आसाराम को बड़ा झटका: राजस्थान हाई कोर्ट ने उम्रकैद की सजा बरकरार रखी, अब करना होगा सरेंडर
राजस्थान हाई कोर्ट की जोधपुर बेंच ने बुधवार को नाबालिग छात्रा से यौन उत्पीड़न मामले में स्वयंभू धर्मगुरु Asaram Bapu को बड़ा झटका देते हुए उनकी उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है। अदालत ने इस मामले में सह-आरोपी शिल्पी और शरतचंद को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया।
यह फैसला जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित की खंडपीठ ने सुनाया। हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद अब आसाराम को दोबारा सरेंडर करना होगा। फिलहाल वह अंतरिम मेडिकल बेल पर जेल से बाहर चल रहे हैं।
2013 में हुई थी गिरफ्तारी
मामला अगस्त 2013 का है, जब जोधपुर स्थित आश्रम में एक नाबालिग छात्रा ने आसाराम पर यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोप लगाए थे। शिकायत के बाद देशभर में भारी विवाद खड़ा हो गया था और पुलिस ने आसाराम को गिरफ्तार कर लिया था।
करीब पांच साल तक चले ट्रायल के बाद 25 अप्रैल 2018 को विशेष पॉक्सो अदालत ने आसाराम को दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसके बाद उन्होंने हाई कोर्ट में फैसले को चुनौती दी थी।
अब राजस्थान हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए सजा बरकरार रखी है।
बचाव पक्ष ने कहा- मामला झूठा, बयानों में विरोधाभास
हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान आसाराम के वकीलों ने दावा किया कि यह मामला झूठा और राजनीतिक रूप से प्रेरित है। बचाव पक्ष ने कहा कि:
- पीड़िता और उसके माता-पिता के बयानों में विरोधाभास हैं,
- घटना वाली रात का कोई कॉल रिकॉर्ड मौजूद नहीं है,
- और जब अन्य आरोपियों को बरी किया गया है तो आसाराम को भी राहत मिलनी चाहिए।
बचाव पक्ष ने अदालत से सजा रद्द करने की मांग की थी।
अभियोजन पक्ष ने पॉक्सो कानून का हवाला दिया
वहीं अभियोजन पक्ष और पीड़िता के वकील पी.सी. सोलंकी ने अदालत में दलील दी कि पॉक्सो कानून के तहत पीड़िता का बयान ही दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हो सकता है।
उन्होंने अदालत को बताया कि:
“सुप्रीम कोर्ट भी कई मामलों में यह स्पष्ट कर चुका है कि अगर पीड़िता का बयान विश्वसनीय हो, तो वही सजा के लिए पर्याप्त आधार बन सकता है।”
अभियोजन पक्ष ने यह भी कहा कि मामले के दौरान गवाहों पर हमले और कुछ हत्याएं यह दिखाती हैं कि केस को प्रभावित करने की कोशिश की गई।
गवाहों पर हमलों का मुद्दा भी उठा
इस केस के दौरान कई बार गवाहों की सुरक्षा को लेकर सवाल उठे थे। अभियोजन पक्ष ने अदालत में कहा कि:
- गवाहों को डराने की कोशिश हुई,
- कुछ लोगों पर हमले हुए,
- और इससे साफ होता है कि सबूतों को प्रभावित करने का प्रयास किया गया।
यही वजह रही कि यह मामला लंबे समय तक देशभर में चर्चा का विषय बना रहा।
पहले से दूसरी उम्रकैद भी काट रहे हैं आसाराम
आसाराम पहले से ही गुजरात के गांधीनगर आश्रम में महिला अनुयायी से यौन उत्पीड़न मामले में भी उम्रकैद की सजा काट रहे हैं। जनवरी 2023 में गुजरात की अदालत ने उन्हें दोषी ठहराया था।
यानी अब उनके खिलाफ दो अलग-अलग मामलों में उम्रकैद की सजा बरकरार है।
मेडिकल बेल पर थे बाहर
86 वर्षीय आसाराम ने बढ़ती उम्र और खराब स्वास्थ्य का हवाला देते हुए कई बार जमानत की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर उन्हें अंतरिम मेडिकल बेल दी गई थी, जिसे बाद में कई बार बढ़ाया गया।
लेकिन अब राजस्थान हाई कोर्ट के ताजा फैसले के बाद उन्हें फिर से संबंधित अधिकारियों के सामने सरेंडर करना होगा।
देशभर में फिर चर्चा में आया मामला
हाई कोर्ट के फैसले के बाद यह मामला एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा में आ गया है। सोशल मीडिया पर लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।
कुछ लोग फैसले को न्याय की जीत बता रहे हैं, जबकि आसाराम के समर्थक इसे गलत करार दे रहे हैं।
हालांकि अदालत ने साफ कर दिया है कि उपलब्ध सबूतों और पीड़िता के बयान के आधार पर दोष सिद्ध होता है और सजा बरकरार रहेगी।
क्या आगे सुप्रीम कोर्ट जाएंगे आसाराम?
अब नजर इस बात पर है कि क्या आसाराम इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे। कानूनी जानकारों का मानना है कि बचाव पक्ष के पास अब सर्वोच्च अदालत का रास्ता खुला है।
लेकिन फिलहाल राजस्थान हाई कोर्ट के फैसले ने यह साफ कर दिया है कि:
निचली अदालत द्वारा दी गई उम्रकैद की सजा वैध और उचित मानी गई है।
यह फैसला ऐसे मामलों में पीड़ितों की गवाही और पॉक्सो कानून की ताकत को लेकर भी अहम माना जा रहा है।










