Bengal में BJP की शानदार जीत के बाद बांग्लादेश ने भारत से उम्मीदें बढ़ा दीं, खलीलुर रहमान ने कहा- ‘मैं उनकी सोच को समझता हूँ…’ बंगाल चुनाव में बीजेपी की शानदार जीत के बाद बांग्लादेश ने भारत के प्रति बड़ी उम्मीदें व्यक्त की हैं। बांग्लादेश के विदेश मंत्री ने तीस्ता पानी के समझौते पर पुनर्विचार करने का उल्लेख किया है। बंगाल चुनाव में बीजेपी की महत्वपूर्ण जीत के बाद पड़ोसी देश बांग्लादेश ने भारत के प्रति उम्मीदें बढ़ाई हैं. बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान ने कहा है कि वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए लंबे समय से लटके तीस्ता जल समझौते पर पुनर्विचार किया जा सकता है। यह इस कारण से भी है कि ममता बनर्जी को भारत-बांग्लादेश के बीच तीस्ता जल विवाद को हल करने के प्रयासों में एक बाधा के रूप में माना जाता रहा है. पश्चिम बंगाल में हालिया चुनावी नतीजों के बाद भारत और बांग्लादेश के संबंधों को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है। इस राजनीतिक बदलाव के बीच बांग्लादेश ने भारत से अपनी उम्मीदें और भी बढ़ा दी हैं। खासतौर पर तीस्ता नदी के जल बंटवारे को लेकर लंबे समय से लंबित समझौते पर फिर से विचार की संभावना जताई जा रही है। बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान ने हाल ही में इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए संकेत दिया कि मौजूदा हालात में तीस्ता जल समझौते पर पुनर्विचार किया जा सकता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पश्चिम बंगाल में नई सरकार के गठन और उसके रुख को समझना अभी बाकी है, इसलिए किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।
तीस्ता नदी का जल बंटवारा भारत और बांग्लादेश के बीच एक संवेदनशील और महत्वपूर्ण मुद्दा रहा है। यह नदी दोनों देशों के सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले लाखों लोगों के जीवन और आजीविका से जुड़ी हुई है। इसलिए इस पर कोई भी निर्णय केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि मानवीय दृष्टिकोण से भी बेहद अहम माना जाता है। साल 2011 में भारत और बांग्लादेश के बीच इस समझौते पर सहमति बनने की उम्मीद थी। उस समय भारत के प्रधानमंत्री की ढाका यात्रा के दौरान इस पर हस्ताक्षर होने की संभावना थी, लेकिन पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के विरोध के कारण यह समझौता अंतिम रूप नहीं ले सका। ममता बनर्जी का मानना था कि इस समझौते से पश्चिम बंगाल के उत्तरी हिस्सों में पानी की कमी हो सकती है, जिससे स्थानीय लोगों की कृषि और जीवन प्रभावित होगा। उनके इस रुख ने केंद्र सरकार के प्रयासों को रोक दिया और यह मुद्दा लंबे समय तक ठंडे बस्ते में चला गया। इसके बाद बांग्लादेश ने इस समस्या का समाधान खोजने के लिए वैकल्पिक रास्ते तलाशने शुरू किए। देश ने तीस्ता नदी के समग्र प्रबंधन और पुनर्स्थापना की योजना बनाई और इसके लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी मांगा। वर्ष 2019 में प्रधानमंत्री शेख हसीना ने चीन की यात्रा के दौरान इस परियोजना के लिए सहायता का अनुरोध किया था। हाल ही में बांग्लादेश के राजनीतिक और कूटनीतिक हलकों में यह भी कहा गया है कि भारत में हुए चुनाव परिणामों के बाद दोनों देशों के संबंध और मजबूत हो सकते हैं। बांग्लादेश के नेताओं ने उम्मीद जताई है कि नई परिस्थितियों में द्विपक्षीय मुद्दों पर सकारात्मक प्रगति देखने को मिल सकती है। खलीलुर रहमान ने यह भी स्पष्ट किया कि बांग्लादेश इस मुद्दे पर भारत के फैसले का इंतजार जरूर करेगा, लेकिन अपनी जरूरतों को नजरअंदाज नहीं करेगा। उनके अनुसार, तीस्ता नदी के किनारे रहने वाले लोगों के लिए यह केवल एक राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि जीवन और मृत्यु का प्रश्न है, जिसे जल्द से जल्द सुलझाना जरूरी है।
बांग्लादेश के विदेश मंत्री ने क्या कहा
ढाका में मीडिया से बातचीत के दौरान बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान ने तीस्ता नदी जल बंटवारे के मुद्दे पर महत्वपूर्ण बयान दिया। चीन की यात्रा पर रवाना होने से पहले जब उनसे इस लंबे समय से लंबित समझौते के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि फिलहाल स्थिति का आकलन करना जल्दबाजी होगी। खलीलुर रहमान ने अपने जवाब में यह भी जोड़ा कि पश्चिम बंगाल में अभी नई सरकार का गठन नहीं हुआ है। ऐसे में वहां की राजनीतिक स्थिति और नेतृत्व का रुख क्या होगा, इस पर टिप्पणी करना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि किसी अन्य राज्य या सरकार की सोच का अनुमान लगाना उनकी जिम्मेदारी नहीं है। उन्होंने यह संकेत जरूर दिया कि बांग्लादेश इस मुद्दे को गंभीरता से देखता है और भविष्य में समाधान की उम्मीद रखता है। हालांकि, उन्होंने यह भी साफ किया कि बातचीत और समझौते की दिशा में आगे बढ़ने के लिए भारत की आंतरिक राजनीतिक परिस्थितियों को समझना जरूरी होगा। तीस्ता नदी जल बंटवारा भारत और बांग्लादेश के बीच एक अहम कूटनीतिक मुद्दा रहा है। यह केवल दो देशों के संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले लाखों लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी और खेती-बाड़ी से भी जुड़ा हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस समझौते पर प्रगति के लिए केंद्र और राज्य सरकारों के बीच समन्वय बेहद आवश्यक है। खासकर पश्चिम बंगाल की भूमिका इसमें निर्णायक मानी जाती है, क्योंकि नदी का एक बड़ा हिस्सा राज्य से होकर गुजरता है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि भारत और बांग्लादेश इस मुद्दे पर किस तरह आगे बढ़ते हैं। फिलहाल, दोनों देशों के बीच संवाद और कूटनीतिक संतुलन बनाए रखना ही इस जटिल समस्या के समाधान की कुंजी माना जा रहा है।

ममता बनर्जी ने किया था प्रतिरोध
साल 2011 में भारत और बांग्लादेश के बीच तीस्ता नदी जल बंटवारे को लेकर एक महत्वपूर्ण सहमति बनने की दिशा में कदम बढ़ाए गए थे। उस समय दोनों देशों के बीच रिश्तों में गर्मजोशी थी और यह उम्मीद जताई जा रही थी कि यह समझौता क्षेत्रीय सहयोग का एक बड़ा उदाहरण बनेगा। तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की ढाका यात्रा के दौरान इस समझौते पर हस्ताक्षर होने की पूरी संभावना थी। कूटनीतिक स्तर पर सभी तैयारियां लगभग पूरी हो चुकी थीं और दोनों देशों के बीच सकारात्मक माहौल भी बना हुआ था। अंतिम समय में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के विरोध के चलते यह समझौता अधर में लटक गया। उनका मानना था कि इस संधि से राज्य के उत्तरी इलाकों में पानी की कमी हो सकती है, जिससे कृषि और स्थानीय जीवन प्रभावित होगा। ममता बनर्जी के इस रुख के कारण केंद्र सरकार को पीछे हटना पड़ा और तीस्ता समझौता ठंडे बस्ते में चला गया। इसके बाद यह मुद्दा भारत-बांग्लादेश संबंधों में एक लंबित और संवेदनशील विषय बना रहा, जिस पर समय-समय पर चर्चा होती रही है। बांग्लादेश ने अपनी जरूरतों को ध्यान में रखते हुए तीस्ता नदी के समग्र प्रबंधन और पुनर्स्थापना की दिशा में कदम उठाए। देश ने इस परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग की तलाश भी शुरू कर दी, ताकि अपने जल संसाधनों का बेहतर उपयोग किया जा सके। वर्ष 2019 में प्रधानमंत्री शेख हसीना ने बीजिंग की यात्रा के दौरान इस परियोजना के लिए चीन से सहायता मांगी। यह कदम इस बात का संकेत था कि बांग्लादेश इस मुद्दे को लेकर गंभीर है और समाधान के लिए वैकल्पिक रास्तों पर भी विचार कर रहा है।