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धर्मांतरण के बाद अंतिम संस्कार विवाद परिवार का दर्द और सामाजिक टकराव

ब्लैकबोर्ड-अंतिम संस्कार हुआ तो पत्नी-बच्चों का ध्यान रखना: सरपंच ने गाली दी, बोला- बाप की लाश नाले में डाल दो, अब तुम हिंदू नहीं रहे। 7 जनवरी 2025। सुबह के 10 बज चुके थे। पापा की किडनी फेल होने के कारण उनका निधन हो गया था। मां को देखकर वह बिलखने लगीं। शव को बरामदे में रखते ही शोर मच गया। सभी रिश्तेदार घर आने लगे। सब कहने लगे- अंतिम संस्कार की तैयारी शुरू करो। जब तक लाश दरवाजे पर रहेगी, सब लोग रोते रहेंगे। हम लोग अर्थी सजा रहे थे, तभी गांव के लोग और सरपंच आए। उनके साथ थानेदार और तहसीलदार भी थे। कुछ देर तक शव को देखते रहे, फिर कड़क आवाज में बोले- ‘देखो, तुम अपने बाप का शव गांव के कब्रिस्तान में दफना नहीं सकते। वहां केवल दलित हिंदू ही शव दफना सकते हैं। तुमने धर्म बदल लिया है। इसलिए गांव के बाहर दफनाना होगा। तुमने महार जाति के खिलाफ जाकर ईसाई धर्म अपनाया है। इसलिए शव को गांव के बाहर दफनाओ।’ खाट पर बैठे रमेश बघेल अपने पिता की मौत का दिन याद करते हुए यह कहानी बताते हैं।

स्याह कहानियों की सीरीज ब्लैकबोर्ड में आज ऐसे परिवारों का वर्णन है, जिन्होंने ईसाई धर्म स्वीकारा तो गांव के लोगों ने इसका विरोध किया। परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु होने पर उसके शव को ईसाई रीति से दफनाने से रोक दिया गया। छत्तीसगढ़ के जगदलपुर से लगभग 60 किलोमीटर दूर छिंदावाड़ा गांव में। रास्ते में कई स्थानों पर ईंट से बनी कब्रें दृश्य में आती हैं। गांव पहुंचते ही मेरी मुलाकात 42 वर्षीय रमेश बघेल से हुई। ‘उस दिन हम सब पापा की लाश के पास बैठकर विलाप कर रहे थे। अचानक सरपंच और गांव के लोग बोलने लगे- लाश को गांव की सीमा से बाहर दफनाओ या किसी नाली या गंदगी में डाल दो। तुम लोगों ने महार जाति के खिलाफ जाकर ईसाई धर्म को अपनाया है, इसलिए लाश यहां दफन नहीं कर सकते।’ सोचने लगा कि लोग तो कुत्ते-बिल्ली को भी मृत्यु के बाद अपनी भूमि में दफनाते हैं। मुझसे पापा की लाश नाली में फेंकने को कहा गया, जबकि पापा तो 13 एकड़ ज़मीन के मालिक थे। मरने के बाद उन्हें दो गज भूमि भी न दे सका। ‘उनकी बातों को सुनकर मैं लोगों से विनती करने लगा। मैंने कहा कि मैं सिर्फ मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं रखता, इसीलिए मैं ईसा मसीह को मानता हूं। मैंने घर में बनी चर्च में भी ईसा मसीह की मूर्ति नहीं लगाई है। मैं निश्चित रूप से ईसाई नहीं हूं। मेरे पिता को कब्रिस्तान में स्थान मिलना चाहिए। उस व्यक्ति को, जो इस गांव में जन्मा और बड़ा हुआ, मरने के बाद गांव की मिट्टी प्राप्त होनी चाहिए। क्या तुमने हमसे पूछकर धर्म परिवर्तित किया था? कोई भी स्थिति में तुम्हें इस लाश को गांव में दफनाने की अनुमति नहीं मिलेगी। न केवल तुम, तुम्हारे पिता भी ईसाई धर्म के अनुयायी थे।

ईसाइयों के शमशान यदि हों, तो शव ले जाओ वहां

यह सुनते ही मैं जोर-जोर से रोने लगा। फिर से हाथ जोड़कर मैंने कहा- यदि गांव के कब्रिस्तान में नहीं दफ्ना सकता, तो अपनी ज़मीन में दफनाऊंगा। पापा ने काफी मेहनत करके 13 एकड़ ज़मीन खरीदी थी। अपने भाइयों से बोला कि पापा की ताबूत तैयार करो। सरपंच और अन्य लोग फिर से नाराज हो गए। पंचायत ने यह तय किया है कि तुम अपनी जमीन पर भी शव नहीं दफ्ना सकते। पंचायत के फैसले को तुम्हें स्वीकार करना होगा। हमने एक साल पहले ही यह तय कर लिया था कि अब से ईसाई समुदाय के लोगों को गांव के कब्रिस्तान में शव नहीं दफनाने देंगे। केवल दलित हिंदू ही यहां शव दफना सकते हैं। अगर तुम गांव वालों के खिलाफ जाकर शव दफनाते हो, तो बीवी-बच्चों का खयाल रखना। यह कहते हुए रमेश की आंखें नम हो गईं। खुद को संभालते हुए वो बोले- उस समय मुझे महसूस हुआ कि मैं सच में अनाथ हूं। ‘ देखता हूं, तुम लोग कैसे पापा की लाश को दफनाने नहीं दोगे। मामले को अदालत में ले जाऊंगा। जब तक न्याय नहीं मिलेगा, पापा की लाश नहीं दफनाऊंगा।

अभी के लिए, मृत शरीर को जगदलपुर पोस्टमॉर्टम हाउस ले जाना आवश्यक है।

उधर, पुलिस पापा का शव पोस्टमॉर्टम हाउस ले गई और मैं रोते हुए फौरन बिलासपुर हाईकोर्ट के लिए चल पड़ा। रमेश बघेल के पिता की लाश को दफनाने से रोकना यह पहला मामला नहीं था। गांव में कई ईसाई परिवारों को शव को दफनाने से रोका गया था। रमेश ने बिलासपुर पहुंचकर एक वकील की मदद से हाईकोर्ट में याचिका दायर की। ‘ईसाई धर्म के अनुयायियों के अंतिम संस्कार के लिए पहले से कब्रिस्तान तैयार हैं। उन्हें वहीं ले जाना पड़ेगा। गांव में दफनाने का फैसला लेने से माहौल बिगड़ जाएगा।’ अदालत के निर्णय से मुझे गहरी निराशा हुई। फिर मैंने दिल्ली के लिए उड़ान भरी और सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।’

‘उच्चतम न्यायालय ने राज्य सरकार को सूचना जारी की। यह अत्यंत दुखद है कि एक बेटे को अपने पिता के शव को दफनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का सहारा लेना पड़ा। 4 महीने के भीतर राज्य सरकार अपनी रिपोर्ट पेश करे। सरकार को ईसाई समुदाय के लिए विशेष कब्रिस्तान की व्यवस्था करनी चाहिए। ‘है ना! यह एक बड़ी तस्वीर है, लेकिन एक बक्से में बंद है। जब मैं उनकी तस्वीर देखता हूं, तो ये सभी यादें ताजा हो जाती हैं। मां भी उस तस्वीर को देखकर आंसू बहाने लगती हैं। अभी रुकिए, मैं इसे दिखाता हूं। रमेश अपने घर से अपने पिता सुरेश बघेल, जो एक ईसाई प्रचारक हैं, की एक बड़ी तस्वीर निकालकर लाते हैं। उनकी नजरें बार-बार उस तस्वीर पर टिक जाती हैं। जैसे वह रोने को रोकने की कोशिश कर रहे हों। ‘पापा का शव 22 दिन तक जगदलपुर पोस्टमॉर्टम हाउस में रहा। जब सुप्रीम कोर्ट से भी न्याय नहीं मिला, तो उन्हें जगदलपुर के ईसाई कब्रिस्तान में दफन किया गया। मैं गांव नहीं ला सका, जिसका मुझे हमेशा अफसोस रहेगा। उन 22 दिनों तक घर में चूल्हा नहीं जला। शव का अंतिम संस्कार किए बिना चूल्हा कैसे जलाया जा सकता था? हमारे पड़ोसी हमें भोजन परोस रहे थे।

केस लड़ने में हमारे लाख-दो लाख खर्च हो गए, लेकिन पिता की शव को न्याय दिलाने की लागत गिनना अच्छा नहीं लग रहा। वह सब याद करके मैं रो देता हूं। अब एक साल बीत चुका है। दिसंबर 2024 की बात है। पिता को हाई लेवल डायबिटीज थी। उनकी तबीयत लगातार बिगड़ती जा रही थी। करीब एक हफ्ते तक उन्हें जगदलपुर के अस्पताल में भर्ती रखा गया। 24 तारीख को अस्पताल से डिस्चार्ज होकर घर आए थे। वह एकदम ठीक लग रहे थे। इसके 14 दिन बाद यानी 7 जनवरी 2025 की बात है। सुबह के 8 बजे थे। पत्नी ने नाश्ते में दलिया बनाया था। वह कहने लगीं- बाबूजी, अभी तक सोकर नहीं उठे हैं, रोज तो जल्दी उठ जाते थे। मैंने मां से पिताजी को जगाने के लिए कहा। मां ने आवाज दी, हिला-डुलाया। जब उन्हें नहीं जगाया गया तो वह रोने लगीं। पापा की मृत्यु हो चुकी थी। इस बातचीत के दौरान सामने एक अलग तरह का सफेद रंग का मकान नजर आ रहा है। बार-बार मेरी नजर उस पर जा रही है। रमेश कहते हैं- ‘यही मेरा चर्च है। पिताजी ने 1994 में बनवाया था। वह भी ईसा मसीह को मानते थे। दरअसल, मेरे घर में अक्सर लोगों पर देवी-देवता सवार हो जाते थे। झाड़-फूंक चलती रहती थी।’

हमारी पड़ोसन ने जादू किया है। तुम्हारे परिवार पर भूत व्रत लगा दिया है। इससे कई बार पड़ोसियों के साथ झगड़े और लड़ाई-झगड़े हुए। परेशान होकर पिता जी चर्च जाने लगे। क्रमशः उनका ईसाई धर्म की ओर झुकाव बढ़ने लगा और हिंदू धर्म से विश्वास कम होने लगा। फिर मेरा पूरा परिवार चर्च में प्रार्थना करने जाने लगा। ईसाई धर्म अपनाने के बाद हमारे घर में भूत-प्रेत की समस्या हमेशा के लिए समाप्त हो गई। उसके बाद पिता जी ने यह चर्च बनवाया। हमने चर्च में आज भी ईसा मसीह की मूर्ति नहीं रखी है। इसमें केवल प्रार्थना की जाती है। आखिर इसमें बुराई क्या है?’ बातचीत के दौरान रमेश बघेल की मां आ जाती हैं। रमेश इशारा करते हैं- ‘अब बातचीत बंद करो। मां यह सब सुनेंगी, तो वह रोने लगेंगी।’ वह बताते हैं कि अब ईसाई धर्म मानने वाले लोगों की एक टीम बना ली है। जिनके घर में कोई समस्या आती है, जाकर हम उनकी सहायता करते हैं। किसी के घर में मृत्यु होने पर इलाके में उसकी दफनाने की व्यवस्था करते हैं। काश, पिता को अपनी जमीन में दफना पाने का अवसर मिल पाता और उनकी कब्र पर जाकर उन्हें याद कर पाता

रमेश बघेल के निवास से दो किलोमीटर की दूरी पर चंद्रवती का घर है। कच्चे मकान के आंगन में वह कई घंटे से बैठी हैं। उनकी बेटी ओजमनी भी साथ है। चंद्रवती केवल गोंडी भाषा बोलती है। ‘मैं तो अपने पापा के शव को गांव ले जाने ही नहीं आई। कैसे आती?’ उनकी मृत्यु से पहले गाँव के लोग घर के बाहर इकट्ठा हो चुके थे। यह 21 जनवरी 2026 की घटना है। वह विशाखापट्टनम में पढ़ाई कर रही थी। घर से सूचना मिली कि पिताजी अस्वस्थ हैं। उनके ब्रेन में खून का थक्का जम गया है। मम्मी और मेरे भाई पिताजी को रायपुर ले गए। वहां दो दिन तक भर्ती रहे। 23 तारीख की सुबह उनकी सर्जरी हुई। कुछ घंटे बाद ही उनकी मृत्यु हो गई। उस समय हम कोई विवाद नहीं चाहते थे। इसलिए पिताजी का शव जगदलपुर के ईसाई कब्रिस्तान में दफनाया गया। ‘धर्म कब बदला था?’ जवाब आया- ‘बहुत समय पहले। अब मैं 25 साल की हूं। मैं ईसाई धर्म में ही पैदा हुई। मम्मी बताती हैं कि मेरे छोटे चाचा पास्टर थे। उस समय मम्मी के जितने बच्चे होते, सबकी मौत हो जाती थी। चाचा ने मम्मी को चर्च जाकर प्रार्थना करने के लिए कहा। हम पैदा हुए और सभी बच गए। हम चार भाई-बहन हैं। तब से हम ईसाई धर्म को मानने लगे। लेकिन बस्तर और मेरे गांव में हाल ही में जो हुआ है, वो तो कुछ भी नहीं है। यहां ऐसे कई क्षेत्र हैं, जहां ईसाई धर्म को मानने के कारण कई शवों को कब्र से निकाल दिया गया।’ उनकी बात सुनकर मेरी भौहें तन जाती हैं। मन में सवाल उठता है- शायद यह संघर्ष कफन और दफनाने का है |

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