आम आदमी पार्टी की लड़ाई राष्ट्रपति भवन तक आई, आज भगवंत मान और राघव चड्ढा राष्ट्रपति से अलग-अलग मिलेंगे पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान और सांसद राघव चड्ढा आज राष्ट्रपति से अलग-अलग समय पर मुलाकात करेंगे. राष्ट्रपति से मुलाकात के दौरान सीएम मान AAP के सात राज्यसभा सांसदों को वापस बुलाने का प्रस्ताव रखेंगे. उन्होंने इन सांसदों पर पंजाब के हितों की अनदेखी करने का भी आरोप लगाया है. आम आदमी पार्टी (AAP) के आंतरिक संकट और पंजाब के सांसदों के मुद्दे को लेकर पार्टी की लड़ाई अब राष्ट्रपति भवन तक पहुंच गई है. आज पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान और राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा दोनों अलग-अलग राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात करेंगे. प्राप्त जानकारी के अनुसार, मुख्यमंत्री भगवंत मान दोपहर 12 बजे राष्ट्रपति से मिलेंगे. उनके साथ पंजाब के सभी आम आदमी पार्टी विधायक भी इस मुलाकात में शामिल होंगे. दिल्ली रवाना होते वक्त सीएम मान ने इस बात पर जोर दिया कि आम आदमी पार्टी के सभी विधायक एकजुट हैं और कहा, ‘बैठक के लिए सिर्फ मुझे ही समय दिया गया है.’ उन्होंने आगे कहा, ‘राष्ट्रपति संविधान की संरक्षक हैं. वह देश की संवैधानिक प्रमुख हैं.’ मान ने पार्टी विधायकों से मिलने और BJP में शामिल हुए राज्यसभा सांसदों को वापस बुलाने की मांग के लिए राष्ट्रपति से मिलने का वक्त मांगा था. हालांकि, बैठक के लिए केवल मान को ही समय दिया गया था.
अब सभी की नजर राष्ट्रपति भवन में होने वाली इन अहम मुलाकातों पर टिकी हुई है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या इन बैठकों से कोई ठोस समाधान निकलता है या फिर यह विवाद और गहराता है। फिलहाल, इतना तय है कि AAP का यह आंतरिक संकट आने वाले समय में भारतीय राजनीति की दिशा को प्रभावित कर सकता है। आम आदमी पार्टी पंजाब के विधायकों का आरोप है कि राघव चड्ढा, संदीप पाठक और अन्य पांच सांसदों ने पंजाब के हितों के साथ धोखा किया है. विधायकों ने याद दिलाया कि इन्हें पंजाब के हितों की रक्षा के लिए राज्यसभा भेजा गया था, लेकिन ये सांसद पंजाब के साथ विश्वासघात कर रहे हैं. विधायक राष्ट्रपति से मुलाकात के दौरान इन सांसदों को रिकॉल (वापस बुलाने) का प्रस्ताव रखेंगे. वह राष्ट्रपति के समक्ष पंजाब के हितों की रक्षा और सांसदों की जवाबदेही तय करने की मांग करेंगे. यह मुलाकात AAP के अंदर चल रहे तनाव और पंजाब राजनीति में हो रहे घटनाक्रम को लेकर महत्वपूर्ण मानी जा रही है. दोनों तरफ से राष्ट्रपति भवन में होने वाली इन बैठकों पर पूरे राजनीतिक गलियारे की नजर टिकी हुई है.


राघव चड्ढा भी करेंगे राष्ट्रपति से मुलाकात
आम आदमी पार्टी के भीतर जारी सियासी उथल-पुथल के बीच राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा की राष्ट्रपति से होने वाली मुलाकात को बेहद अहम माना जा रहा है। यह मुलाकात ऐसे समय में हो रही है जब पार्टी के अंदर मतभेद खुलकर सामने आ चुके हैं और कई वरिष्ठ नेताओं के बीच दूरी बढ़ती दिखाई दे रही है। राजनीतिक जानकार इसे पार्टी के भविष्य के लिए निर्णायक मोड़ के रूप में देख रहे हैं। राघव चड्ढा सुबह साढ़े दस से ग्यारह बजे के बीच राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात कर सकते हैं। इस दौरान उनके साथ संदीप पाठक सहित कुछ अन्य सांसदों के भी मौजूद रहने की संभावना जताई जा रही है। हालांकि, इस बैठक को लेकर अभी तक कोई आधिकारिक एजेंडा जारी नहीं किया गया है, जिससे इसके उद्देश्यों को लेकर सस्पेंस बना हुआ है। माना जा रहा है कि इस मुलाकात के दौरान राघव चड्ढा पार्टी के भीतर चल रहे विवादों पर अपना पक्ष राष्ट्रपति के सामने रख सकते हैं। हाल ही में हुए घटनाक्रम के बाद उन पर कई तरह के आरोप लगाए गए हैं, जिनका जवाब देना उनके लिए जरूरी हो गया है। ऐसे में यह बैठक उनके लिए अपनी स्थिति स्पष्ट करने का एक महत्वपूर्ण अवसर हो सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस मुलाकात के जरिए चड्ढा यह संदेश देने की कोशिश कर सकते हैं कि उनके फैसले पार्टी के खिलाफ नहीं, बल्कि एक व्यापक राजनीतिक दृष्टिकोण के तहत लिए गए थे। वे यह भी स्पष्ट कर सकते हैं कि जिन मुद्दों को लेकर विवाद खड़ा हुआ, उनमें उनका पक्ष क्या रहा और उन्होंने किन परिस्थितियों में निर्णय लिया। आम आदमी पार्टी के कई नेता इस मुलाकात को लेकर सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि जब पार्टी के भीतर मतभेद हैं, तो उन्हें पहले आंतरिक स्तर पर सुलझाया जाना चाहिए था। राष्ट्रपति से सीधे संपर्क करने को कुछ लोग राजनीतिक दबाव बनाने की रणनीति के रूप में भी देख रहे हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने न केवल पार्टी की आंतरिक एकता को चुनौती दी है, बल्कि विपक्षी दलों को भी AAP पर निशाना साधने का मौका दे दिया है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पार्टी इस संकट से कैसे बाहर निकलती है और क्या कोई ठोस समाधान सामने आता है। राघव चड्ढा की यह प्रस्तावित मुलाकात राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बनी हुई है। सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि इस बैठक के बाद क्या संकेत निकलते हैं और क्या इससे मौजूदा विवाद को सुलझाने की दिशा में कोई प्रगति होती है।
सांसदों के विलय को स्वीकार
24 अप्रैल का दिन आम आदमी पार्टी की राजनीति में एक बड़े भूचाल के रूप में दर्ज हो गया। उस दिन पार्टी के 10 राज्यसभा सांसदों में से सात ने एक साथ इस्तीफा देकर न सिर्फ संगठन को झटका दिया, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी हलचल पैदा कर दी। इन नेताओं ने पार्टी नेतृत्व पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि संगठन अपने मूल सिद्धांतों और विचारधारा से भटक चुका है। पार्टी छोड़ने वालों में राघव चड्ढा, अशोक मित्तल, संदीप पाठक, हरभजन सिंह, राजेंद्र गुप्ता, विक्रमजीत साहनी और स्वाति मालीवाल जैसे प्रमुख नाम शामिल हैं। इन सभी नेताओं ने एकजुट होकर भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने का फैसला लिया, जिसने सियासी समीकरणों को अचानक बदल दिया। इन सात सांसदों में से छह का संबंध पंजाब से होना इस घटनाक्रम को और भी महत्वपूर्ण बनाता है। इससे यह संकेत मिलता है कि पंजाब इकाई के भीतर असंतोष लंबे समय से पनप रहा था, जो आखिरकार खुलकर सामने आ गया। यह भी सवाल उठने लगे हैं कि क्या पार्टी नेतृत्व राज्य स्तर पर नेताओं की नाराजगी को समय रहते समझने में असफल रहा। इन नेताओं का कहना है कि उन्होंने पार्टी को मजबूत करने के लिए कई बार आंतरिक स्तर पर अपनी चिंताएं जाहिर की थीं, लेकिन उन्हें गंभीरता से नहीं लिया गया। उनका आरोप है कि पार्टी अब पारदर्शिता और जवाबदेही जैसे मूल्यों से दूर होती जा रही है, जो कभी उसकी पहचान हुआ करती थी। इस घटनाक्रम के बाद राज्यसभा में आम आदमी पार्टी की स्थिति कमजोर हो गई है। सोमवार को राज्यसभा के सभापति सीपी राधाकृष्णन ने इन सांसदों के बीजेपी में विलय को औपचारिक मंजूरी दे दी। इसके साथ ही उच्च सदन में AAP की संख्या घटकर महज तीन रह गई, जो पार्टी के लिए एक बड़ा झटका है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह सिर्फ संख्या में कमी का मामला नहीं है, बल्कि यह पार्टी की विश्वसनीयता और संगठनात्मक मजबूती पर भी सवाल खड़ा करता है। इतने बड़े स्तर पर नेताओं का पार्टी छोड़ना यह दर्शाता है कि अंदरूनी हालात ठीक नहीं हैं और नेतृत्व को आत्ममंथन की जरूरत है। अब देखना यह होगा कि अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी इस संकट से कैसे उबरती है। क्या पार्टी नए सिरे से खुद को संगठित कर पाएगी या फिर यह टूट आगे भी जारी रहेगी, यह आने वाले समय में साफ हो जाएगा। फिलहाल, इस घटनाक्रम ने भारतीय राजनीति में AAP की स्थिति को लेकर नई बहस छेड़ दी है।










