आज पूरे उत्तर भारत में लोक आस्था का महान पर्व छठ महापर्व श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जा रहा है। चार दिवसीय इस पर्व का आज तीसरा दिन है, जिसे संध्या अर्घ्य के नाम से जाना जाता है। इस दिन व्रती (उपवास करने वाले श्रद्धालु) अस्ताचलगामी यानी डूबते सूर्य को अर्घ्य देकर भगवान सूर्य और छठी मैया का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। यह दिन छठ पर्व का सबसे विशेष और पवित्र दिन माना जाता है।
छठ महापर्व का आरंभ और महत्व
छठ पूजा को सूर्य उपासना का सबसे बड़ा पर्व कहा जाता है। दीपावली के छठे दिन यह पर्व आरंभ होता है और चार दिनों तक चलता है। जिसके पहले दिन नहाय-खाय होता है जिसमें व्रती इस दिन नदी या तालाब में स्नान करके शुद्ध भोजन ग्रहण करते हैं।दूसरे दिन खरना होता है इस दिन पूरे दिन उपवास रखा जाता है और शाम को गुड़ की खीर, रोटी और फल का प्रसाद बनाकर पूजा की जाती है।तीसरे दिन संध्या अर्घ्य दिया जाता है व्रती डूबते सूर्य को अर्घ्य देते हैं।चौथे दिन उगते सूर्य को अर्घ्य देकर सप्तमी तिथि की सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद व्रत का पारण किया जाता है।छठ पूजा सूर्य देव और उनकी बहन छठी मैया की उपासना का पर्व है। यह पर्व न केवल धार्मिक बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है यह मानव शरीर, प्रकृति और ऊर्जा के बीच संतुलन का प्रतीक है।इस दौरान व्रती जलाशयों, नदियों, तालाबों या घाटों में कमर तक जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य अर्पित करेंगे।
उगते सूर्य को अर्घ्य और पारण
छठ पर्व का समापन अगले दिन, 28 अक्तूबर (मंगलवार) को होगा। इस दिन उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा।अर्घ्य देने के बाद व्रती प्रसाद ग्रहण करके 36 घंटे के निर्जला व्रत का समापन करेंगी।व्रती सूप या टोकरी में प्रसाद सजाकर घाट पर लेकर जाती हैं। सूर्यदेव को तांबे या पीतल के लोटे में जल, फूल, रोली, गुड़, दूध और अक्षत मिलाकर अर्घ्य अर्पित किया जाता है।जल अर्पित करते समय व्रती “ॐ आदित्याय नमः” या “ॐ भास्कराय नमः” मंत्र का जाप करें।
अस्तगामी सूर्य को अर्घ्य देने की मान्यता
साल भर में केवल छठ पर्व पर ही डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।मान्यता है कि इस समय सूर्य अपनी पत्नी प्रत्यूषा के साथ रहते हैं। संध्या समय की देवी प्रत्यूषा को अर्घ्य देने से संतान की रक्षा, लंबी आयु, आरोग्य और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है।
छठ महापर्व भारतीय संस्कृति
छठ महापर्व भारतीय संस्कृति की उस अद्भुत परंपरा को दर्शाता है, जिसमें प्रकृति, मानव और ईश्वर के बीच गहरा संबंध है। यह पर्व सामूहिकता, पवित्रता और अनुशासन का उदाहरण है। बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और पूर्वी भारत के साथ-साथ आज यह पर्व पूरे देश और विदेशों में भी धूमधाम से मनाया जा रहा है। घाटों पर आज लाखों श्रद्धालु संध्या अर्घ्य के लिए एकत्रित होंगे और सूर्यदेव से प्रार्थना करेंगे कि उनके जीवन में सदा ऊर्जा, संतुलन और प्रकाश बना रहे।
