पहली बार मंगलुरु में हुई कैबिनेट बैठक
कर्नाटक की कैबिनेट बैठक को बेंगलुरु से बाहर मंगलुरु में आयोजित किया जाना अपने आप में खास रहा। राज्य में आमतौर पर मंत्रिमंडल की अहम बैठकें राजधानी बेंगलुरु में होती हैं, ऐसे में मंगलुरु को बैठक के लिए चुने जाने से तटीय कर्नाटक पर सरकार का फोकस दिखाई दिया। दक्षिण कन्नड़ और उडुपी जिले राज्य की राजनीति में काफी महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इन इलाकों में भारतीय जनता पार्टी का लंबे समय से मजबूत जनाधार रहा है। यही वजह है कि मंगलुरु में कैबिनेट बैठक आयोजित किए जाने को प्रशासनिक फैसले के साथ-साथ राजनीतिक नजरिए से भी देखा जा रहा है। 2023 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव के आंकड़ों पर नजर डालें तो दक्षिण कन्नड़ और उडुपी की कुल 13 विधानसभा सीटों में बीजेपी ने 11 सीटों पर जीत दर्ज की थी। उडुपी जिले की पांचों सीटें बीजेपी के खाते में गई थीं, जबकि दक्षिण कन्नड़ की आठ सीटों में से छह पर पार्टी ने जीत हासिल की थी। इन दोनों जिलों में कांग्रेस को विधानसभा चुनाव के दौरान सिर्फ दो सीटों पर सफलता मिली थी। वहीं, पूरे कर्नाटक की तस्वीर इससे काफी अलग थी। कांग्रेस ने राज्य में 135 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी, जबकि बीजेपी को 66 सीटों पर जीत मिली थी। इससे साफ है कि तटीय क्षेत्र का चुनावी रुझान राज्य के व्यापक नतीजों से अलग रहा। ऐसे राजनीतिक समीकरणों के बीच मंगलुरु में कैबिनेट बैठक आयोजित करना और इसी दौरान तुलु भाषा को अतिरिक्त प्रशासनिक भाषा के रूप में मान्यता देने की घोषणा करना चर्चा का विषय बन गया है। इससे सरकार की तटीय कर्नाटक और वहां की क्षेत्रीय पहचान से जुड़े मुद्दों पर बढ़ती सक्रियता सामने आई है।

बीजेपी का गढ़ है मंगलुरु
2024 के लोकसभा चुनाव में भी तटीय कर्नाटक के दोनों प्रमुख संसदीय क्षेत्रों में बीजेपी को जीत मिली थी। दक्षिण कन्नड़ सीट पर बीजेपी उम्मीदवार बृजेश चौटा ने कांग्रेस के पद्मराज आर को 64 हजार से अधिक मतों के अंतर से हराया था। वहीं, उडुपी-चिकमगलूर लोकसभा सीट पर बीजेपी के कोटा श्रीनिवास पुजारी ने कांग्रेस उम्मीदवार को 2.5 लाख से ज्यादा वोटों के अंतर से मात दी थी। विधानसभा और लोकसभा चुनावों के इन नतीजों की वजह से दक्षिण कन्नड़ और उडुपी को कर्नाटक की राजनीति में बीजेपी के मजबूत क्षेत्रों में गिना जाता है। ऐसे में मंगलुरु में कैबिनेट बैठक आयोजित करने और तुलु भाषा को अतिरिक्त प्रशासनिक मान्यता देने के फैसले को लेकर राजनीतिक चर्चाएं भी शुरू हो गई हैं। तुलु भाषा को लेकर सरकार की घोषणा पर बीजेपी की ओर से प्रतिक्रिया भी सामने आई। पार्टी के एक नेता ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार तटीय कर्नाटक में बीजेपी के प्रभाव को देखते हुए सॉफ्ट हिंदुत्व की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। यह बीजेपी नेता का राजनीतिक आकलन है। सरकार की ओर से इस फैसले का मुख्य आधार क्षेत्र में तुलु भाषा को प्रशासनिक पहचान देना बताया गया है। बीजेपी नेता ने अपने दावे के समर्थन में शिवकुमार के धार्मिक कार्यक्रमों में शामिल होने और हिंदू परंपराओं से जुड़े उनके सार्वजनिक बयानों का उल्लेख किया। उन्होंने अगस्त 2025 में कर्नाटक विधानसभा में आरएसएस से जुड़े गीत की कुछ पंक्तियां गाए जाने की घटना का भी संदर्भ दिया। इस घटना को लेकर बीजेपी नेता ने शिवकुमार की राजनीतिक रणनीति पर अपनी राय रखी। पूरे घटनाक्रम को देखें तो मंगलुरु में कैबिनेट बैठक और तुलु भाषा को अतिरिक्त प्रशासनिक दर्जा देने का फैसला कई स्तरों पर चर्चा में है। एक तरफ यह तटीय कर्नाटक की क्षेत्रीय भाषा और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा कदम है, वहीं दूसरी ओर दक्षिण कन्नड़ और उडुपी के चुनावी समीकरणों के कारण इसके राजनीतिक पहलू पर भी चर्चा हो रही है। आने वाले समय में सरकार के इस फैसले का प्रशासनिक और राजनीतिक असर किस तरह सामने आता है, इस पर भी नजर रहेगी।









