25 राज्यों ने अदालत में दी चुनौती
अमेरिका में नई टैरिफ नीति को लेकर कानूनी लड़ाई तेज हो गई है। न्यूयॉर्क स्थित यूएस कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड में दायर याचिका के माध्यम से हाल ही में लागू किए गए आयात शुल्क को चुनौती दी गई है। इस मामले ने अमेरिका की व्यापार नीति और उसके वैश्विक प्रभाव को लेकर नई बहस छेड़ दी है। याचिका में उन आयात शुल्कों पर सवाल उठाए गए हैं, जिन्हें पिछले महीने लागू किया गया था। इन शुल्कों के तहत कई देशों से आने वाले उत्पादों पर 10 से 12.5 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाया गया है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इतने व्यापक स्तर पर आयात शुल्क लगाने के फैसले की कानूनी वैधता की समीक्षा आवश्यक है। ट्रंप प्रशासन का पक्ष है कि ये टैरिफ ट्रेड एक्ट 1974 की धारा 301 के तहत लगाए गए हैं। प्रशासन का दावा है कि जिन देशों पर यह शुल्क लगाया गया है, उन्होंने जबरन श्रम से जुड़े उत्पादों के निर्यात को रोकने के लिए पर्याप्त और प्रभावी कदम नहीं उठाए हैं। इसी आधार पर आयात शुल्क लागू करने का निर्णय लिया गया। दूसरी ओर, याचिका दायर करने वाले पक्ष का मानना है कि इस प्रावधान का उपयोग सीमित और विशेष परिस्थितियों के लिए किया जाना चाहिए। उनका तर्क है कि इतने बड़े पैमाने पर कई देशों पर एक साथ टैरिफ लागू करना कानून की मूल भावना से मेल नहीं खाता और इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। अब इस मामले की सुनवाई पर अंतरराष्ट्रीय व्यापार जगत की नजरें टिकी हुई हैं। अदालत का फैसला न केवल अमेरिकी व्यापार नीति की दिशा तय कर सकता है, बल्कि वैश्विक व्यापारिक संबंधों और आयात-निर्यात से जुड़े भविष्य के निर्णयों पर भी महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है।

अदालत के फैसलों की अनदेखी का आरोप
अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की नई टैरिफ नीति एक बार फिर कानूनी जांच के दायरे में आ गई है। इस मामले को उनकी व्यापारिक नीतियों की एक महत्वपूर्ण कानूनी परीक्षा माना जा रहा है। इससे पहले भी ट्रंप प्रशासन द्वारा लागू किए गए कई आयात शुल्कों को अमेरिकी अदालतों में चुनौती दी जा चुकी है और कुछ मामलों में न्यायालय ने उन पर आपत्ति भी जताई थी। इस बार ओरेगन, न्यूयॉर्क सहित 25 राज्यों ने संयुक्त रूप से अदालत का रुख किया है। इन राज्यों का कहना है कि जिन व्यापक आयात शुल्कों को पहले न्यायालय कानूनी मानकों के अनुरूप नहीं मान चुका है, उन्हें अब नए कानूनी आधार का सहारा लेकर दोबारा लागू करने का प्रयास किया जा रहा है। राज्यों ने इस कदम की न्यायिक समीक्षा की मांग की है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि ट्रेड एक्ट 1974 की धारा 301 का उद्देश्य सीमित परिस्थितियों में कार्रवाई करना था। इस प्रावधान का इस्तेमाल उन देशों या उद्योगों के खिलाफ किया जाता रहा है, जिन पर अनुचित व्यापारिक व्यवहार या नियमों के उल्लंघन के आरोप लगे हों। उनका कहना है कि इस कानून का उपयोग एक साथ बड़ी संख्या में देशों पर व्यापक टैरिफ लगाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। राज्यों ने अदालत में यह भी दलील दी है कि जबरन श्रम का मुद्दा उठाकर पहले समाप्त किए जा चुके टैरिफ को दोबारा लागू करने की कोशिश की जा रही है। उनके अनुसार, यदि इस प्रकार के कदमों को मंजूरी मिलती है तो भविष्य में व्यापारिक कानूनों की व्याख्या और उनके उपयोग का दायरा काफी बदल सकता है, जिसका असर अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी पड़ेगा। अब इस मामले में अदालत की सुनवाई और उसके फैसले पर अमेरिका के साथ-साथ वैश्विक व्यापार जगत की भी नजरें टिकी हुई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय भविष्य में अमेरिकी व्यापार नीति, आयात शुल्क लागू करने की प्रक्रिया और अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक संबंधों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल साबित हो सकता है।
भारत समेत 60 देशों पर लागू हुआ नया टैरिफ
विवादित टैरिफ की घोषणा 24 जुलाई को की गई थी। यह शुल्क भारत, यूरोपीय संघ समेत 60 व्यापारिक साझेदार देशों से आयात होने वाले उत्पादों पर लागू किया गया है। हालांकि, कुछ देशों ने जबरन श्रम रोकने के लिए अपने कानून और कार्रवाई मजबूत की, जिसके बाद उन्हें कम टैरिफ दर दी गई। एक वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी के अनुसार, भारत पर लगाया गया टैरिफ 12.5 प्रतिशत से घटाकर 10 प्रतिशत कर दिया गया। इस वर्ष अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था कि इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) राष्ट्रपति को पूरी दुनिया पर व्यापक टैरिफ लगाने का अधिकार नहीं देता। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ट्रंप प्रशासन ने ट्रेड एक्ट 1974 की धारा 122 के तहत अस्थायी वैश्विक टैरिफ लागू किए थे। बाद में यूएस कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड ने इन्हें भी गैरकानूनी करार दिया। मुकदमा दायर करने वाले राज्यों का आरोप है कि पहले जिन टैरिफ को अदालतों ने असंगत या अवैध ठहराया था, उन्हें अब नए कानूनी आधार पर फिर से लागू करने की कोशिश की जा रही है। याचिका में यह भी कहा गया है कि जबरन श्रम से जुड़े मुद्दों का हवाला देकर व्यापक आयात शुल्क लगाना उचित नहीं है और इस विषय का उपयोग पुराने टैरिफ को दोबारा लागू करने के लिए किया जा रहा है। नई टैरिफ नीति का असर भारत, यूरोपीय संघ और अन्य प्रमुख व्यापारिक साझेदार देशों पर भी पड़ सकता है। हालांकि, अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार कुछ देशों द्वारा श्रम संबंधी नियमों को मजबूत करने के बाद उनके लिए टैरिफ दरों में राहत दी गई है। भारत पर प्रस्तावित उच्च शुल्क में भी संशोधन किए जाने की जानकारी सामने आई है, जिससे दोनों देशों के व्यापारिक संबंधों पर संभावित प्रभाव को लेकर चर्चा तेज हो गई है। अब इस मामले में अदालत का फैसला महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यदि अदालत राज्यों के पक्ष में निर्णय देती है तो ट्रंप प्रशासन की टैरिफ नीति पर बड़ा असर पड़ सकता है। वहीं, वैश्विक व्यापार जगत भी इस मामले पर नजर बनाए हुए है, क्योंकि इसका प्रभाव अंतरराष्ट्रीय व्यापार, आयात-निर्यात और कई देशों के आर्थिक संबंधों पर पड़ने की संभावना है।