रूस-यूक्रेन युद्ध का प्रभाव अब यूरोप से हजारों किलोमीटर दूर कैरेबियन सागर तक महसूस किया जा रहा है। क्यूबा में गहराते ईंधन संकट के बीच रूस को अपने लगभग 5,000 पर्यटकों को वहां से वापस लाने की तैयारी करनी पड़ रही है। यह घटनाक्रम बताता है कि युद्ध केवल सैन्य मोर्चे तक सीमित नहीं है, बल्कि ऊर्जा आपूर्ति, वैश्विक सप्लाई चेन और तीसरे देशों की स्थिरता पर भी गहरा असर डाल रहा है।
जेट फ्यूल की कमी, उड़ानों का शेड्यूल बदला
मॉस्को की एविएशन अथॉरिटी ने स्वीकार किया है कि अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण क्यूबा में जेट फ्यूल की भारी कमी हो गई है। इसके चलते रूसी एयरलाइंस को अपनी उड़ान सेवाओं में बदलाव करना पड़ा है।
Rossiya Airlines और Nordwind Airlines फिलहाल केवल रिटर्न फ्लाइट्स संचालित कर रही हैं — हवाना और वरादेरो से सीधे मॉस्को — ताकि रूसी नागरिकों को सुरक्षित वापस लाया जा सके। रूसी दूतावास हवाना में Aeroflot और क्यूबन एविएशन अधिकारियों के साथ लगातार संपर्क में है।
केवल रूस नहीं, अन्य देश भी प्रभावित
यह संकट सिर्फ रूस तक सीमित नहीं है। कनाडा की प्रमुख एयरलाइंस — Air Canada, Air Transat और WestJet — ने भी ईंधन संकट के चलते क्यूबा के लिए अपनी उड़ानें घटा दी हैं। इससे स्पष्ट है कि समस्या का दायरा व्यापक है और इसका असर अंतरराष्ट्रीय पर्यटन व एविएशन सेक्टर पर पड़ रहा है।
क्यूबा में ऊर्जा आपातकाल जैसी स्थिति
क्यूबा पहले से ही अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण आर्थिक दबाव में था। अब तेल आपूर्ति बाधित होने से स्थिति और गंभीर हो गई है। देश में:
लंबे समय तक बिजली कटौती
बस और ट्रेन सेवाओं में कमी
होटल संचालन प्रभावित
स्कूल-कॉलेजों की सीमित गतिविधियां
सरकारी कर्मचारियों के लिए चार दिन का कार्य सप्ताह
जैसे कदम उठाए गए हैं। यह संकेत देता है कि देश ऊर्जा आपातकाल जैसी परिस्थिति का सामना कर रहा है।
रूस की ओर से संकेत मिले हैं कि वह मानवीय सहायता के रूप में तेल और पेट्रोलियम उत्पाद भेज सकता है।

प्रतिबंधों की जंग: युद्ध का नया मोर्चा
भू-राजनीतिक संदर्भ में देखें तो अमेरिका ने वेनेज़ुएला से क्यूबा को मिलने वाली तेल आपूर्ति पर रोक लगाई है और उन देशों पर भी टैरिफ लगाने की चेतावनी दी है जो क्यूबा को तेल सप्लाई करेंगे। इसे रूस और उसके सहयोगी नेटवर्क पर दबाव बनाने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
इससे स्पष्ट होता है कि युद्ध केवल यूक्रेन की जमीन पर नहीं, बल्कि प्रतिबंधों, ऊर्जा नाकेबंदी और आर्थिक दबाव के माध्यम से वैश्विक स्तर पर भी लड़ा जा रहा है।
युद्ध का 1,448वां दिन: मैदान में हमले जारी
रूस-यूक्रेन युद्ध अपने 1,448वें दिन में प्रवेश कर चुका है। पूर्वी और दक्षिणी यूक्रेन में ड्रोन और मिसाइल हमले जारी हैं।
विश्लेषकों के अनुसार रूस की रणनीति यूक्रेन के ऊर्जा और बुनियादी ढांचे पर दबाव बनाकर नागरिक जीवन को कठिन करना है, खासकर सर्दियों के दौरान बिजली और हीटिंग सुविधाओं को प्रभावित करना।
दूसरी ओर, यूक्रेन भी रूसी सप्लाई लाइनों, समुद्री मार्गों और कथित “शैडो फ्लीट” को निशाना बनाकर रूस की आर्थिक क्षमता को कमजोर करने की कोशिश कर रहा है।
हालिया ड्रोन हमलों में नागरिक हताहतों की खबरों ने युद्ध के मानवीय पहलू को फिर उजागर किया है। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर ज़ेलेंस्की ने कहा है कि नागरिक ठिकानों पर हमले डिप्लोमेसी पर लोगों का भरोसा कम करते हैं।
शांति वार्ता की कोशिशें और अनिश्चित भविष्य
इसी बीच युद्ध विराम और संभावित शांति समझौते को लेकर बातचीत के नए दौर की खबरें सामने आ रही हैं। अमेरिका और अन्य मध्यस्थ देशों की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है।संकेत हैं कि किसी संभावित समझौते को राजनीतिक वैधता देने के लिए यूक्रेन में चुनाव या जनमत संग्रह जैसे कदम उठाए जा सकते हैं। हालांकि, विवादित क्षेत्रों की स्थिति, सुरक्षा गारंटी और दीर्घकालिक स्थिरता जैसे मुद्दे अभी भी अनिश्चित बने हुए हैं।यूरोप के कई देश अपनी रक्षा तैयारियों की समीक्षा कर रहे हैं और यूक्रेन को दी जा रही सहायता को दीर्घकालिक रणनीति के रूप में देख रहे हैं।
संयुक्त राष्ट्र की चेतावनी
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेस ने चेतावनी दी है कि यदि क्यूबा की ऊर्जा जरूरतें पूरी नहीं हुईं तो वहां मानवीय संकट गहरा सकता है। यह बयान संकेत देता है कि मामला अब केवल राजनीतिक या आर्थिक नहीं, बल्कि संभावित मानवीय संकट का रूप ले सकता है।
युद्ध का वैश्विक जाल
इन घटनाक्रमों को एक साथ देखें तो स्पष्ट होता है कि रूस-यूक्रेन युद्ध अब केवल दो देशों के बीच का संघर्ष नहीं रहा। यह:
ऊर्जा आपूर्ति
वैश्विक अर्थव्यवस्था
कूटनीतिक संतुलन
मानवीय संकट
और अंतरराष्ट्रीय पर्यटन
सभी पर असर डाल रहा है।
क्यूबा का ईंधन संकट इस व्यापक प्रभाव का एक उदाहरण है..यूक्रेन से क्यूबा तक, और यूरोप से कैरेबियन तक…..फिलहाल मैदान में हमले जारी हैं, कूटनीतिक प्रयास जारी हैं और प्रतिबंधों की जंग भी तेज है। आने वाले हफ्ते निर्णायक साबित हो सकते हैं….यदि शांति वार्ता ठोस रूप लेती है तो युद्ध विराम की दिशा में प्रगति संभव है। लेकिन यदि सैन्य कार्रवाई और आर्थिक प्रतिबंध इसी तरह जारी रहे, तो वैश्विक अस्थिरता और गहरी हो सकती है..दुनिया फिलहाल एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां युद्ध के प्रभाव सीमाओं से बहुत दूर तक महसूस किए जा रहे हैं।










