America ने रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों को लेकर अपने रुख में बड़ा बदलाव करने का संकेत दिया है। अमेरिकी सीनेट में पेश किए गए संशोधित विधेयक में पहले प्रस्तावित 500% टैरिफ को घटाकर अधिकतम 100% करने का प्रस्ताव रखा गया है। इस कदम को वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यदि यह विधेयक पारित होता है, तो रूस से ऊर्जा आयात करने वाले कई देशों को राहत मिल सकती है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका लगातार रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की रणनीति अपनाता रहा है। इसी नीति के तहत पहले ऐसा प्रस्ताव तैयार किया गया था, जिसमें रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों से आयात होने वाले उत्पादों पर 500% तक का भारी टैरिफ लगाने की बात कही गई थी। इस प्रस्ताव ने वैश्विक व्यापार जगत में चिंता पैदा कर दी थी, क्योंकि कई प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं अब भी रूस से ऊर्जा आयात कर रही हैं। अब अमेरिकी सीनेट में रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक सांसदों द्वारा पेश किए गए संशोधित बिल में इस टैरिफ को काफी कम करते हुए अधिकतम 100% तक सीमित करने का सुझाव दिया गया है। इसके साथ ही प्रस्ताव में यह प्रावधान भी शामिल है कि अमेरिकी राष्ट्रपति राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखते हुए जरूरत पड़ने पर इन प्रतिबंधों में छूट दे सकेंगे। इससे प्रशासन को परिस्थितियों के अनुसार फैसला लेने की अतिरिक्त शक्ति मिलेगी। इस बदलाव का सबसे अधिक असर भारत और चीन जैसे देशों पर पड़ सकता है, जो रूस से कच्चे तेल के बड़े खरीदारों में शामिल हैं। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने रियायती कीमतों पर रूसी तेल का आयात बढ़ाया है, जिससे घरेलू ईंधन आपूर्ति और ऊर्जा सुरक्षा को मजबूती मिली है। ऐसे में 500% टैरिफ की तुलना में 100% का प्रस्ताव इन देशों के लिए अपेक्षाकृत राहत भरा माना जा रहा है। यह संशोधित विधेयक अभी अमेरिकी कांग्रेस की विधायी प्रक्रिया से गुजरना बाकी है और अंतिम निर्णय आने के बाद ही इसकी वास्तविक तस्वीर साफ होगी। वैश्विक बाजार, ऊर्जा कंपनियां और रूस से तेल खरीदने वाले देश इस पूरे घटनाक्रम पर करीबी नजर बनाए हुए हैं, क्योंकि अमेरिका का यह फैसला अंतरराष्ट्रीय व्यापार, तेल की कीमतों और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है।

रूसी तेल के टॉप-5 खरीदारों पर लागू
अमेरिकी सीनेट में रूस से कच्चा तेल और गैस खरीदने वाले देशों को लेकर पेश किए गए संशोधित विधेयक ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई चर्चा शुरू कर दी है। इस प्रस्ताव का दायरा केवल भारत और चीन तक सीमित नहीं है, बल्कि उन पांच प्रमुख देशों पर भी लागू होगा जो रूस से सबसे अधिक कच्चे तेल का आयात करते हैं। अमेरिका का उद्देश्य रूस पर आर्थिक दबाव बनाए रखना है, लेकिन साथ ही वैश्विक व्यापारिक परिस्थितियों को भी संतुलित रखने की कोशिश की जा रही है। यह विधेयक मूल रूप से रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक सांसदों की साझा पहल के रूप में तैयार किया गया था। दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों का समर्थन मिलने से इसे द्विदलीय सहमति वाला प्रस्ताव माना जा रहा है। अमेरिकी संसद में किसी बड़े विदेशी नीति से जुड़े विधेयक को दोनों दलों का समर्थन मिलना इसकी राजनीतिक अहमियत को भी दर्शाता है। संशोधित प्रस्ताव में कई ऐसे बदलाव किए गए हैं जिनका उद्देश्य पहले की तुलना में अधिक व्यावहारिक व्यवस्था तैयार करना है। इसी कारण राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार विधेयक को कांग्रेस में पहले से अधिक समर्थन मिल सकता है। वर्तमान में इसके 26 सह-प्रायोजक हैं और आने वाले दिनों में अन्य सांसदों के भी इसमें शामिल होने की संभावना जताई जा रही है। यदि कांग्रेस में इस विधेयक को व्यापक समर्थन मिलता है, तो इसके पारित होने की संभावना काफी मजबूत हो जाएगी। हालांकि अंतिम फैसला अमेरिकी संसद की दोनों सदनों की प्रक्रिया और राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद ही प्रभावी होगा। इसलिए फिलहाल दुनिया की नजरें अमेरिकी विधायी प्रक्रिया पर टिकी हुई हैं। भारत, चीन और अन्य बड़े ऊर्जा आयातक देश भी इस घटनाक्रम पर करीबी नजर रखे हुए हैं। यदि यह संशोधित विधेयक मौजूदा स्वरूप में पारित होता है, तो वैश्विक ऊर्जा व्यापार, तेल आयात की लागत और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संबंधों पर इसका व्यापक प्रभाव देखने को मिल सकता है। आने वाले समय में अमेरिकी कांग्रेस की आगे की कार्रवाई इस पूरे मामले की दिशा तय करेगी।
पहले रूसी खरीदारों को दी थी ये धमकी
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीतियों के कारण दुनिया में निरंतर हलचल बनी हुई है. 2026 की शुरुआत में डोनाल्ड ट्रंप ने रूस से तेल खरीद पर एक प्रस्ताव को स्वीकार किया, जिसमें 500% तक टैरिफ लगाने का प्रावधान था। इसका नाम ‘रशिया सैंक्शंस एक्ट 2025’ रखा गया था और इस कानून के अनुसार भारत और चीन जैसे रूस के तेल के प्रमुख खरीदार देशों से आयातित वस्तुओं पर उच्च शुल्क लगाए जाने का प्रावधान था। ट्रंप प्रशासन ने इस कदम को खासतौर पर यूक्रेन युद्ध के शांति समझौते पर चर्चा से इनकार करने वाली पुतिन सरकार पर दबाव बनाने के लिए उठाया गया बताया गया था। इससे संबंधित ‘दावोस वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF Davos 2026) में अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने दिवंगत सीनेटर लिंडसे ग्राहम द्वारा सीनेट में पेश किए गए प्रस्ताव पर कहा था कि हम देखेंगे कि क्या यह पास होता है या नहीं। अब इसमें परिवर्तन किया गया है। अमेरिका की रूस नीति से संबंधित एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है। अमेरिकी सीनेट में रूस पर प्रतिबंधों से जुड़े विधेयक में मुख्य संशोधन प्रस्तावित किया गया है। नए प्रस्ताव के तहत, रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर पहले प्रस्तावित 500% तक के टैरिफ को घटाकर अधिकतम 100% करने की बात कही गई है। इस परिवर्तन को वैश्विक व्यापार और ऊर्जा बाजार के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान अमेरिका ने लंबे समय से रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की रणनीति अपनाई है। इसी क्रम में पहले एक प्रस्ताव उपस्थित हुआ था, जिसमें रूसी ऊर्जा उत्पाद खरीदने वाले देशों के सामानों पर 500% तक भारी आयात शुल्क लगाने का सुझाव दिया गया था।
इस बदलाव का सबसे गहरा प्रभाव भारत और चीन जैसे देशों पर पड़ सकता है, जो रूस से कच्चे तेल के प्रमुख खरीदार हैं। पिछले कुछ वर्षों में, रूस से रियायती दरों पर तेल खरीदकर इन देशों ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा किया है। ऐसे में 500% टैरिफ का प्रस्ताव लागू होने पर व्यापारिक लागत बहुत बढ़ सकती थी। टैरिफ को 500% से घटाकर 100% करने का प्रस्ताव अंतरराष्ट्रीय बाजार में स्थिरता बनाए रखने के लिए एक व्यावहारिक कदम माना जा सकता है। इससे ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव कम होगा और तेल आयात करने वाले देशों की व्यापारिक अनिश्चितता भी घट सकती है। संशोधित विधेयक को दोनों प्रमुख अमेरिकी राजनीतिक दलों का समर्थन मिला है। वर्तमान में इस प्रस्ताव के कई सह-प्रायोजक हैं और कांग्रेस में आगे बढ़ने पर इसे और अधिक समर्थन मिलने के संकेत हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संशोधित विधेयक के पास होने की संभावना पहले से अधिक हो सकती है। पहले प्रस्तावित विधेयक को रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की रणनीति का हिस्सा माना गया था। इसका उद्देश्य उन देशों पर भी अप्रत्यक्ष दबाव बनाना था, जो रूस से ऊर्जा खरीद जारी रखे हैं। हालांकि, इतने अधिक टैरिफ के लिए वैश्विक व्यापार जगत और कई विशेषज्ञों ने व्यवहारिक चुनौतियों का उल्लेख किया था। यदि संशोधित प्रस्ताव आगे बढ़ा, तो भारत जैसे देशों के लिए तत्काल राहत मिल सकती है। भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए विभिन्न देशों से तेल आयात करता है और रूस भी उनमें से एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता है। इस प्रकार, किसी भी बड़े टैरिफ का असर आयात लागत और घरेलू बाजार पर पड़ सकता था। यह संशोधित विधेयक अमेरिकी विधायी प्रक्रिया का हिस्सा है।