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अल्बर्टा अलगाव विवाद: अमेरिका-कनाडा रिश्तों में नई खटास

कनाडा और अमेरिका के रिश्तों में एक नया विवाद शुरू हो गया है। एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अमेरिका के अधिकारियों ने कनाडा के अल्बर्टा प्रांत को अलग देश बनाने की मांग कर रहे अलगाववादी समूह के नेताओं से मुलाकात की।

एक रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले साल अप्रैल से अब तक अमेरिकी विदेश विभाग के अधिकारी तीन बार अल्बर्टा के अलगाववादी नेताओं से मिले। ये नेता अल्बर्टा को कनाडा से अलग कर एक स्वतंत्र देश बनाने की वकालत कर रहे हैं।

कनाडाई प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने गुरुवार को बताया कि उन्होंने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को फोन कर कनाडा की संप्रभुता का सम्मान करने को कहा। कार्नी ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि अमेरिकी प्रशासन कनाडा के आंतरिक मामलों में दखल नहीं देगा।
कनाडा से आजादी की मांग कर रहे इस समूह का नाम अल्बर्टा प्रॉस्पेरिटी प्रोजेक्ट (APP) है। यह संगठन अल्बर्टा की आजादी के लिए जनमत संग्रह (Referendum) कराने की मांग कर रहा है।

APP के नेता और को-फाउंडर जेफ्री रथ ने अल्बर्टा की आजादी के लिए अमेरिका से 500 मिलियन डॉलर की मदद मांगी है। उन्होंने 23 जनवरी को X पर पोस्ट कर बताया कि वे अगले महीने अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के अधिकारियों से मुलाकात करेंगे।

इस दौरान अमेरिका से इस रकम को कर्ज के तौर पर मांगा जाएगा। जेफ्री ने बताया कि अल्बर्टा के आजाद होने पर इस पैसे का इस्तेमाल किया जाएगा।
अल्बर्टा पश्चिमी कनाडा का तेल-समृद्ध प्रांत है। इसकी आबादी करीब 50 लाख है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, यहां कनाडा के कुल कच्चे तेल उत्पादन का लगभग
चौरासी% हिस्सा निकलता है। यह प्रांत लंबे समय से खुद को एनर्जी प्रांत” के रूप में देखता रहा है।

अलगाववादियों का कहना है कि कनाडा सरकार की जलवायु नीतियां अल्बर्टा के तेल उद्योग को नुकसान पहुंचा रही हैं। उनका आरोप है कि अल्बर्टा से सरकार को भारी टैक्स मिलता है, जबकि बदले में राज्य को कम आर्थिक सहायता मिलती है।

रिपोर्च के मुताबिक अल्बर्टा में लोग परंपरावादी है, जबकि कनाडा के दूसरे राज्यों में उदार आबादी ज्यादा है। इससे उनकी रूढ़िवादी आवाज दब जाती है।

पॉलिटिकल एक्सपर्ट माइकल सोलबर्ग के मुताबिक, अल्बर्टा में अलग होने की मांग कनाडा के गठन के समय से ही है, लेकिन जब सरकार के फैसले सीधे अल्बर्टा की जीवनशैली पर असर डालते हैं, तब यह ज्यादा तेज हो जाती है।
सूत्रों के मुताबिक डोनाल्ड ट्रम्प की सत्ता में वापसी को अलगाववादी अल्बर्टा को अलग करने के लिए सही समय मान रहे हैं।

वही आपको बता दे कुछ अलगाववादी अल्बर्टा को स्वतंत्र देश बनाने की बजाय अमेरिका का 51वां राज्य बनाने की बात भी कर रहे हैं। फरवरी में कैलगरी और एडमॉन्टन के बीच हाईवे पर एक बिलबोर्ड भी लगा, जिसमें अल्बर्टा को USA में मिलाने की अपील की गई थी।

अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी scott bassant ने भी हाल में कहा था कि अल्बर्टा अमेरिका का नेचुरल पार्टनर है और वहां के लोग बहुत स्वतंत्र सोच वाले हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि अल्बर्टा के पास प्राकृतिक संसाधनों की भरमार है और अमेरिका एक स्वतंत्र अल्बर्टा के साथ काम कर सकता है।
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, अल्बर्टा में इस साल जनमत संग्रह कराए जाने की संभावना बढ़ गई है। इससे पहले कनाडा में सिर्फ क्यूबेक ने अलग होने के जनमत संग्रह कराया था, जो नाकाम रहा।

जनमत को लेकर हुए सर्वे बताते हैं कि अल्बर्टा की आजादी के समर्थन में अभी भी अल्पसंख्यक ही हैं। जनवरी में हुए एक सर्वे में केवल 19% लोगों ने अलगाव का समर्थन किया। एक्सपर्ट्स का कहना है कि इनमें से कई लोग सिर्फ सरकार को संदेश देने के लिए Referendum चाहते हैं।

इसके अलावा, अलगाव के विरोध में भी एक नागरिक याचिका लाई गई है, जिस पर 4 लाख से ज्यादा लोग साइन कर चुके हैं। वही आदिवासी समुदाय भी अल्बर्टा को अलग करने के खिलाफ है, क्योंकि उनके कनाडा सरकार के साथ हुए समझौते अल्बर्टा प्रांत के बनने से भी पुराने हैं।

अल्बर्टा की प्रीमियर डेनियल स्मिथ ने कहा है कि वह अलगाव का समर्थन नहीं करतीं, लेकिन ऐसे लोगों की शिकायतों को जायज मानती हैं।
कनाडा में जब भी किसी प्रांत के अलग होने की चर्चा होती है, तो सबसे पहले क्यूबेक का उदाहरण दिया जाता है। बता दे फ्रेंच-भाषी प्रांत क्यूबेक में कनाडा से अलग होने के लिए अब तक दो बार जनमत संग्रह हो चुका है। दोनों ही मौकों पर जनता ने अलगाव के प्रस्ताव को खारिज कर दिया था।

क्यूबेक में पहला जनमत संग्रह 20 मई 1980 को हुआ था। उस समय सवाल यह था कि क्या क्यूबेक को कनाडा के भीतर रहते हुए ज्यादा संप्रभुता दी जानी चाहिए। इस प्रस्ताव को करीब 60% मतदाताओं ने नकार दिया, जबकि लगभग 40% ने समर्थन किया।

इसके बाद 30 अक्टूबर 19पंचानबे को दूसरी बार जनमत संग्रह कराया गया। इस बार सवाल सीधा था कि क्या क्यूबेक को कनाडा से अलग होकर एक संप्रभु देश बन जाना चाहिए। यह जनमत संग्रह कनाडा के इतिहास का सबसे करीबी माना जाता है।

19पंचानबे में 50.58% लोगों ने अलगाव के खिलाफ और उनचास.42% ने समर्थन में वोट दिया। यानी फर्क 1% से भी कम रहा और केवल करीब चौवन हजार वोटों से कनाडा टूटने से बचा।

इस नतीजे के बाद कनाडा सरकार ने अलगाव की प्रक्रिया को लेकर सख्त रुख अपनाया। 19अट्ठानबे में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोई भी प्रांत एकतरफा तरीके से देश से अलग नहीं हो सकता। इसके लिए स्पष्ट सवाल, स्पष्ट बहुमत और संघीय सरकार से बातचीत जरूरी होगी।

इसके बाद वर्ष 2000 में क्लेरिटी एक्ट लागू किया गया, जिससे भविष्य में किसी भी प्रांत के अलगाव की प्रक्रिया को कानूनी दायरे में बांधा गया।

बता दे क्यूबेक में अलगाव आंदोलन अब पहले जितना मजबूत नहीं रहा, लेकिन यह मुद्दा पूरी तरह खत्म भी नहीं हुआ है। यही वजह है कि जब भी अल्बर्टा जैसे प्रांतों में अलगाव की बात उठती है, क्यूबेक में हुए इन दो जनमत संग्रहों को मिसाल के तौर पर याद किया जाता है।
वही आज जिस कनाडा को दुनिया एक मजबूत और स्थिर देश के रूप में जानती है, वह शुरू से एकजुट नहीं था। ब्रिटिश शासन के दौर में अलग-अलग उपनिवेशों को जोड़कर 19वीं सदी में कनाडा का गठन किया गया। यह गठन समझौतों और संघीय व्यवस्था के जरिए हुआ।

1 जुलाई 18सड़सठ को ब्रिटिश नॉर्थ अमेरिका एक्ट के तहत कनाडा का गठन हुआ। शुरुआत में चार प्रांत ओंटारियो, क्यूबेक, नोवा स्कोटिया और न्यू ब्रंसविक शामिल हुए। इसी दिन को कनाडा डे के तौर पर मनाया जाता है।

18सड़सठ के बाद दूसरे प्रांत और इलाके भी जुड़ते गए। 19उनचास में न्यूफाउंडलैंड आखिरी प्रांत बना। बता दे आज कनाडा में 10 प्रांत और 3 क्षेत्र हैं।
ट्रम्प कई बार कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य बनाने की बात कह चुके हैं। कार्नी ने पिछले साल मई में ट्रम्प से व्हाइट हाउस में मुलाकात की थी। इस दौरान कार्नी ने ट्रम्प से साफ शब्दों में कहा था कि कनाडा बिकाऊ नहीं है।

दरअसल, बैठक के दौरान ट्रम्प ने कहा था कि अगर कनाडा अमेरिका में शामिल होता है तो वहां के लोगों को कम टैक्स, बेहतर सुरक्षा और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मिलेंगी।

इस पर कार्नी ने ट्रम्प को जवाब देते हुए कहा कि जैसे रियल एस्टेट में कुछ जगहें कभी बिक्री के लिए नहीं होतीं, वैसे ही कनाडा भी कभी बिकाऊ नहीं है।

उन्होंने कहा कि जिस इमारत में वे बैठे हैं या बकिंघम पैलेस जैसी जगहें कभी नहीं बेची जातीं, उसी तरह कनाडा भी न कभी बिकेगा और न कभी बेचा जाएगा।

कार्नी ने यह भी कहा था कि कनाडावासियों की सोच इस मुद्दे पर नहीं बदलेगी और कनाडा कभी अमेरिका का हिस्सा नहीं बनेगा।
तो साफ है कि अल्बर्टा का अलगाव आंदोलन भले ही अभी अल्पसंख्यक समर्थन तक सीमित हो, लेकिन इसके राजनीतिक और कूटनीतिक उलझाव काफी बड़े हैं।

कनाडा के इतिहास में क्यूबेक जैसे उदाहरण यह बताते हैं कि अलगाव की राह न सिर्फ कठिन है, बल्कि संवैधानिक और कानूनी अड़चनों से भरी हुई भी है।
वहीं, अमेरिका की कथित दिलचस्पी ने इस मुद्दे को घरेलू राजनीति से निकालकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर ला खड़ा किया है।

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