बाद भारत और चीन ने LAC के कई हिस्सों में बड़ी संख्या में सैनिकों की तैनाती की थी। इसके बाद दोनों देशों के बीच सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर लगातार बातचीत के जरिए तनाव कम करने की कोशिश होती रही। अब रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट में चीनी सैनिकों की संख्या में कमी का जिक्र इसी प्रक्रिया में एक अहम घटनाक्रम माना जा रहा है। भारत की ओर से सीमा पर केवल सैनिकों की संख्या कम करने के बजाय स्थायी रूप से सैन्य तनाव घटाने पर जोर दिया जाता रहा है। इसके तहत सीमा के आसपास मौजूद अतिरिक्त सैनिकों और सैन्य संसाधनों को पीछे के इलाकों में ले जाना महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में चीन की तैनाती में कमी को आगे की बातचीत के लिए सकारात्मक संकेत के रूप में देखा जा सकता है। रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट में उत्तरी सीमा की स्थिति पर नजर रखने और सुरक्षा तैयारियों को बनाए रखने की बात भी सामने आती है। भारत अपनी सीमा पर किसी भी संभावित चुनौती से निपटने के लिए सैन्य तैयारियों को मजबूत बनाए हुए है। ऐसे में चीन की ओर से तैनाती में कमी के बावजूद भारतीय सेना की सतर्कता बनी हुई है। भारत और चीन के बीच हाल के वर्षों में सीमा से जुड़े मुद्दों को लेकर कई दौर की सैन्य और कूटनीतिक बातचीत हुई है। दोनों देशों के बीच बातचीत का उद्देश्य LAC पर तनाव कम करना और सीमा क्षेत्रों में स्थिरता बनाए रखना है। चीनी सेना की तैनाती में आई कमी आने वाले समय में दोनों देशों के संबंधों को लेकर होने वाली बातचीत के लिए अहम साबित हो सकती है।
भारतीय सेना की दूसरी शर्त मान गई
भारत-चीन सीमा पर सैन्य स्थिति को लेकर रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट में एक अहम पहलू सामने आया है। वर्ष 2024 में दोनों देशों के बीच डिसएंगेजमेंट की प्रक्रिया के बाद अब सीमा पर सैनिकों की संख्या कम करने यानी डि-एस्केलेशन की दिशा में भी बदलाव दिखाई दे रहा है। इसे LAC पर तनाव घटाने की प्रक्रिया में अगले कदम के तौर पर देखा जा रहा है। सीमा पर सामान्य स्थिति बहाल करने के लिए अभी एक और महत्वपूर्ण चरण बाकी है। इसे डि-इंडक्शन कहा जाता है, जिसमें सीमा के आसपास तैनात सैनिकों को पीछे के सुरक्षित ठिकानों या बैरकों में वापस भेजना शामिल है। भारत की ओर से लंबे समय से इस दिशा में आगे बढ़ने पर जोर दिया जाता रहा है, ताकि LAC पर 2020 से पहले जैसी स्थिति धीरे-धीरे कायम हो सके। गलवान घाटी की घटना के बाद भारत और चीन के बीच सीमा पर सैन्य तनाव काफी बढ़ गया था। इसके बाद दोनों देशों ने कई स्तरों पर बातचीत के जरिए स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश की। ऐसे में सैनिकों की संख्या में कमी को तनाव कम करने की प्रक्रिया में एक सकारात्मक कदम माना जा सकता है, लेकिन इसे पूरी तरह सामान्य स्थिति की वापसी नहीं कहा जा सकता। वहीं, अरुणाचल प्रदेश के अपर सुबानसिरी इलाके में दोनों देशों की सेनाओं के बीच गतिरोध की स्थिति बनी हुई है। इस मामले को सुलझाने के लिए भारत और चीन के बीच कोर कमांडर स्तर की दो बैठकें हो चुकी हैं। बातचीत के बावजूद इस क्षेत्र में स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं हुई है और दोनों पक्ष लगातार हालात पर नजर बनाए हुए हैं। पूर्वी लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक LAC के सभी सेक्टर में भारतीय सेना की तैनाती मजबूत है। सेना को सीमा पर किसी भी संभावित चुनौती का सामना करने के लिए तैयार रखा गया है। इसका साफ मतलब है कि बातचीत और तनाव कम करने की कोशिशों के साथ भारत अपनी सुरक्षा तैयारियों में किसी तरह की ढील नहीं दे रहा है। आने वाले समय में भारत और चीन के बीच होने वाली सैन्य एवं कूटनीतिक बातचीत काफी अहम रहने वाली है। यदि दोनों पक्ष सैनिकों की वापसी और सीमा पर तनाव कम करने के बाकी चरणों पर सहमति बनाते हैं, तो इससे LAC पर स्थायी स्थिरता की दिशा में आगे बढ़ने का रास्ता खुल सकता है। हालांकि, फिलहाल सीमा पर स्थिति को लेकर सतर्कता और बातचीत दोनों साथ-साथ जारी हैं।

चीन की कंबाइंड आर्म्स ब्रिगेड
चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) की तैनाती को लेकर सामने आई जानकारी से साफ है कि LAC पर अभी भी बड़ी संख्या में सैनिक और सैन्य संसाधन मौजूद हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, चीन की एक कंबाइंड आर्म्स ब्रिगेड को करीब 14 से 15 हजार सैनिकों वाली बड़ी सैन्य इकाई माना जाता है। ऐसे में अगर LAC से सटे इलाकों और प्रशिक्षण क्षेत्रों में 10 ऐसी ब्रिगेड सक्रिय हैं, तो इनकी कुल संख्या करीब डेढ़ लाख सैनिकों तक पहुंच सकती है। कंबाइंड आर्म्स ब्रिगेड की खासियत यह है कि इसमें केवल पैदल सैनिक ही शामिल नहीं होते। ऐसी यूनिट में अलग-अलग सैन्य क्षमताओं को एक साथ जोड़ा जाता है, ताकि जरूरत पड़ने पर जमीन पर तेजी से और समन्वित तरीके से अभियान चलाया जा सके। यही वजह है कि इस तरह की ब्रिगेड की मौजूदगी को सीमा पर चीन की सैन्य क्षमता के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है। इन ब्रिगेड में इंफेंट्री के साथ मैकेनाइज्ड यूनिट्स भी शामिल रहती हैं। इनके पास बख्तरबंद वाहन और अन्य सैन्य मशीनरी होती है, जिससे सैनिकों और हथियारों को कठिन इलाकों में तेजी से आगे बढ़ाने में मदद मिलती है। इसके अलावा आर्टिलरी यूनिट्स भी इनका अहम हिस्सा होती हैं, जो जरूरत पड़ने पर दूर से फायर सपोर्ट देने की क्षमता रखती हैं। चीन की इन सैन्य इकाइयों में एयर डिफेंस सिस्टम और ड्रोन से जुड़ी क्षमताएं भी शामिल हैं। ड्रोन का इस्तेमाल निगरानी, इलाके की जानकारी जुटाने और सैन्य गतिविधियों पर नजर रखने के लिए किया जा सकता है। वहीं एयर डिफेंस सिस्टम किसी संभावित हवाई खतरे से निपटने के लिए सुरक्षा कवच प्रदान करते हैं। इस तरह एक कंबाइंड आर्म्स ब्रिगेड कई अलग-अलग सैन्य क्षमताओं को एक साथ लेकर चलती है। करीब डेढ़ लाख सैनिकों का आंकड़ा एक अनुमान के तौर पर देखा जाना चाहिए। यह जरूरी नहीं कि सभी सैनिक सीधे LAC की अग्रिम चौकियों पर तैनात हों। रिपोर्ट में जिन ब्रिगेड का उल्लेख है, उनमें कुछ ऐसी जगहों पर भी हो सकती हैं जो सीमा के नजदीक प्रशिक्षण और सैन्य तैयारियों के लिए इस्तेमाल होती हैं। इसलिए वास्तविक अग्रिम तैनाती और कुल सैन्य मौजूदगी में अंतर हो सकता है। LAC पर चीन की सैन्य मौजूदगी के बीच भारतीय सेना भी सीमा के अलग-अलग सेक्टर में अपनी तैयारियों को मजबूत बनाए हुए है। पूर्वी लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक संवेदनशील क्षेत्रों में दोनों देशों की सेनाएं लगातार अपनी निगरानी और ऑपरेशनल तैयारियों पर ध्यान दे रही हैं। ऐसे में सीमा पर सैनिकों की संख्या के साथ-साथ सैन्य ढांचे, हथियारों और तकनीकी क्षमताओं की मौजूदगी भी रणनीतिक तौर पर काफी मायने रखती है।
गलवान घाटी की झड़प
गलवान घाटी में हुई झड़प के बाद पूर्वी लद्दाख में भारत और चीन के बीच सैन्य तनाव काफी बढ़ गया था। उस दौरान चीन ने बड़ी संख्या में अपने सैनिकों को LAC के आसपास तैनात किया था। रिपोर्टों के अनुसार, अकेले पूर्वी लद्दाख सेक्टर में चीनी सेना की संख्या करीब एक लाख तक पहुंच गई थी। इसके बाद से दोनों देशों के बीच सैन्य स्तर पर कई दौर की बातचीत हुई और चीन ने अपनी तैनाती में कुछ कमी भी की है। पिछले करीब छह वर्षों में 3,488 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के अलग-अलग हिस्सों में चीन की सैन्य मौजूदगी में कमी आने की बात सामने आई है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि सीमा के आसपास चीन की सैन्य क्षमता पूरी तरह पीछे हट गई है। भारतीय सीमा के नजदीक मौजूद कई ट्रेनिंग एरिया अभी भी PLA के सैनिकों और सैन्य इकाइयों के लिए महत्वपूर्ण बने हुए हैं। LAC से सटे प्रशिक्षण क्षेत्रों में बड़ी संख्या में चीनी सैनिक मौजूद हैं। अनुमान के अनुसार इन इलाकों में करीब डेढ़ लाख सैनिकों की मौजूदगी हो सकती है। ये सैनिक सीधे अग्रिम सीमा चौकियों पर तैनात नहीं होते, लेकिन सीमा से उनकी दूरी कम होने के कारण जरूरत पड़ने पर उन्हें तेजी से संवेदनशील इलाकों की ओर भेजा जा सकता है। सीमा के नजदीक इस तरह की सैन्य मौजूदगी भारतीय सेना के लिए एक अहम रणनीतिक चुनौती मानी जाती है। ट्रेनिंग एरिया में मौजूद सैनिक सामान्य परिस्थितियों में अभ्यास कर सकते हैं, लेकिन किसी तनाव की स्थिति में उन्हें कम समय में LAC की ओर मूव किया जा सकता है। इसी वजह से केवल अग्रिम मोर्चे से सैनिकों की संख्या कम करना ही पर्याप्त नहीं माना जा रहा है। भारत की ओर से इसी संदर्भ में डि-इंडक्शन पर जोर दिया जा रहा है। इसका मतलब है कि सीमा से सैनिकों को हटाकर उन्हें पीछे स्थित स्थायी सैन्य ठिकानों और बैरकों में वापस भेजा जाए। इससे सीमा के आसपास तत्काल बड़े पैमाने पर सैनिकों की मौजूदगी कम होगी और दोनों देशों के बीच तनाव घटाने की प्रक्रिया को ज्यादा प्रभावी माना जा सकेगा। LAC पर वास्तविक और स्थायी सामान्य स्थिति तभी बन सकती है, जब सैनिकों को केवल अग्रिम इलाकों से हटाने के बजाय पर्याप्त दूरी पर स्थित उनके नियमित ठिकानों पर वापस भेजा जाए। इसके साथ ही सैन्य बुनियादी ढांचे और सीमा पर तैनाती से जुड़े मुद्दों पर भी लगातार बातचीत जरूरी होगी। यही कारण है कि भारत सीमा पर शांति और स्थिरता के लिए डिसएंगेजमेंट के बाद डि-एस्केलेशन और डि-इंडक्शन को भी अहम कदम मान रहा है।
शी जिनपिंग से पीएम मोदी की मुलाकात
BRICS शिखर सम्मेलन से इतर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुई द्विपक्षीय मुलाकात को दोनों देशों के रिश्तों के लिहाज से अहम माना गया। बातचीत के दौरान इस बात पर सहमति बनी कि भारत और चीन के बीच मौजूद मतभेदों को किसी भी स्थिति में विवाद का रूप नहीं लेने देना चाहिए। दोनों पक्षों ने रिश्तों को आगे बढ़ाने के लिए आपसी समझ और संवाद को जरूरी बताया। बैठक में दोनों देशों के संबंधों को तीन प्रमुख सिद्धांतों से जोड़कर आगे बढ़ाने की बात सामने आई। इनमें एक-दूसरे के प्रति सम्मान, संवेदनशीलता और पारस्परिक हित शामिल हैं। इसका सीधा संकेत यह है कि आर्थिक और कूटनीतिक रिश्तों को मजबूत करने के साथ-साथ सीमा से जुड़े मुद्दों पर भी दोनों देशों के बीच संतुलित तरीके से आगे बढ़ने की कोशिश की जा रही है। प्रधानमंत्री मोदी और शी जिनपिंग की बातचीत ऐसे समय हुई, जब LAC पर लंबे समय से चले आ रहे तनाव को कम करने के लिए सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर प्रयास जारी हैं। भारत लगातार यह स्पष्ट करता रहा है कि सीमा पर शांति और स्थिरता का सीधा असर दोनों देशों के व्यापक संबंधों पर पड़ता है। ऐसे में सीमा पर स्थिति में सुधार को द्विपक्षीय रिश्तों को सामान्य बनाने की अहम शर्त माना जा रहा है। इस बीच चीन की सैन्य व्यवस्था में हुए बदलाव को लेकर भी चर्चा तेज हुई। शी जिनपिंग की भारत यात्रा से पहले चीन के सेंट्रल मिलिट्री कमीशन में वरिष्ठ पद पर मौजूद जनरल झांग योक्सिया को पद से हटाए जाने की खबर सामने आई थी। उनकी बर्खास्तगी को लेकर भ्रष्टाचार से जुड़े कारणों की चर्चा हुई, हालांकि इस घटनाक्रम को लेकर अलग-अलग दावे भी सामने आए हैं। जनरल झांग योक्सिया का नाम भारत-चीन सीमा से जुड़े पुराने घटनाक्रमों के कारण भी महत्वपूर्ण रहा है। जून 2020 में गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प के समय वह चीन के वेस्टर्न थिएटर कमांड से जुड़े शीर्ष सैन्य अधिकारियों में शामिल थे। यही कमांड भारत से लगी सीमा के बड़े हिस्से की सैन्य जिम्मेदारी संभालती है। इससे पहले 2017 के डोकलाम विवाद के दौरान भी उनका नाम चर्चा में रहा था। भारत और चीन के बीच रिश्तों में सुधार की राह हालांकि अभी पूरी तरह आसान नहीं है। व्यापार और आर्थिक सहयोग को आगे बढ़ाने के साथ सीमा पर भरोसा बहाल करना भी उतना ही जरूरी है। भारत का रुख स्पष्ट रहा है कि सामान्य द्विपक्षीय संबंधों के लिए LAC पर शांति और स्थिरता जरूरी है। ऐसे में आने वाले समय में सैन्य बातचीत, कूटनीतिक संपर्क और सीमा पर वास्तविक स्थिति में बदलाव यह तय करेंगे कि दोनों देश रिश्तों को किस हद तक सामान्य दिशा में ले जा पाते हैं।
रक्षा मंत्रालय की सालाना रिपोर्ट
रक्षा मंत्रालय की सालाना रिपोर्ट में भारत और चीन के बीच सीमा से जुड़े मुद्दों को लेकर लगातार हो रहे संवाद को अहम बताया गया है। राजनीतिक, कूटनीतिक और सैन्य स्तर पर दोनों देशों के बीच संपर्क बढ़ने का असर नॉर्दर्न बॉर्डर यानी भारत-चीन सीमा की स्थिति पर भी दिखाई दिया है। बातचीत के इन माध्यमों से तनाव को नियंत्रित करने और सीमा पर स्थिरता बनाए रखने में मदद मिली है। वर्किंग मैकेनिज्म फॉर कंसल्टेशन एंड कोऑर्डिनेशन (WMCC) का भी उल्लेख किया गया है। यह ऐसा मंच है, जिसके जरिए दोनों देश सीमा से जुड़े मुद्दों पर नियमित रूप से बातचीत करते हैं। इसके अलावा भारत-चीन सीमा मामलों पर विशेष प्रतिनिधि यानी Special Representatives (SR) के स्तर पर होने वाली वार्ता को भी महत्वपूर्ण बताया गया है। इन संवादों का उद्देश्य जटिल सीमा मुद्दों पर आपसी समझ विकसित करना और समाधान की दिशा में आगे बढ़ना है।रक्षा मंत्रालय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शंघाई सहयोग संगठन (SCO) बैठक के लिए चीन के तियानजिन दौरे का भी जिक्र किया है। इस यात्रा को दोनों देशों के बीच उच्च स्तर के संपर्क के तौर पर देखा गया। ऐसे दौरों और बैठकों से राजनीतिक नेतृत्व को सीधे बातचीत का अवसर मिलता है, जिसका असर सीमा पर मौजूद तनाव को कम करने की कोशिशों पर भी पड़ सकता है। सीमा पर सैन्य स्तर की बातचीत भी लगातार जारी रहने की बात रिपोर्ट में कही गई है। भारत और चीन के बीच कोर कमांडर स्तर पर कई दौर की बातचीत हो चुकी है। इन बैठकों में LAC के अलग-अलग सेक्टर में मौजूद संवेदनशील और विवादित मुद्दों पर चर्चा की जाती है। सैन्य अधिकारियों के बीच सीधे संवाद का मकसद किसी भी स्थिति को बड़ा विवाद बनने से पहले बातचीत के जरिए नियंत्रित करना है। इसके साथ ही बॉर्डर पर्सनल मीटिंग यानी BPM के जरिए भी दोनों देशों की सेनाओं के अधिकारी संपर्क में रहते हैं। ऐसे संवाद सीमा पर किसी गलतफहमी को दूर करने और स्थानीय स्तर पर उत्पन्न परिस्थितियों को संभालने में मददगार माने जाते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, LAC के विभिन्न सेक्टर में लंबित मुद्दों को सौहार्दपूर्ण और दोस्ताना माहौल में सुलझाने की कोशिश की जा रही है। रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट यह संकेत देती है कि भारत-चीन सीमा पर स्थिरता बनाए रखने के लिए सिर्फ सैन्य तैनाती ही नहीं, बल्कि राजनीतिक और कूटनीतिक बातचीत को भी बराबर महत्व दिया जा रहा है। हालांकि सीमा से जुड़े सभी मुद्दों का स्थायी समाधान अभी बाकी है, लेकिन लगातार संवाद, सैन्य बैठकों और उच्चस्तरीय संपर्क से दोनों देशों के बीच तनाव को नियंत्रित रखने की कोशिश जारी है।
भारत और चीन के बीच LAC पर तनाव कम करने की कोशिशों के बावजूद सभी इलाकों में स्थिति अभी पूरी तरह सामान्य नहीं हुई है। रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट में अरुणाचल प्रदेश के अपर सुबानसिरी क्षेत्र का भी जिक्र किया गया है, जहां दोनों देशों के सैनिकों के बीच गतिरोध की स्थिति बनी हुई है। इस मामले को लेकर सैन्य अधिकारियों के बीच बातचीत हुई है, लेकिन सीमा से जुड़े सभी मतभेदों का स्थायी समाधान अभी बाकी है। अपर सुबानसिरी में जारी स्थिति यह बताती है कि सीमा पर शांति की प्रक्रिया अभी अधूरी है। दोनों देशों के बीच कोर कमांडर स्तर की बैठकों के जरिए विवादित मुद्दों पर चर्चा की जा रही है। इन बैठकों का उद्देश्य मौजूदा तनाव को नियंत्रित करना और किसी भी स्थिति को आगे बढ़ने से रोकना है। हालांकि, बातचीत के बावजूद हर मुद्दे पर अंतिम सहमति बनना अभी बाकी है। दूसरी ओर, भारतीय सेना ने LAC पर अपनी तैयारियों में कोई कमी नहीं की है। रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, पूर्वी लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक भारतीय सेना की तैनाती मजबूत बनी हुई है। संवेदनशील इलाकों में जवानों को किसी भी संभावित परिस्थिति से निपटने के लिए तैयार रखा गया है। इससे साफ है कि चीन की तैनाती में कमी की खबरों के बावजूद भारत अपनी सीमा सुरक्षा को लेकर सतर्क है। सीमा की स्थिति को दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच हुई बातचीत से भी जोड़कर देखा जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हुई मुलाकात में दोनों पक्षों ने इस बात पर जोर दिया था कि आपसी मतभेदों को विवाद का रूप नहीं लेने दिया जाना चाहिए। साथ ही, रिश्तों को आगे बढ़ाने के लिए एक-दूसरे के सम्मान, संवेदनशीलता और आपसी हितों को ध्यान में रखने की बात कही गई थी। कूटनीतिक और सैन्य स्तर पर लगातार हो रहे संपर्क को सकारात्मक बताया गया है। WMCC, विशेष प्रतिनिधि स्तर की बातचीत, कोर कमांडर बैठकों और बॉर्डर पर्सनल मीटिंग जैसे माध्यमों से दोनों देश LAC से जुड़े मुद्दों पर संवाद बनाए हुए हैं। इन तंत्रों के जरिए सीमा पर पैदा होने वाली परिस्थितियों को बातचीत के माध्यम से संभालने की कोशिश की जा रही है। LAC पर चीनी सैनिकों की संख्या में कमी निश्चित तौर पर तनाव घटने का संकेत मानी जा सकती है, लेकिन इसे पूरी तरह सामान्य स्थिति की वापसी कहना जल्दबाजी होगी। भारत की प्राथमिकता अभी भी डि-इंडक्शन यानी सैनिकों को सीमा से पीछे उनके नियमित ठिकानों पर भेजने और सीमा पर पहले जैसी स्थिति बहाल करने की है। आने वाले समय में सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर होने वाली बातचीत ही तय करेगी कि मौजूदा स्थिरता को स्थायी शांति में किस तरह बदला जा सकता है।









