हल्द्वानी में रेलवे की जमीन पर अतिक्रमण को लेकर चल रहे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कहा है कि जमीन रेलवे की है और अतिक्रमण करने वालों को यह अधिकार नहीं है कि वे उसी स्थान पर रहने की शर्तें तय करें। हालांकि, मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिए हैं कि जो परिवार प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) के तहत पात्र हैं, उन्हें पुनर्वास का पूरा मौका दिया जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड विधिक सेवा प्राधिकरण को निर्देश दिया है कि वह एक विशेष शिविर का आयोजन करे, ताकि रेलवे परियोजना के लिए आवश्यक सरकारी जमीन पर रह रहे और बेदखली का सामना कर रहे परिवार पीएम आवास योजना के तहत आवेदन कर सकें। यह शिविर 15 मार्च के बाद लगाया जाएगा और पूरी प्रक्रिया 31 मार्च से पहले पूरी करनी होगी। कोर्ट ने नैनीताल के जिला कलेक्टर और अन्य राजस्व अधिकारियों को इस प्रक्रिया में पूरी सहायता देने का निर्देश दिया है।


हल्द्वानी के बनभूलपुरा, गफूर बस्ती और आसपास के इलाकों में रेलवे की लगभग 30 हेक्टेयर जमीन पर पिछले कई वर्षों से अवैध निर्माण हो चुके हैं। यहां करीब 5,000 से ज्यादा परिवार रहते हैं, जिनकी आबादी लगभग 50,000 बताई जा रही है। दिसंबर 2022 में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने इन सभी अतिक्रमणकारियों को हटाने का आदेश दिया था, लेकिन जनवरी 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश पर रोक लगा दी थी।
इसके बाद जुलाई और सितंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, राज्य सरकार और रेलवे को निर्देश दिए थे कि वे प्रभावित परिवारों के पुनर्वास के लिए एक ठोस योजना तैयार करें। अब ताजा सुनवाई में कोर्ट ने इस दिशा में और स्पष्ट आदेश जारी किए हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रभावित परिवारों की एक विस्तृत सूची तैयार की जाए और खासकर आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लोगों को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत आवेदन करने में मदद दी जाए। इसके लिए एक सप्ताह का विशेष शिविर लगाया जाएगा, जिसकी शुरुआत 19 मार्च से होगी।
कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि बनभूलपुरा इलाके में एक पुनर्वास केंद्र बनाया जाए, जहां परिवार के मुखिया जाकर पीएमएवाई का फॉर्म भर सकें। इसके साथ ही सामाजिक कार्यकर्ताओं को घर-घर जाकर लोगों को योजना की जानकारी देने और जागरूक करने के निर्देश भी दिए गए हैं।
नैनीताल के जिलाधिकारी और एसडीएम हल्द्वानी को लॉजिस्टिक सहायता उपलब्ध कराने के आदेश दिए गए हैं, ताकि पूरी प्रक्रिया सुचारू रूप से पूरी की जा सके। कोर्ट का साफ कहना है कि कोई भी पात्र परिवार आवास योजना से वंचित न रहे।
रेलवे ने कोर्ट को बताया कि ट्रैक विस्तार और अन्य विकास परियोजनाओं के लिए इस जमीन की बेहद जरूरत है। मौजूदा रेलवे ट्रैक नदी के कारण जोखिम में है, इसलिए विस्तार जरूरी है। रेलवे का कहना है कि यह क्षेत्र उत्तराखंड में रेलवे विस्तार की आखिरी संभावित जगह है, इसके आगे पहाड़ी इलाका शुरू हो जाता है, जहां निर्माण बेहद कठिन है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने दलील दी कि करीब 50 हजार लोग दशकों से यहां रह रहे हैं और कई परिवारों के पास पट्टे भी हैं। उन्होंने कहा कि रेलवे ने पहले कभी जमीन खाली कराने की मांग नहीं की थी। उन्होंने पास की खाली जमीन पर पुनर्वास का सुझाव भी दिया और कहा कि एक साथ इतने परिवारों को पीएम आवास योजना के तहत घर देना व्यावहारिक रूप से आसान नहीं है।
केंद्र सरकार की ओर से बताया गया कि पात्र परिवारों को विस्थापन के बाद छह महीने तक हर महीने 2,000 रुपये का भत्ता दिया जाएगा। रेलवे और राज्य सरकार ने भरोसा दिलाया कि सभी प्रभावित परिवारों की पहचान कर पुनर्वास की पूरी व्यवस्था की जाएगी। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि अगली सुनवाई अप्रैल 2026 में होगी और तब तक रेलवे जमीन से अतिक्रमण हटाने की कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी।
कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट ने एक संतुलित फैसला देते हुए यह साफ कर दिया है कि अतिक्रमण स्वीकार्य नहीं है, लेकिन बेदखली से पहले प्रभावित परिवारों के पुनर्वास की जिम्मेदारी सरकार की है। अब देखना होगा कि तय समय सीमा के भीतर पात्र परिवारों को प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ कितना प्रभावी ढंग से मिल पाता है।










