BRICS देशों ने ग्लोबल ट्रेड और जलवायु नीति से जुड़े एक अहम मुद्दे पर अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है। समूह ने कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म यानी CBAM जैसे एकतरफा कदमों पर चिंता जताई है। BRICS देशों का मानना है कि इस तरह के नियमों का असर खास तौर पर विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था और उनके निर्यात पर पड़ सकता है। शनिवार को BRICS देशों ने कहा कि वे ऐसे उपायों के पक्ष में नहीं हैं, जिन्हें एकतरफा तरीके से लागू किया जाए और जिनका स्वरूप दंडात्मक या भेदभावपूर्ण हो। समूह के मुताबिक, जलवायु परिवर्तन से निपटने के नाम पर बनाई गई नीतियां ऐसी नहीं होनी चाहिए, जिनसे अंतरराष्ट्रीय व्यापार में किसी एक देश या देशों के समूह को अतिरिक्त दबाव का सामना करना पड़े। कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म यानी CBAM को आसान भाषा में समझें तो यह ऐसी व्यवस्था है, जिसमें ज्यादा कार्बन उत्सर्जन वाले उत्पादों के आयात पर कार्बन से जुड़ी अतिरिक्त लागत लग सकती है। इसका उद्देश्य उन उत्पादों से जुड़े उत्सर्जन को ध्यान में रखना है, जिनका उत्पादन अपेक्षाकृत ज्यादा कार्बन उत्सर्जन के साथ होता है। इस व्यवस्था को लेकर BRICS देशों की चिंता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कई विकासशील अर्थव्यवस्थाएं भारी उद्योगों से जुड़े उत्पादों का बड़े स्तर पर निर्यात करती हैं। अगर ऐसे उत्पादों पर दूसरे बाजारों में अतिरिक्त कार्बन लागत बढ़ती है, तो इससे निर्यातकों की प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो सकती है और कारोबार की लागत भी बढ़ सकती है। CBAM जैसे नियमों की चर्चा में खास तौर पर आयरन और स्टील, सीमेंट, फर्टिलाइजर और एल्युमिनियम जैसे सेक्टर महत्वपूर्ण हैं। इन उद्योगों में उत्पादन प्रक्रिया के दौरान कार्बन उत्सर्जन अपेक्षाकृत अधिक होता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कार्बन से जुड़े नए नियम लागू होने पर इन क्षेत्रों के कारोबार पर सीधा असर पड़ने की संभावना रहती है। BRICS देशों का कहना है कि जलवायु से जुड़ी नीतियां बनाते समय विकासशील देशों की परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। उनका तर्क है कि सभी देशों की आर्थिक स्थिति, तकनीकी क्षमता और संसाधन एक जैसे नहीं हैं। इसलिए वैश्विक स्तर पर पर्यावरणीय लक्ष्य तय करते समय अलग-अलग देशों की जरूरतों और चुनौतियों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। BRICS का यह रुख ऐसे समय सामने आया है जब दुनिया में जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए कई नए नियम और नीतियां तैयार की जा रही हैं। एक तरफ देशों पर कार्बन उत्सर्जन कम करने का दबाव है, वहीं दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय व्यापार को सुचारू बनाए रखना भी जरूरी है। BRICS देशों ने संकेत दिया है कि दोनों उद्देश्यों के बीच संतुलन बनाया जाना चाहिए।
जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई सामूहिक प्रयास से ही प्रभावी हो सकती है। ऐसे में किसी भी देश या समूह की ओर से उठाए गए ऐसे कदम, जो दूसरे देशों के लिए व्यापारिक मुश्किलें बढ़ाएं, उन्हें लेकर व्यापक अंतरराष्ट्रीय चर्चा होनी चाहिए। BRICS देशों ने इसी तरह की नीतियों के खिलाफ अपनी चिंता जाहिर की है। विकासशील देशों के लिए यह मामला इसलिए अहम है क्योंकि उनके कई उद्योग अभी भी पारंपरिक ऊर्जा और ज्यादा कार्बन उत्सर्जन वाली उत्पादन प्रक्रियाओं पर निर्भर हैं। उत्पादन को कम कार्बन वाला बनाने के लिए नई तकनीक और बड़े निवेश की जरूरत होती है। ऐसे में बढ़ने वाली कार्बन लागत का असर कंपनियों से लेकर निर्यात और रोजगार तक दिखाई दे सकता है। BRICS देशों का जोर इस बात पर है कि वैश्विक जलवायु नीति ऐसी हो, जिसमें पर्यावरण संरक्षण के साथ आर्थिक विकास और निष्पक्ष व्यापार का भी ध्यान रखा जाए। आने वाले समय में कार्बन टैक्स, उत्सर्जन और अंतरराष्ट्रीय व्यापार से जुड़े नियमों पर BRICS देशों की यह भूमिका वैश्विक आर्थिक चर्चाओं में अहम हो सकती है।
क्या है CBAM और क्यों अहम है?
कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म यानी CBAM को ऐसे नियम के तौर पर समझा जा सकता है, जिसमें किसी उत्पाद के निर्माण के दौरान हुए कार्बन उत्सर्जन को ध्यान में रखकर आयात पर अतिरिक्त शुल्क लगाया जाता है। यानी किसी सामान को तैयार करने में जितना ज्यादा कार्बन उत्सर्जन हुआ होगा, दूसरे देश के बाजार में पहुंचने पर उसकी लागत उतनी ही बढ़ सकती है। इस व्यवस्था का मकसद सिर्फ व्यापार से जुड़ा शुल्क लगाना नहीं, बल्कि कंपनियों और देशों को कम कार्बन उत्सर्जन वाली उत्पादन प्रक्रिया अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना भी है। हालांकि, विकासशील देशों के लिए यह व्यवस्था चुनौती बन सकती है, क्योंकि कई उद्योगों को कम उत्सर्जन वाली तकनीक अपनाने के लिए बड़े निवेश की जरूरत होगी। यूरोपीय संघ और ब्रिटेन पहले ही कार्बन उत्सर्जन से जुड़े ऐसे नियमों को लेकर अपनी योजनाएं सामने रख चुके हैं। इन बाजारों में निर्यात करने वाली कंपनियों के लिए इसका मतलब यह हो सकता है कि भविष्य में केवल उत्पाद की कीमत और गुणवत्ता ही महत्वपूर्ण नहीं होगी, बल्कि उसके उत्पादन के दौरान हुए कार्बन उत्सर्जन का रिकॉर्ड भी कारोबार को प्रभावित कर सकता है। BRICS देशों का इस तरह के एकतरफा कार्बन उपायों पर विरोध भारत जैसे देशों के लिए खास मायने रखता है। भारत समेत कई विकासशील देश यूरोप और अन्य बड़े बाजारों में स्टील, एल्युमिनियम, सीमेंट और दूसरे औद्योगिक उत्पादों का निर्यात करते हैं। ऐसे में कार्बन से जुड़ी अतिरिक्त लागत बढ़ने पर निर्यातकों की प्रतिस्पर्धा और मुनाफे पर असर पड़ सकता है। यही वजह है कि BRICS देश जलवायु संरक्षण के साथ-साथ निष्पक्ष और संतुलित वैश्विक व्यापार की जरूरत पर जोर दे रहे हैं।

कार्बन टैक्स पर BRICS का स्टैंड
नई दिल्ली डिक्लेरेशन में BRICS देशों के नेताओं ने कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म यानी CBAM जैसे उपायों को लेकर अपनी चिंता जाहिर की है। नेताओं ने कहा कि ऐसे कदम एकतरफा तरीके से लागू किए जाने वाले, दंडात्मक या भेदभावपूर्ण नहीं होने चाहिए। उनका मानना है कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार से जुड़े किसी भी उपाय को वैश्विक नियमों और अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप होना जरूरी है। कार्बन उत्सर्जन कम करने के उद्देश्य से बनाई गई नीतियां अगर किसी देश पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव डालती हैं, तो उनका असर केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहता। खासकर विकासशील देशों के लिए ऐसी व्यवस्था आर्थिक चुनौतियां बढ़ा सकती है। इन देशों को पहले से ही जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए संसाधनों और तकनीक की जरूरत है। नेताओं ने यह भी चिंता जताई कि ऐसे व्यापारिक उपाय विकासशील देशों की जलवायु परिवर्तन के खिलाफ तैयारी को कमजोर कर सकते हैं। अगर निर्यात पर अतिरिक्त लागत और दबाव बढ़ता है, तो देशों के पास जलवायु अनुकूलन से जुड़े कामों के लिए उपलब्ध संसाधन प्रभावित हो सकते हैं। इससे बाढ़, सूखा, गर्मी और दूसरी जलवायु संबंधी चुनौतियों से निपटने की उनकी क्षमता पर असर पड़ने की आशंका है। जलवायु परिवर्तन से निपटने की जिम्मेदारी साझा है, इसलिए नीतियां बनाते समय सभी देशों की आर्थिक और विकास संबंधी परिस्थितियों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। विकासशील देशों को अपनी अर्थव्यवस्था मजबूत करने के साथ-साथ भविष्य के जलवायु जोखिमों से निपटने के लिए पर्याप्त अवसर और संसाधन मिलना जरूरी है। इसी वजह से BRICS ने जलवायु कार्रवाई और वैश्विक व्यापार के बीच संतुलन बनाए रखने पर जोर दिया है।
IPR और AI पर भी बढ़ेगा सहयोग
BRICS देशों ने बौद्धिक संपदा अधिकारों यानी Intellectual Property Rights के क्षेत्र में आपसी सहयोग को मजबूत करने पर सहमति जताई है। इसका उद्देश्य पेटेंट से जुड़ी प्रक्रियाओं को बेहतर बनाने के साथ-साथ पारंपरिक ज्ञान और भौगोलिक संकेतकों जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में मिलकर काम करना है। इसके अलावा बौद्धिक संपदा को कारोबार और नवाचार से जोड़ने पर भी जोर दिया गया है। डिक्लेरेशन में डिजिटल दौर में बौद्धिक संपदा अधिकारों की सुरक्षा को बेहद जरूरी बताया गया है। तकनीक तेजी से बदल रही है और इंटरनेट के जरिए किसी भी तरह की सामग्री आसानी से अलग-अलग देशों तक पहुंच सकती है। ऐसे में किसी व्यक्ति, संस्था या कंपनी की बौद्धिक संपदा का इस्तेमाल उसकी अनुमति और अधिकारों का सम्मान करते हुए किया जाए, इस पर BRICS देशों ने ध्यान देने की बात कही है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI के बढ़ते इस्तेमाल के बीच इस मुद्दे की अहमियत और बढ़ गई है। AI मॉडल को तैयार करने और ट्रेनिंग देने के लिए बड़ी मात्रा में सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे में यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि ट्रेनिंग में इस्तेमाल होने वाली सामग्री के असली मालिकों के अधिकारों की रक्षा किस तरह की जाए। BRICS देशों ने इस क्षेत्र में सहयोग और नियमों को लेकर चर्चा की जरूरत पर जोर दिया है। साथ ही BRICS देशों ने यह भी स्पष्ट किया है कि नई तकनीक और बौद्धिक संपदा से जुड़े नियम बनाते समय विकासशील देशों की जरूरतों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। डिजिटल अर्थव्यवस्था में सभी देशों को समान अवसर मिलें और नई तकनीक का फायदा व्यापक स्तर पर पहुंच सके, इसके लिए संतुलित व्यवस्था जरूरी है। पेटेंट, पारंपरिक ज्ञान, भौगोलिक संकेतक और AI जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की पहल इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
AI के बढ़ते इस्तेमाल से जुड़े जोखिम
BRICS नेताओं ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल के साथ सामने आ रही चुनौतियों पर भी चिंता जाहिर की है। नेताओं का मानना है कि AI तकनीक का इस्तेमाल अगर सही तरीके से न किया जाए, तो इससे किसी देश या समुदाय की पहचान, ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत को नुकसान पहुंच सकता है। खासतौर पर स्थानीय परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों को गलत संदर्भ में पेश किए जाने का खतरा बढ़ सकता है। AI के जरिए किसी समाज के पारंपरिक ज्ञान और सांस्कृतिक सामग्री को बिना सही संदर्भ या अनुमति के इस्तेमाल किए जाने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसी स्थिति में किसी समुदाय की विरासत को गलत तरीके से प्रस्तुत किया जा सकता है। इसलिए AI के विकास के साथ सांस्कृतिक विविधता और अलग-अलग समाजों की पहचान को सुरक्षित रखना भी जरूरी है। BRICS देशों ने AI मॉडल की ट्रेनिंग के लिए इस्तेमाल होने वाले डेटा को लेकर भी एक अहम सवाल उठाया है। मौजूदा डेटा सेट में दुनिया के सभी देशों, भाषाओं और संस्कृतियों का प्रतिनिधित्व बराबर नहीं है। कई क्षेत्रों से जुड़ी जानकारी सीमित मात्रा में उपलब्ध होने के कारण AI सिस्टम कुछ विषयों पर अधूरी या एकतरफा जानकारी के आधार पर जवाब दे सकते हैं। इस तरह डेटा में मौजूद कमी का असर AI से मिलने वाले परिणामों पर भी पड़ सकता है। अगर किसी देश या समुदाय की भाषा, इतिहास और संस्कृति से जुड़ी पर्याप्त सामग्री AI मॉडल में शामिल नहीं होगी, तो उस समाज से जुड़े सवालों पर परिणाम उतने सटीक नहीं हो सकते। BRICS नेताओं ने संकेत दिया है कि AI के विकास में अलग-अलग देशों और संस्कृतियों का संतुलित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना जरूरी है, ताकि यह तकनीक ज्यादा निष्पक्ष और समावेशी तरीके से काम कर सके।
ग्लोबल वैल्यू चेन की मजबूती पर जोर
BRICS देशों ने वैश्विक सप्लाई सिस्टम को मजबूत और ज्यादा भरोसेमंद बनाने के लिए ग्लोबल वैल्यू चेन यानी GVCs पर खास ध्यान देने की बात कही है। ग्लोबल वैल्यू चेन का मतलब उस पूरी प्रक्रिया से है, जिसमें किसी उत्पाद के लिए कच्चा माल जुटाने से लेकर उसका निर्माण, अलग-अलग जगहों तक पहुंचाना और आखिर में उसे बाजार में बेचने तक कई देश और कंपनियां शामिल होती हैं। इस पूरी व्यवस्था को मजबूत करने के लिए सदस्य देशों के बीच तकनीकी सहयोग बढ़ाना जरूरी है। इसके साथ ही व्यापार से जुड़ी प्रक्रियाओं को आसान बनाने, परिवहन और अन्य जरूरी बुनियादी ढांचे को बेहतर करने तथा औद्योगिक उत्पादन की क्षमता बढ़ाने पर भी काम करने की जरूरत बताई गई है। इससे कारोबार को ज्यादा सुचारू बनाने में मदद मिल सकती है। देशों के बीच बेहतर कनेक्टिविटी को भी इस पहल का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है। बेहतर परिवहन और व्यापारिक संपर्क से सामान और संसाधनों की आवाजाही आसान हो सकती है। इसके अलावा बौद्धिक संपदा की सुरक्षा और नई तकनीकों तक सुरक्षित व किफायती पहुंच को लेकर भी BRICS देशों ने सहयोग बढ़ाने की जरूरत बताई है, ताकि तकनीकी विकास का लाभ ज्यादा व्यापक स्तर पर पहुंच सके। BRICS देशों ने आपसी व्यापार को बढ़ावा देने के लिए नए विकल्पों और नीतियों पर भी विचार करने पर सहमति जताई है। इसका उद्देश्य सदस्य देशों के बीच आर्थिक संबंधों को और मजबूत करना है। अगर व्यापारिक प्रक्रियाएं आसान होती हैं, कनेक्टिविटी बेहतर होती है और तकनीक तक पहुंच बढ़ती है, तो इससे BRICS देशों के कारोबार और औद्योगिक सहयोग को आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
SEZS को सहयोग का जरिया बनाएंगे
BRICS देशों ने स्पेशल इकोनॉमिक जोन यानी SEZs को आर्थिक गतिविधियों के लिए महत्वपूर्ण केंद्र के तौर पर विकसित करने पर जोर दिया है। घोषणा में कहा गया कि इन क्षेत्रों का इस्तेमाल व्यापार, निवेश, औद्योगिक सहयोग और नई तकनीक को बढ़ावा देने के लिए किया जा सकता है। इससे सदस्य देशों के बीच कारोबारी रिश्तों को मजबूत करने में मदद मिलने की उम्मीद है। SEZs में कंपनियों के लिए ऐसा माहौल तैयार किया जाना चाहिए, जहां कारोबार शुरू करना और उसे आगे बढ़ाना आसान हो। बेहतर बुनियादी सुविधाएं, सरल नियम और निवेश के अनुकूल व्यवस्था होने से घरेलू और विदेशी कंपनियों को आकर्षित किया जा सकता है। इससे उद्योगों के विस्तार के साथ रोजगार और उत्पादन के नए अवसर भी बन सकते हैं। घोषणा में ग्लोबल वैल्यू चेन यानी GVCs को मजबूत करने के लिए पहले से तय साझा कार्ययोजना को आगे बढ़ाने का भी समर्थन किया गया है। इसका मकसद BRICS देशों को उत्पादन और सप्लाई से जुड़ी वैश्विक व्यवस्था में ज्यादा मजबूती से जोड़ना है। इसके लिए अलग-अलग देशों के बीच औद्योगिक और तकनीकी सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। BRICS देशों ने 2026 से 2030 की अवधि के लिए GVC कार्य योजना को आगे बढ़ाने का समर्थन किया है। आने वाले वर्षों में इस योजना के जरिए सदस्य देशों के बीच व्यापारिक संपर्क, औद्योगिक साझेदारी और निवेश के अवसरों को बढ़ाने की कोशिश की जाएगी। SEZs को इस पूरी प्रक्रिया का अहम हिस्सा माना जा रहा है, जिससे BRICS देशों के बीच आर्थिक सहयो
BRICS देशों का कार्बन टैक्स पर कड़ा रुख, CBAM को बताया एकतरफा और भेदभावपूर्ण
BRICS देशों ने जलवायु परिवर्तन और अंतरराष्ट्रीय कारोबार के बीच संतुलन को लेकर अपनी चिंता सामने रखी है। समूह ने कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म यानी CBAM जैसे उपायों पर सवाल उठाते हुए कहा कि इनका असर विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। खासतौर पर उन देशों के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं, जो बड़े पैमाने पर औद्योगिक सामान का निर्यात करते हैं। पर्यावरण की सुरक्षा के लिए उठाए जाने वाले कदमों का उद्देश्य जलवायु परिवर्तन से निपटना होना चाहिए, न कि दूसरे देशों के व्यापार पर अतिरिक्त दबाव डालना। अगर कार्बन से जुड़े नियमों के कारण निर्यात की लागत बढ़ती है, तो इससे विकासशील देशों के उद्योगों की प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो सकती है और उनके लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कारोबार करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। समूह के नेताओं ने ऐसे उपायों का विरोध किया है, जिन्हें एकतरफा, दंडात्मक या भेदभावपूर्ण माना जा सकता है। उनका कहना है कि वैश्विक जलवायु नीति तैयार करते समय अलग-अलग देशों की आर्थिक स्थिति और उनकी जरूरतों को ध्यान में रखना जरूरी है। सभी देशों की तकनीकी और वित्तीय क्षमता समान नहीं है, इसलिए एक जैसे नियमों का असर भी हर देश पर अलग-अलग पड़ सकता है। BRICS देशों ने इस बात पर जोर दिया है कि जलवायु कार्रवाई और वैश्विक व्यापार के बीच ऐसा संतुलन होना चाहिए, जिससे विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की प्रगति प्रभावित न हो। जलवायु परिवर्तन से निपटने की कोशिश सामूहिक और निष्पक्ष तरीके से होनी चाहिए। इसी वजह से BRICS देश ऐसे व्यापारिक उपायों पर अपनी आपत्ति जता रहे हैं, जिनसे विकासशील देशों के निर्यात और आर्थिक विकास पर अतिरिक्त बोझ पड़ने की आशंका है।
क्या होता है CBAM?
कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म यानी CBAM को सरल तरीके से समझें तो यह ऐसी व्यवस्था है, जिसमें किसी सामान को तैयार करने के दौरान होने वाले कार्बन उत्सर्जन को भी उसकी आयात लागत से जोड़ा जाता है। यानी किसी उत्पाद के निर्माण में जितना ज्यादा कार्बन उत्सर्जन होगा, दूसरे देश के बाजार में पहुंचने पर उस पर अतिरिक्त शुल्क या लागत का असर पड़ सकता है। इस व्यवस्था का सबसे ज्यादा असर उन उद्योगों पर पड़ने की संभावना है, जिनकी उत्पादन प्रक्रिया में कार्बन उत्सर्जन अधिक होता है। स्टील, सीमेंट, उर्वरक और एल्युमिनियम जैसे सेक्टर इस दायरे में आते हैं। इन उद्योगों के लिए उत्पादन के साथ-साथ उत्सर्जन कम करने की चुनौती भी बढ़ सकती है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में पर्यावरण से जुड़े नियम लगातार सख्त हो रहे हैं। ऐसे देशों के लिए यह मुद्दा ज्यादा महत्वपूर्ण है, जो इन औद्योगिक उत्पादों का बड़े स्तर पर निर्यात करते हैं। अगर किसी बाजार में इन सामानों पर अतिरिक्त कार्बन लागत जुड़ती है, तो निर्यातकों के लिए उत्पाद की कुल कीमत बढ़ सकती है। इससे उन्हें दूसरे देशों की कंपनियों के मुकाबले प्रतिस्पर्धा बनाए रखने में मुश्किल आ सकती है और कारोबार की रणनीति पर भी इसका असर पड़ सकता है। विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए चुनौती इसलिए भी बड़ी है क्योंकि कम कार्बन वाली तकनीक अपनाने के लिए भारी निवेश की जरूरत होती है। कंपनियों को उत्पादन प्रक्रिया में बदलाव, नई तकनीक और ऊर्जा के वैकल्पिक साधनों पर खर्च करना पड़ सकता है। ऐसे में CBAM सिर्फ पर्यावरण से जुड़ा विषय नहीं रह जाता, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय व्यापार, उद्योगों की प्रतिस्पर्धा और निर्यात की लागत से भी सीधे जुड़ जाता है।
भारत जैसे देशों के लिए क्यों अहम है मामला?
BRICS देशों की ओर से कार्बन से जुड़े व्यापारिक नियमों पर जताई गई चिंता भारत के लिए भी काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। भारत की कई कंपनियां स्टील, एल्युमिनियम, सीमेंट और दूसरे औद्योगिक उत्पादों का निर्यात यूरोप समेत कई बड़े अंतरराष्ट्रीय बाजारों में करती हैं। ऐसे में अगर कार्बन उत्सर्जन के आधार पर अतिरिक्त शुल्क लगाया जाता है, तो इसका सीधा असर निर्यात कारोबार पर पड़ सकता है। कार्बन से जुड़ी अतिरिक्त लागत बढ़ने पर कंपनियों के लिए अपने उत्पादों की कीमत को प्रतिस्पर्धी बनाए रखना आसान नहीं होगा। एक तरफ उन्हें उत्पादन की लागत संभालनी होगी और दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय बाजार में दूसरी कंपनियों से मुकाबला भी करना होगा। ऐसे में भारतीय निर्यातकों को नई तकनीक अपनाने और उत्पादन प्रक्रिया में बदलाव करने की जरूरत बढ़ सकती है। जलवायु परिवर्तन से निपटना पूरी दुनिया की साझा जिम्मेदारी है, लेकिन BRICS देशों का कहना है कि इसके लिए नियम बनाते समय विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की वास्तविक स्थिति को भी समझना जरूरी है। हर देश के पास नई और कम कार्बन वाली तकनीक में निवेश करने के लिए समान संसाधन नहीं हैं। इसलिए जलवायु नीति ऐसी होनी चाहिए, जिससे पर्यावरणीय लक्ष्यों के साथ आर्थिक विकास भी प्रभावित न हो। BRICS देशों ने यह चिंता भी जताई है कि अगर जलवायु के नाम पर व्यापार से जुड़े अतिरिक्त प्रतिबंध बढ़ते हैं, तो विकासशील देशों के पास अपनी जलवायु संबंधी चुनौतियों से निपटने के लिए उपलब्ध संसाधन कम हो सकते हैं। इससे बाढ़, सूखा, गर्मी और अन्य जलवायु जोखिमों के खिलाफ उनकी तैयारी प्रभावित हो सकती है। इसी वजह से समूह ऐसी नीतियों पर जोर दे रहा है, जिनमें पर्यावरण संरक्षण के साथ विकासशील देशों की आर्थिक जरूरतों और जलवायु अनुकूलन क्षमता का भी ध्यान रखा जाए।
नई दिल्ली डिक्लेरेशन में क्या कहा गया?
नई दिल्ली डिक्लेरेशन में BRICS देशों ने कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म यानी CBAM जैसे उपायों को लेकर अपनी चिंता स्पष्ट की है। समूह के नेताओं ने कहा कि ऐसे नियमों को एकतरफा तरीके से लागू नहीं किया जाना चाहिए। खास तौर पर उन कदमों पर आपत्ति जताई गई है, जो दूसरे देशों के लिए दंडात्मक, भेदभावपूर्ण या संरक्षणवादी स्थिति पैदा कर सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय व्यापार से जुड़े नियम किसी एक देश के फैसले पर आधारित होने के बजाय आपसी बातचीत और व्यापक सहयोग से तय किए जाने चाहिए। जलवायु परिवर्तन से निपटना जरूरी है, लेकिन इसके लिए बनाई जाने वाली नीतियों का असर वैश्विक व्यापार और अलग-अलग देशों की आर्थिक स्थिति पर भी देखा जाना चाहिए। विकासशील देशों के सामने इस समय दोहरी चुनौती है। उन्हें एक तरफ बाढ़, सूखा, बढ़ते तापमान और अन्य जलवायु जोखिमों से निपटने के लिए बड़े स्तर पर संसाधनों की जरूरत है। दूसरी तरफ, अगर नए पर्यावरणीय व्यापार नियमों के कारण उनके निर्यात पर अतिरिक्त लागत बढ़ती है, तो उनकी अर्थव्यवस्था और उद्योगों पर दबाव और बढ़ सकता है। इसी वजह से BRICS देशों ने ऐसी व्यवस्था की जरूरत पर जोर दिया है, जिसमें जलवायु संरक्षण और आर्थिक विकास दोनों को साथ लेकर चला जाए। समूह का मानना है कि विकासशील देशों की परिस्थितियों को ध्यान में रखे बिना बनाए गए नियम उनके लिए नई मुश्किलें पैदा कर सकते हैं। इसलिए जलवायु नीति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के बीच संतुलन बनाते हुए ज्यादा न्यायसंगत और सहयोग आधारित व्यवस्था तैयार करने की जरूरत है।
AI और बौद्धिक संपदा पर भी सहयोग
BRICS बैठक में जलवायु से जुड़े मुद्दों के साथ-साथ बौद्धिक संपदा अधिकार और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI भी चर्चा के प्रमुख विषय रहे। सदस्य देशों ने माना कि तकनीक के तेजी से बदलते दौर में पेटेंट, कॉपीराइट और दूसरे बौद्धिक अधिकारों से जुड़े नियमों को लेकर आपसी सहयोग बढ़ाना जरूरी है। इसी दिशा में कई अहम क्षेत्रों में मिलकर काम करने पर सहमति बनी। बैठक में पेटेंट व्यवस्था के अलावा पारंपरिक ज्ञान और भौगोलिक संकेतकों को सुरक्षित रखने पर भी ध्यान दिया गया। साथ ही बौद्धिक संपदा का कारोबारी इस्तेमाल बढ़ाने और इससे जुड़े अवसरों को बेहतर तरीके से विकसित करने की जरूरत बताई गई। इससे BRICS देशों के बीच नवाचार और व्यापार को बढ़ावा देने में मदद मिल सकती है। AI के बढ़ते इस्तेमाल के साथ कॉपीराइट और कंटेंट के अधिकारों से जुड़े सवाल भी लगातार सामने आ रहे हैं। AI सिस्टम को तैयार करने और उनकी ट्रेनिंग में बड़ी मात्रा में सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे में यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि जिस सामग्री का इस्तेमाल किया जा रहा है, उसके रचनाकारों और मालिकों के अधिकार सुरक्षित रहें। BRICS देशों ने AI के विकास के साथ इन पहलुओं पर भी ध्यान देने की जरूरत बताई है। सदस्य देशों ने यह भी माना कि AI और बौद्धिक संपदा से जुड़े अंतरराष्ट्रीय नियम बनाते समय विकासशील देशों की जरूरतों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। तकनीकी क्षमता और संसाधनों के मामले में सभी देशों की स्थिति समान नहीं है। इसलिए ऐसी नीतियों की जरूरत है, जो नवाचार को बढ़ावा देने के साथ विकासशील देशों को तकनीक और डिजिटल अर्थव्यवस्था में आगे बढ़ने के लिए उचित अवसर भी उपलब्ध कराएं।









