Meenakshi Natarajan को झटका, सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से किया इनकार

कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन की याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप की संवैधानिक सीमाओं पर जोर दिया। अदालत ने कहा कि चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद न्यायालय आमतौर पर उसमें दखल नहीं देता, क्योंकि संविधान ने इसके लिए अलग कानूनी व्यवस्था निर्धारित की है। कोर्ट की टिप्पणी को चुनावी प्रक्रिया की स्वायत्तता से जोड़कर देखा जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह भी संकेत दिया कि यदि नामांकन खारिज होने जैसे मामलों में सीधे सर्वोच्च अदालत हस्तक्षेप करने लगे, तो भविष्य में कई चुनावी विवाद चुनाव परिणाम आने से पहले ही अदालतों तक पहुंच सकते हैं। इससे चुनावी प्रक्रिया प्रभावित होने की आशंका पैदा हो सकती है। अदालत ने इसी कारण संवैधानिक प्रावधानों का उल्लेख किया। मीनाक्षी नटराजन की ओर से यह तर्क रखा गया कि जिस मामले का उल्लेख नामांकन पत्र में नहीं किया गया, उसमें अभी आरोप तय नहीं हुए थे।  केवल नोटिस जारी होने और आरोप तय होने की स्थिति में कानूनी अंतर है। इसी आधार पर उन्होंने नामांकन रद्द किए जाने के फैसले को चुनौती दी थी। इस मामले ने एक बार फिर चुनावी नामांकन प्रक्रिया में उम्मीदवारों द्वारा दी जाने वाली जानकारी और उसकी कानूनी व्याख्या को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। चुनावी नियमों के अनुसार उम्मीदवारों को अपने खिलाफ लंबित मामलों की जानकारी देनी होती है, लेकिन किन परिस्थितियों में जानकारी देना अनिवार्य है, यह अक्सर कानूनी बहस का विषय बन जाता है। राजनीतिक और कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला भविष्य में चुनावी कानूनों की व्याख्या के लिए महत्वपूर्ण संदर्भ बन सकता है। हालांकि फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप से इनकार किया है, लेकिन चुनाव संबंधी विवादों के निपटारे के लिए संविधान में निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन करने पर जोर दिया है।

मीनाक्षी नटराजन के behalf पर सीनियर वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कोर्ट में उपस्थित हुए। उन्होंने कहा कि रिटर्निंग ऑफिसर के नामांकन को रद्द करने का फैसला मीनाक्षी नटराजन के साथ पूरा अन्याय है। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एस चंदुरकर की पीठ ने याचिकाकर्ता से कहा, ‘हमें ऐसा कोई पुराना सुप्रीम कोर्ट का निर्णय दिखाइए जिसमें चुनाव नामांकन अस्वीकृत होने पर हस्तक्षेप किया गया हो।’ इस पर अभिषेक सिंघवी ने कहा कि केस के विवरण के अनुसार निर्णय लिया जाना चाहिए। अभिषेक मनु सिंघवी ने बीएनएसएस के सेक्शन 223 का उल्लेख करते हुए बताया कि नए कानून में यह प्रावधान जोड़ा गया है कि संभावित आरोपी को पूर्व में सुनवाई का अवसर दिया जाना चाहिए। इस पर कोर्ट ने कहा कि लेकिन कोर्ट ने तो समन भेजा था। अभिषेक सिंघवी ने पुनः बताया कि केवल समन जारी किया गया और रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपुल्स एक्ट का सेक्शन 33ए आरोपों की स्थापना की बात करता है. तेलंगाना के जिस मामले में मीनाक्षी नटराजन को नोटिस दिया गया था, उसका उल्लेख करते हुए अभिषेक सिंघवी ने कोर्ट में कहा, ‘शिकायतकर्ता का आरोप है कि 2022 में उसके साथ दुर्व्यवहार हुआ। पार्टी ने शिकायत के बावजूद कोई कदम नहीं उठाया, लेकिन मीनाक्षी तो 2025 में राज्य में पार्टी की प्रभारी बन गई हैं।’ उन्होंने बताया, ‘मैं देश की सबसे बड़ी न्यायालय में चुका था. फिर भी रिटर्निंग ऑफिसर ने राज्यसभा चुनाव का परिणाम कल ही जाहिर कर दिया। मध्य प्रदेश की तीन राज्यसभा सीटों के लिए गुरुवार को नामांकन रद्द करने की अंतिम तिथि थी। मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द होने पर केवल भारतीय जनता पार्टी (BJP) के तीन उम्मीदवार ही उपस्थित थे, इसीलिए वह निर्विरोध चुनाव जीत गए। नाम वापस लेने का समय खत्म होते ही परिणाम घोषित कर दिए गए े.

नामांकन विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

अदालत ने यह स्पष्ट किया कि चुनाव प्रक्रिया पूरी होने के बाद संबंधित उम्मीदवार ककानूनी उपाय उपलब्ध हैं। संविधान के तहत चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद चुनाव याचिका दायर की जा सकती ै, और इसी प्रक्रिया से विवादों का निपटारा किया जाता है। न्यायालय ने संकेत दिया कि चुनावी विवादों के लिए पहले से मौजूद कानूनी ढांचा है। मीनाक्षी नटराजन ने अपने नामांकन रद्द होने को अनुचित बताते हुए कहा कि जिन मामलों का उल्लेख किया गया है, उनमें अभी तक आरोप तय नहीं हुए हैं। उनका तर्क था कि नामांकन पत्र में केवल वही मामले शामिल होने चाहिए, जिनमें अदालत ने औपचारिक रूप से आरोप तय किए हों। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने अदालत में तर्क दिया कि रिटर्निंग ऑफिसर कनिर्णय न्यायसंगत नहीं था। उन्होंने कहा कि नामांकन रद्द करने का आधार कानूनी रूप से कमजोर है और उम्मीदवार के चुनाव लड़ने के अधिकार का हनन हुआ है। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने पूछा कि क्या पहले कभी ऐसा उदाहरण है, जब नामांकन खारिज होने के मामले में सीधे सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप किया हो। अदालत ने पुराने न्यायिक फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि चुनावी प्रक्रिया में दखल देने के लिए मजबूत संवैधानिक आधार आवशयक है। मामले में तेलंगाना से जुड़े एक आपराधिक प्रकरण का उल्लेख किया गया, जिससे नटराजन को नोटिस जारी किया गया था। उनकी ओर से कहा गया कि केवल नोटिस जारी होना और आरोप तय होना दो भिन्न कानूनी स्थितियां हैं। इसी आधार पर उन्होंने अपने नामांकन को वैध ठहराने का प्रयास किया। इस पूरे घटनाक्रम के दौरान मध्य प्रदेश की राज्यसभा सीटों के लिए चुनावी प्रक्रिया चलती रही।
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