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Germany मिसाइल डील पर अमेरिका का यू-टर्न

अमेरिका और जर्मनी के बीच प्रस्तावित लंबी दूरी की मिसाइलों के सौदे को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है। इस रक्षा समझौते पर दोबारा विचार कर रहा है, जिससे यूरोपीय देशों में सुरक्षा संबंधी चिंताएं बढ़ गई हैं। माना जा रहा है कि इस फैसले के पीछे रूस के साथ तनावपूर्ण संबंध एक प्रमुख कारण हो सकते हैं। बताया जा रहा है कि अमेरिकी रणनीतिक विशेषज्ञों को आशंका है कि जर्मनी में उन्नत मिसाइल प्रणालियों की तैनाती को रूस सीधे सुरक्षा चुनौती के रूप में देख सकता है। ऐसी स्थिति में यूरोप में सैन्य तनाव और अधिक बढ़ने का खतरा पैदा हो सकता है। यही वजह है कि अमेरिकी प्रशासन इस मुद्दे पर सावधानीपूर्वक कदम उठाना चाहता है। यह मिसाइल समझौता पहले अमेरिका और जर्मनी के बीच रक्षा सहयोग को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा था। जर्मनी का मानना है कि बदलते सुरक्षा हालात में उसे अपनी रक्षा क्षमताओं को आधुनिक बनाने की आवश्यकता है। विशेष रूप से पूर्वी यूरोप में बढ़ती अस्थिरता ने जर्मनी की चिंताओं को और बढ़ाया है। यदि अमेरिका इस समझौते से पीछे हटता है, तो इसका असर केवल जर्मनी तक सीमित नहीं रहेगा। इससे नाटो के भीतर भी कई सवाल खड़े हो सकते हैं। कई यूरोपीय देशों को यह चिंता हो सकती है कि भविष्य में अमेरिका उनकी सुरक्षा आवश्यकताओं को किस स्तर तक प्राथमिकता देगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल हथियारों की आपूर्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक शक्ति संतुलन और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति से भी जुड़ा हुआ है। अमेरिका एक ओर अपने सहयोगियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहता है, वहीं दूसरी ओर वह रूस के साथ किसी बड़े टकराव से भी बचना चाहता है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर अमेरिका की अंतिम नीति स्पष्ट हो सकती है। फिलहाल जर्मनी और अन्य यूरोपीय देश वॉशिंगटन के अगले कदम पर नजर बनाए हुए हैं। यह फैसला न केवल यूरोपीय सुरक्षा व्यवस्था बल्कि नाटो की भविष्य की रणनीति को भी प्रभावित कर सकता है।

नाटो से अमेरिका का बढ़ता अलगाव और रणनीतिक वापसी का दौर

जर्मनी के साथ टोमाहॉक मिसाइल समझौते को निरस्त करने की यह संभावित क्रिया कोई उपरी घटना नहीं है, बल्कि यह यूरोप और नाटो गठबंधन के प्रति अमेरिकी नीति में बदलाव के एक विशाल और गहरे हिस्से का प्रतिनिधित्व करती है। हाल के समय में अमेरिका यूरोपीय सुरक्षा व्यवस्था में अपनी सीधे भागीदारी को धीरे-धीरे घटा रहा है. इसमें मिसाइल सौदों को वापस लेने के साथ-साथ जर्मनी में पहले से तैनात हजारों अमेरिकी सैनिकों की प्रस्तावित तैनाती को रद्द करना और वहां से कई महत्वपूर्ण सैन्य संसाधनों को वापस बुलाने की योजनाएँ भी शामिल हैं। दशकों से जो ठोस और अटूट सहयोग ने ट्रांस-अटलांटिक रिश्तों को मिलाकर रखा था। जिसने शीत युद्ध के बाद से पूरे यूरोपो सुरक्षा का आश्वासन दिया था, वह कूटनीतिक ढाँचा अब अमेरिकी प्राथमिकताओं के बदलने से टूटता हुआ प्रतीत हो रहा है. इस रणनीतिक परिवर्तन को हाल ही में यूरोपीय और अमेरिकी सैन्य प्रमुखों के वक्तव्यों में भी स्पष्ट रूप से देखा गया। नाटो के शीर्ष कमांडर और यूरोप में अमेरिकी सेना के प्रमुख, जनरल एलेक्सस ग्रिनकेविच ने इस सप्ताह सैन्य नेताओं की एक जोरदार बैठक में बेहद स्पष्टता से कहा कि अब यूरोप को अपनी सुरक्षा के लिए खुद पहल करनी होगी और निकट भविष्य में अपनी जिम्मेदारी स्वयं उठानी होगी। जनरल ग्रिनकेविच का यह बयान यूरोपीय देशों के लिए एक स्पष्ट चेतावनी के रूप में है कि वे अब अपनी रक्षा के लिए पूरी तरह से अमेरिकी समर्थन पर निर्भर नहीं रह सकते। उन्होंने स्पष्ट किया कि अमेरिका अब अपनी सेनाओं, आधुनिक शस्त्रों और रणनीतिक साधनों को यूरोप से हटाकर दुनिया के अन्य महत्वपूर्ण और उभरते संघर्ष क्षेत्रों (जैसे कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र) पर पुनः केंद्रित करने जा रहा है। अमेरिका का यह नया दृष्टिकोण स्पष्ट करता है कि वह अब यूरोप की सुरक्षा का पूरा दायित्व अपने ऊपर ले रहा है।

टोमाहॉक मिसाइलें और जर्मनी की सुरक्षा का बड़ा संकट

टोमाहॉक मिसाइलों का समझौता रद्द होना जर्मनी के लिए सुरक्षा के क्षेत्र में एक बड़ा अंतर पैदा करेगा. टोमाहॉक एक अत्याधुनिक और बेहद सटीक मारक प्रेसिजन मिसाइल है, जो सैकड़ों किलोमीटर दूर स्थित दुश्मन के ठिकानों को瞬्रत ही तबाह करने की क्षमता रखती है। यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद से जर्मनी और पूरे पूर्वी यूरोप में यह डर गहरा हो गया है कि यदि रूस अपनी सीमाओं का और विस्तार करने की कोशिश करता है, तो उनके पास मॉस्को को रोकने के लिए कोई स्थायी और आक्रामक पारंपरिक हथियार प्रणाली नहीं है। जर्मनी के चांसलर और सैन्य जनरलों का मानना था कि अमेरिकी टोमाहॉक मिसाइलों की तैनाती से वे रूस के खिलाफ एक मजबूत निरोधक शक्ति बना सकेंगे, जिससे रूस जर्मनी या किसी अन्य नाटो देश पर हमला करने की हिम्मत नहीं करेगा। अब यदि यह समझौता आधिकारिक रूप से रद्द होता है, तो बर्लिन के पास अपनी संप्रभुता और सुरक्षा की रक्षा के लिए बहुत कम और सीमित विकल्प शेष रहेंगे। यूरोपीय सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि जर्मनी और अन्य यूरोपीय देशों के पास वर्तमान में ऐसी कोई स्वदेशी तकनीक या मिसाइल प्रणाली नहीं है जो अमेरिकी टोमाहॉक को प्रतिस्थापित कर सके। इस तकनीक को बनाने और सेना में शामिल करने में कई साल और शायद दशक लग सकते हैं, जबकि रूस का खतरा उनके द्वार पर आज ही उपस्थित है। इस निर्णय के बाद जर्मनी में इस बारे में बहस बढ़ गई है कि क्या देश को अपनी सुरक्षा के लिए पूरी तरह स्वावलंबी होना जरूरी है। क्या अब उसे अमेरिका पर आंखें बंद करके विश्वास करना छोड़ देना चाहिए?

मॉस्को की जवाबी कार्रवाई का डर और वॉशिंगटन की नई कूटनीति

पेंटागन में इस मिसाइल सौदे के बारे में जो सबसे महत्वपूर्ण तर्क है, वह रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की संभावित प्रतिक्रिया से जुड़ा डर है। अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि रूस मध्य यूरोप में अमेरिकी मिसाइलों की तैनाती को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक सीधे और तुरंत आने वाले खतरे के रूप में देखेगा। रूस कई बार यह बता चुका है कि अगर नाटो देश उसकी सीमाओं के नजदीक अपनी आक्रामक शक्ति बढ़ाते हैं, तो उसे अपनी परमाणु और पारंपरिक मिसाइलों को यूरोप के बड़े शहरों की ओर लगाने के लिए बाध्य होना पड़ेगा। ट्रंप प्रशासन के दौरान वॉशिंगटन की नई नीति वर्तमान में रूस के साथ किसी भी प्रकार के सीधे सैन्य संघर्ष से बचने और वैश्विक स्तर पर अमेरिकी सैन्य सहभागिता को सीमित करने पर ध्यान केंद्रित कर रही है। इस नीति के पक्षधर मानते हैं कि अमेरिका को उन समझौतों से अलग हो जाना चाहिए जो उसे किसी तीसरे देश की वजह से युद्ध की स्थिति में ला सकते हैं। लेकिन इस कूटनीति के कारण नाटो के अंदर अमेरिका की विश्वसनीयता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न उभर आया है। अगर अमेरिका अपने सबसे बड़े और आर्थिक रूप से सफल सहयोगी जर्मनी से किए गए आश्वासनों को रूस के खतरे या नई प्राथमिकताओं की वजह से तोड़ सकता है, तो पोलैंड, लातविया, लिथुआनिया और एस्टोनिया जैसे छोटे और अधिक संवेदनशील देशों की सुरक्षा का क्या हाल होगा, जो कि सीधे रूसी सीमा के निकट हैं? कूटनीतिक círcल में यह बात प्रचलित हो गई है कि अमेरिका कइस निर्णय से नाटो की सामूहिक सुरक्षा की आत्मा- एक पर हमला, सभी पर हमला कमजोर हो जाएगी। रूस को यूरोपीय मामलों में एक अधिक उग्र दृष्टिकोण अपनाने का अवसर मिलेगा.

यूरोप के लिए एक नए और आत्मनिर्भर युग की शुरुआत

पेंटागन की इस संभावित रणनीति ने यूरोप को एक अत्यंत चुनौतीपूर्ण मोड़ पर पहुँचाया है। पिछले कई दशकों से यूरोप ने अपनी आर्थिक विकास पर ध्यान केंद्रित किया और अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी अमेरिका के नेतृत्व वाले नाटो पर छोड़ दी. लेकिन अब, जब अमेरिका स्वयं अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं में बदलाव कर रहा है और रूस के खतरे के चलते मिसाइल समझौतों को रद्द करने के कगार पर है, तब यूरोप के पास जागने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचा है. जर्मनीो अपनरक्षा बजट में काफी वृद्धि के साथ-साथ फ्रांस और अन्य यूरोपीय देशों के सहयोग से एक स्वतंत्र और मजबूत यूरोपीय रक्षा संरचना विकसित करनी होगी। यह घटना स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि भविष्य में वैश्विक राजनीति और सैन्य सहयोग के समीकरणों में पूरी तरह से बदलाव आने वाला है। अमेरिका अब दुनिया का एकमात्र वैश्विक पुलिसकर्मी बनने की भूमिका से हट रहा है। वह अपने साथियों को यह सूचना दे रहा है कि उन्हें अपनी लड़ाई स्वयं ही लड़नी पड़ेगी. जर्मनी के लिए टोमाहॉक मिसाइल सौदा रद्द होना केवल एक हथियार व्यापार का विफल होना नहीं है, बल्कि यह इस बात की आधिकारिक पुष्टि है कि ट्रांस-अटलांटिक सुरक्षा के पुराने और मजबूत लिंक अब हमेशा के लिए कमजोर हो गए हैं। यूरोप को अपनी सुरक्षा की कहानी अब स्वयं ही लिखनी पड़ेगी।

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