निलंबित DIG भुल्लर की याचिका CBI जांच पर सवाल

पंजाब पुलिस के निलंबित डीआईजी हरचरण सिंह भुल्लर ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की कार्रवाई को चुनौती देते हुए पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। उन्होंने अपने खिलाफ दर्ज भ्रष्टाचार और आय से अधिक संपत्ति के मामलों को अवैध और असंवैधानिक बताया है। भुल्लर का कहना है कि सीबीआई ने उनके खिलाफ जो एफआईआर दर्ज की है, वह पंजाब सरकार की अनुमति के बिना की गई है, जो कानूनी रूप से मान्य नहीं है। इसी आधार पर उन्होंने पूरी जांच प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए हैं। अपनी याचिका में उन्होंने स्पष्ट किया है कि पंजाब सरकार ने 6 नवंबर 2020 को दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टेबलिशमेंट (DSPE) अधिनियम के तहत दी गई सामान्य सहमति वापस ले ली थी। ऐसे में सीबीआई को राज्य में स्वतः जांच करने का अधिकार नहीं है। भुल्लर ने दावा किया है कि सहमति वापस लेने के बाद सीबीआई द्वारा की गई कोई भी कार्रवाई, चाहे वह एफआईआर हो, गिरफ्तारी हो या रिमांड प्रक्रिया, सभी कानूनी रूप से अमान्य हैं। उन्होंने हाईकोर्ट से अपील की है कि उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द किया जाए और जांच प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाई जाए। साथ ही उन्होंने अस्थायी राहत (स्टे ऑर्डर) की भी मांग की है। याचिका में यह भी कहा गया है कि केंद्रीय जांच एजेंसियां अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कार्रवाई कर रही हैं, जिससे संघीय ढांचे और राज्यों के अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है। भुल्लर ने अदालत से यह भी आग्रह किया है कि इस पूरे मामले में निष्पक्षता बनाए रखने के लिए जांच की वैधता पर पहले निर्णय लिया जाए, ताकि आगे की कार्रवाई पर स्पष्टता आ सके। यह मामला अब कानूनी और संवैधानिक बहस का विषय बन गया है, जिसमें केंद्र और राज्य के अधिकार क्षेत्र को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

विजिलेंस ने पहले दर्ज की थी FIR

हरचरण सिंह भुल्लर पंजाब पुलिस के 1993 बैच के वरिष्ठ अधिकारी हैं। उन्हें 2015 में भारतीय पुलिस सेवा (IPS) में पदोन्नति मिली थी, जिसके बाद वे राज्य पुलिस में कई अहम पदों पर कार्यरत रहे। भुल्लर ने अपने करियर के दौरान विभिन्न जिम्मेदारियों का निर्वहन किया और उन्हें प्रशासनिक एवं कानून-व्यवस्था से जुड़े महत्वपूर्ण कार्यों में तैनात किया गया था। हालांकि, हाल के वर्षों में उनके खिलाफ कई जांच प्रक्रियाएं शुरू हुईं। अदालत में दायर अपनी याचिका में उन्होंने बताया कि अक्टूबर 2023 में पंजाब विजिलेंस ब्यूरो ने उनके खिलाफ पहले ही एक मामला दर्ज किया था। यह मामला कथित अनियमितताओं और भ्रष्टाचार से जुड़ा बताया गया था। इसके बाद अक्टूबर 2025 में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने चंडीगढ़ में एक अलग एफआईआर दर्ज की। यह मामला कथित रिश्वतखोरी की शिकायत के आधार पर दर्ज किया गया था। भुल्लर का तर्क है कि जिन घटनाओं को आधार बनाकर सीबीआई ने मामला दर्ज किया है, वे पूरी तरह से पंजाब राज्य और पंजाब पुलिस से संबंधित हैं। ऐसे में सीबीआई को इस मामले में सीधे हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है। उनका कहना है कि राज्य सरकार द्वारा सामान्य सहमति वापस लिए जाने के बाद सीबीआई की कार्रवाई कानूनी रूप से संदिग्ध हो जाती है। इसी आधार पर उन्होंने पूरी जांच को चुनौती दी है। भुल्लर ने यह भी दावा किया है कि एक ही प्रकार के आरोपों पर दो अलग-अलग एजेंसियों द्वारा जांच करना न्यायिक प्रक्रिया के सिद्धांतों के खिलाफ है। उन्होंने हाईकोर्ट से मांग की है कि इस मामले में स्पष्टता लाई जाए और यह तय किया जाए कि सीबीआई की कार्रवाई वैध है या नहीं। यह मामला अब केवल एक अधिकारी की जांच तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह राज्य और केंद्रीय एजेंसियों के अधिकार क्षेत्र को लेकर एक बड़ा कानूनी विवाद बन गया है, जिस पर पूरे प्रशासनिक और कानूनी तंत्र की नजर बनी हुई है।

समान तथ्यों पर दूसरी बार एफआईआर दर्ज करना असंवैधानिक है।

निलंबित डीआईजी हरचरण सिंह भुल्लर ने अपनी याचिका में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा है कि समान तथ्यों पर दूसरी एफआईआर दर्ज करना सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित कानूनी सिद्धांतों के खिलाफ है। याचिका में भुल्लर ने तर्क दिया है कि किसी भी व्यक्ति के खिलाफ एक ही घटना या समान आरोपों पर दो अलग-अलग एजेंसियों द्वारा समानांतर जांच नहीं की जा सकती, क्योंकि इससे न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित होती है। उन्होंने यह भी कहा है कि पहले ही पंजाब विजिलेंस ब्यूरो द्वारा ट्रैप केस और आय से अधिक संपत्ति से जुड़े मामलों की जांच की जा चुकी है। ऐसे में सीबीआई द्वारा उसी आधार पर अलग से एफआईआर दर्ज करना उचित नहीं है। सीबीआई की यह कार्रवाई न केवल कानूनी सिद्धांतों के खिलाफ है, बल्कि इससे संघीय ढांचे (Federal Structure) का भी उल्लंघन होता है, जिसमें राज्यों के अधिकारों की रक्षा की जाती है। उन्होंने आरोप लगाया है कि सीबीआई ने पंजाब विजिलेंस की जांच के समानांतर अपनी कार्रवाई शुरू की, जिससे जांच प्रक्रिया में दोहराव और असंगतता पैदा हो गई है। याचिका में यह भी कहा गया है कि जब राज्य सरकार ने सामान्य सहमति वापस ले ली थी, तो उसके बाद केंद्र की जांच एजेंसी द्वारा राज्य से जुड़े मामलों में सीधे हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता। भुल्लर का कहना है कि इस तरह की कार्रवाई से न केवल उनके मौलिक अधिकार प्रभावित हो रहे हैं, बल्कि यह कानून के स्थापित सिद्धांतों का भी उल्लंघन है। उन्होंने अदालत से अनुरोध किया है कि सीबीआई द्वारा दर्ज दूसरी एफआईआर को अवैध घोषित किया जाए और चल रही जांच पर तुरंत रोक लगाई जाए। यह मामला अब एक महत्वपूर्ण कानूनी बहस का विषय बन गया है, जिसमें केंद्र और राज्य की जांच एजेंसियों के अधिकार क्षेत्र और उनके बीच संतुलन पर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं।

बिना मंजूरी के CBI कोई कार्रवाई नहीं कर सकती।

निलंबित डीआईजी हरचरण सिंह भुल्लर ने अपनी याचिका में एक बार फिर केंद्र और राज्य के अधिकार क्षेत्र को लेकर गंभीर संवैधानिक सवाल उठाए हैं। उन्होंने अदालत में स्पष्ट कहा कि पुलिस और कानून व्यवस्था पूरी तरह राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में आती है। जब तक किसी राज्य सरकार की स्पष्ट सहमति नहीं होती, तब तक केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) राज्य से जुड़े मामलों में स्वतंत्र रूप से कार्रवाई नहीं कर सकती। उन्होंने तर्क दिया कि पंजाब सरकार ने पहले ही सामान्य सहमति वापस ले ली थी, ऐसे में सीबीआई की वर्तमान कार्रवाई वैधानिक आधार पर टिक नहीं सकती। याचिका में कहा गया है कि राज्य की अनुमति के बिना की गई जांच न केवल कानूनी रूप से गलत है, बल्कि यह संघीय ढांचे (Federal Structure) पर सीधा हमला है। भुल्लर ने यह भी आरोप लगाया कि इस तरह की कार्रवाई से राज्यों के अधिकार कमजोर होते हैं और केंद्र सरकार की एजेंसियों को अनियंत्रित शक्ति मिल जाती है। उन्होंने अदालत को बताया कि संविधान में स्पष्ट रूप से केंद्र और राज्य के बीच शक्तियों का विभाजन किया गया है, जिसका पालन करना आवश्यक है। भुल्लर का कहना है कि यदि इस प्रकार बिना सहमति के जांच जारी रहती है, तो यह संवैधानिक संतुलन को बिगाड़ सकती है और न्यायिक प्रक्रिया पर भी असर डाल सकती है। उन्होंने हाईकोर्ट से अनुरोध किया है कि सीबीआई की कार्रवाई को तत्काल रोका जाए और यह तय किया जाए कि राज्य की अनुमति के बिना जांच वैध है या नहीं। यह मामला अब केवल एक अधिकारी की जांच तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह केंद्र और राज्य के बीच शक्तियों के संतुलन और संघीय ढांचे की व्याख्या से जुड़ा एक महत्वपूर्ण संवैधानिक मुद्दा बन गया है।

जांच में कार्रवाई से संबंधित कई विधिक अड़चनें

निलंबित डीआईजी हरचरण सिंह भुल्लर ने अपनी याचिका में संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला देते हुए कहा है कि उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का गंभीर उल्लंघन हुआ है। उन्होंने इसे “प्रोसीजर एस्टैब्लिश्ड बाय लॉ” यानी कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के खिलाफ बताया है। भुल्लर का कहना है कि किसी भी नागरिक की स्वतंत्रता तभी छीनी जा सकती है जब पूरी कानूनी प्रक्रिया का सख्ती से पालन किया गया हो, लेकिन उनके मामले में ऐसा नहीं किया गया। उन्होंने अदालत के समक्ष यह भी आरोप लगाया कि उनकी गिरफ्तारी के दौरान आवश्यक कानूनी औपचारिकताओं का पालन ठीक ढंग से नहीं किया गया, जिससे प्रक्रिया की वैधता पर सवाल उठते हैं। याचिका में उन्होंने कहा है कि गिरफ्तारी के समय उनके अधिकारों को नजरअंदाज किया गया और उन्हें पर्याप्त कानूनी सुरक्षा नहीं दी गई। भुल्लर ने यह भी दावा किया कि उनके खिलाफ दर्ज मामलों में जांच प्रक्रिया शुरू से ही त्रुटिपूर्ण रही है और कई कानूनी खामियां मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि जांच एजेंसियों द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी रही है, जिससे पूरा मामला संदिग्ध हो जाता है। उनके खिलाफ की गई कार्रवाई न केवल अनुचित है, बल्कि यह मौलिक अधिकारों के संरक्षण से भी मेल नहीं खाती। उन्होंने हाईकोर्ट से अनुरोध किया है कि उनके मामले में अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षण सुनिश्चित किया जाए और पूरी जांच प्रक्रिया की वैधता की समीक्षा की जाए। यह मामला अब कानूनी और संवैधानिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण बन गया है, जिसमें व्यक्तिगत स्वतंत्रता और जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर बहस शुरू हो गई है।

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